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विरासत में मिली कमजोर कांग्रेस की नैया पर सवार राहुल...इम्तिहान बड़े हैं इस राह पर...

अब इस नए बादशाह पर न सिर्फ अपने परिवार के इतिहास को दोहराने का दबाव होगा बल्कि विरासत की परछाई से बाहर निकल कर खुद को साबित करने का भी दबाव होगा.

Kinshuk Praval Kinshuk Praval Updated On: Dec 04, 2017 07:10 PM IST

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विरासत में मिली कमजोर कांग्रेस की नैया पर सवार राहुल...इम्तिहान बड़े हैं इस राह पर...

तकरीबन दो दशक बाद कांग्रेस की एक स्मरणीय तस्वीर सामने आई, जिसमें पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी राहुल गांधी की ताजपोशी को लेकर माथे पर तिलक लगा रहे हैं. ये 'विजयी भव' का आशीर्वाद उस शख्सियत से मिला जो तकरीबन 32 साल पहले राहुल के पिता स्वर्गीय राजीव गांधी के अध्यक्ष बनने से आहत था.

राजनीति में घटनाचक्र कुछ इसी तरह बदलता है और उसी क्रम में राजीव-सोनिया के बाद अब उपाध्यक्ष राहुल गांधी के युग की शुरुआत हो चुकी है. राहुल गांधी कांग्रेस के अगले अध्यक्ष होंगे, क्योंकि उनके खिलाफ कोई ताल ठोंकने का साहस नहीं जुटा सका. पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह मानते हैं कि राहुल कांग्रेस के 'डार्लिंग' हैं. ऐसे में उस 'डार्लिंग' उम्मीदवार के खिलाफ कोई कैसे खड़ा हो सकता है, जिसके प्रस्तावक पूर्व प्रधानमंत्री हों और जिसे पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी से जीत का आशीर्वाद मिला हो.

कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी परिवार की पांचवीं पीढ़ी के छठे शख्स हैं जो कांग्रेस के अध्यक्ष बनने जा रहे हैं. उनसे पहले मोतीलाल नेहरू, जवाहरलाल नेहरु, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी अध्यक्ष बन चुके हैं. जबकि मां सोनिया गांधी 19 साल से कांग्रेस की अध्यक्ष हैं. कांग्रेस पर आरोप है कि उसने वंशवाद की परंपरा को पार्टी के लोकतंत्र में भी कायम रखा. भले ही अब राहुल गांधी की ताजपोशी से कांग्रेस निशाने पर है. लेकिन राहुल को जिन हालात में कांग्रेस की कमान मिल रही है वो पिछले अध्यक्षों के मुकाबले बेहद जटिल दौर से गुजर रही है.

राहुल को मिला ताज कई इम्तिहानों का सबब बनने वाला है और कांग्रेस का इतिहास रहा है कि उसे सत्ता में लाने का काम गांधी परिवार ही करता आया है. चाहे वो इंदिरा का दौर हो या फिर राजीव और सोनिया का दौर रहा हो. तकरीबन दो दशक बाद कांग्रेस को नया अध्यक्ष मिलने जा रहा है. लेकिन अब इस नए बादशाह पर न सिर्फ अपने परिवार के इतिहास को दोहराने का दबाव होगा, बल्कि विरासत की परछाई से बाहर निकल कर खुद को साबित करने का भी दबाव होगा.

हार के बढ़ते ग्राफ को कैसे रोकेंगे राहुल?

‘कांग्रेस मुक्त भारत’ की उलझनों से गुजर रही कांग्रेस के हाथ से पहले केंद्र की सत्ता छिनी और फिर धीरे-धीरे देश के अहम राज्य भी मुट्ठी से रेत की तरह फिसलते चले गए. कांग्रेस की पराजय का ग्राफ बढ़ता ही गया. साल 2017 में यूपी, उत्तराखंड, गोवा और मणिपुर में कांग्रेस की हार हुई. साल 2016 में जम्मू-कश्मीर, केरल और असम में चुनाव हारे तो साल 2014 में आंध्र प्रदेश, हरियाणा और महाराष्ट्र में भी हार मिली.

New Delhi: Congress Vice President Rahul Gandhi, accompanied by former prime minister Manmohan Singh and other leaders, during filing of his nomination papers for the post of party president, at the AICC office in New Delhi on Monday. PTI Photo by Vijay Verma (PTI12_4_2017_000047B)

गांधी परिवार से ही पिछले अध्यक्षों के दौर को देखा जाए तो कांग्रेस देश में न सिर्फ सबसे मजबूत स्थिति में थी, बल्कि देश के सामने दूसरा राजनीतिक विकल्प कभी एक साथ लंबे समय तक खड़ा भी नहीं रह सका था. कांग्रेस की सियासी चालों के चलते विपक्ष ज्यादा समय तक एक नहीं रह सका और इसका सीधा फायदा कांग्रेस को हमेशा मिलता रहा. हालांकि जब क्षेत्रीय राजनीतिक दलों ने सिर उठाया तो अपने दम पर सत्ता में रहने वाली कांग्रेस को गठबंधन की शरण में भी आना पड़ा.

गांधी परिवार के अध्यक्षों को मिली मजबूत कांग्रेस

आजादी के बाद से ही कांग्रेस का देशव्यापी वर्चस्व देखते हुए कोई सोच नहीं सकता था कि सत्तर साल बाद दिन इस तरह से बदलेंगे. साल 1952 में नेहरू कांग्रेस अध्यक्ष बने. आजादी के बाद देश के पहले आम चुनाव में न सिर्फ कांग्रेस ने धमाकेदार जीत हासिल की बल्कि अधिकतर राज्यों में सरकार बनाई. 1977 तक कांग्रेस को सत्ता से बेदखल करना असंभव था.

नेहरू को विरासत में वो कांग्रेस मिली जिस पर महात्मा गांधी समेत देश के अनगिनत स्वतंत्रता सेनानियों की छत्रछाया थी. यही करिश्मा कांग्रेस के इंदिरा युग में भी दिखा. 1959 में इंदिरा निर्विरोध कांग्रेस अध्यक्ष बनीं. बाद में इंदिरा के चलते कांग्रेस की लहर ‘इंदिरा की लहर’ में तब्दील हो गई. हालांकि 1977 में जनता दल ने कांग्रेस को पहली दफे सत्ता से उखाड़ फेंका. लेकिन जनता दल की फूट का ही नतीजा रहा कि कांग्रेस दोबारा सत्ता में आ गई. इंदिरा फिर प्रधानमंत्री बनीं. 1984 में इंदिरा की हत्या के बाद जब राजीव गांधी को कांग्रेस की कमान मिली तो इंदिरा की मृत्यु से उपजी देश में शोक की लहर ने कांग्रेस की सरकार बना कर इंदिरा को श्रद्धांजलि दी.

राजीव गांधी के दौर में भी कांग्रेस के हालात मुश्किल नहीं थे. 1989 तक कांग्रेस की सरकार रही और गांधी परिवार का वर्चस्व इतिहास के पन्नों में अपनी भूमिका का इजाफा कर रहा था. बोफोर्स घोटाले के आरोपों के चलते कांग्रेस को सत्ता गंवानी पड़ी और फिर चुनावी रैली में राजीव गांधी की हत्या ने कांग्रेस में गांधी परिवार के मुखिया का शून्य गहरा दिया, जिसके बाद नरसिम्हाराव और सीताराम केसरी अध्यक्ष बने. नरसिम्हाराव को भी अध्यक्ष बनने पर कमजोर कांग्रेस नहीं मिली थी.

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यहां तक कि जब केंद्र में एनडीए की सरकार बनी तब भी संसद में कांग्रेस की मौजूदगी मजबूत विपक्ष की थी. गैर गांधी परिवार से सात साल तक दो अध्यक्षों के बाद कांग्रेस ने सोनिया गांधी को अध्यक्ष बनाया और सोनिया के अध्यक्ष बनने के बाद कांग्रेस के दिन ऐसे फिरे कि वो दस साल तक केंद्र की सत्ता में काबिज़ रही. यहां तक कि राज्यों में भी कांग्रेस की जड़ें फिर से मजबूत होती चली गईं. लेकिन राहुल को मिली सुनहरी विरासत में अतीत के अध्यक्षों के दौर को देखते हुए इम्तिहानों के अध्याय जुड़े हुए हैं. अगर इंदिरा के युग में कांग्रेस की कोर टीम में दिग्गज रणनीतिकार हुआ करते थे, तो ऐसे ही नामी कांग्रेसी ‘चाणक्य’ सोनिया और राजीव के वक्त भी कांग्रेस का चेहरा हुआ करते थे.

आज राहुल की टीम में भले ही उम्रदराज अनुभवी नेता दिखाई दें. लेकिन वो भी इंदिरा-राजीव-सोनिया की टीम के मुकाबले बेहद कमजोर दिखाई देते हैं. सच्चाई ये है कि इंदिरा, राजीव और सोनिया को मजबूत पार्टी मिली थी. जिसके जनाधार को लेकर चिंता की लकीरें नहीं उभरी थीं. लेकिन राहुल को अब शुरू से कांग्रेस को मजबूत करने की भूमिका मिली है और वो भी ऐसे वक्त पर जब देश में पीएम मोदी के विकल्प के तौर पर कोई राजनेता दूर-दूर तक खड़ा दिखाई नहीं दे रहा है. कभी जिस तरह कांग्रेस जीत के रथ पर सवार हो कर हर राज्य से गुजरती थी. वहीं आज बीजेपी के वर्तमान को देखकर महसूस हो रहा है.

New Delhi : Congress President Sonia Gandhi, party vice-president Rahul Gandhi, former prime minister Manmohan Singh and other party leaders at the Congress Working Committee meeting at 10 Janpath in New Delhi on Monday. PTI Photo (PTI11_20_2017_000032B)

राहुल के सामने सबसे बड़ी चुनौती ये है कि उनकी पार्टी के हाथ में गिनती के 6 राज्य बाकी हैं. पंजाब, कर्नाटक, मिजोरम, मेघालय, पुड्डुचेरी और हिमाचल में कांग्रेस की सरकार है. पंजाब में इसी साल चुनाव जीता है जिसका सेहरा राहुल के सिर बंधा. लेकिन बिहार में आरजेडी के साथ मिली जीत के बावजूद सरकार का सपना एक साल बाद ही टूट गया.

बड़ा सवाल ये है कि जब राहुल पर कमजोर परफॉर्मेंस के आरोप लग रहे हैं तो ऐसे में अगर गुजरात और हिमाचल प्रदेश के नतीजे उम्मीद के मुताबिक नहीं आए तो राहुल की ताजपोशी पार्टी में जान कैसे फूंक पाएगी? 19 दिसंबर को राहुल के अध्यक्ष बनने का औपचारिक ऐलान होगा. जबकि गुजरात और विधानसभा के नतीजे 18 दिंसबर को आएंगे. यानी आगाज़ भी इम्तिहान के नतीजों से होगा. ये दुविधा राहुल से पहले गांधी परिवार के किसी अध्यक्ष के साथ नहीं थी.

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