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‘विकास’ पागल नहीं है बस राजनीति का दिमाग खराब है!

नारों में भले ही विकास पागल दिख रहा हो लेकिन जमीन पर जनता का दिमाग खराब नहीं है

Updated On: Sep 28, 2017 09:49 AM IST

Kinshuk Praval Kinshuk Praval

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‘विकास’ पागल नहीं है बस राजनीति का दिमाग खराब है!

कांग्रेस के भावी अध्यक्ष हैं राहुल गांधी. प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार बनने के लिए भी तैयार हैं. जिस तरह समुद्र मंथन के वक्त देवताओं के लिए महादेव ने विष पिया था उसी तरह राहुल भी कांग्रेस के लिए सत्ता का जहर पी चुके हैं. अब गुजरात में सत्ता-मंथन के लिए जोर लगा रहे हैं. गुजरात के दौरे पर आए राहुल को ‘विकास’ तो दिखा. लेकिन नजर ‘पागल’ सा आया. विकास के पागल होने से राहुल और गुजरात में कांग्रेस परेशान हैं. गुजरात चुनाव प्रचार में कांग्रेस का कैम्पेन ‘विकास पागल हो गया…’ के नारे के साथ चल रहा है. राहुल उसी कैम्पेन के नारे को लेकर मोदी सरकार पर हल्लाबोल में जुट गए. उन्होंने कहा कि विकास को पागलखाने से बाहर निकालना जरूरी है और उसका इलाज किया जाना चाहिए.

दरअसल राहुल जिस विकास की बात कर रहे हैं वो किसी एक पार्टी का नहीं बल्कि पूरे देश का विकास है. यही विकास जब तक आईसीयू में रहा तो किसी को फिक्र नहीं हुई. लेकिन तीन साल पहले जब इसे आईसीयू से बाहर निकाला गया तो अर्थव्यवस्था के डॉक्टर इसकी पल्स रेट पर सवाल उठा रहे हैं. अब राहुल को उस अस्पताल की तलाश है जहां विकास का इलाज हो सके. ये विडंबना ही है कि कांग्रेस शासन के दौर के बड़े आर्थिक डॉक्टर भी एक ऐसा अस्पताल नहीं बना सके जहां विकास का इलाज हो पाता. पूर्व प्रधानमंत्री और जाने-माने आर्थिक सुधारक मनमोहन सिंह ने अर्थव्यवस्था के स्वास्थ में गिरावट की आशंका जताई थी. लेकिन कोई भी डॉक्टर ऐसा नहीं मिला जो विकास के स्वास्थ्य में सुधार कर पाता. हां ये जरूर बताया गया था कि पैसे पेड़ पर नहीं लगते. लेकिन जब पैसे पेड़ पर लगाने की कोशिश की जा रही है तो विकास पागल दिखाई देने लगा है.

EDS PLS TAKE NOTE OF THIS PTI PICK OF THE DAY:::::::::: Dwarka: Congress vice-president Rahul Gandhi offers prayers at Dwarkadhish Temple, Dwarka in Gujarat on Monday. PTI Photo (PTI9_25_2017_000070A)(PTI9_25_2017_000213B)

दरअसल राजनीति की विडंबना यही है. कांग्रेस ने जब देश की आजादी का ही सारा श्रेय खुद लिया हो तो वो फिर दूसरी पार्टियों के कामकाज की समीक्षा में कसीदे कैसे पढ़ सकती है? आजादी के बाद से लगातार कांग्रेस की ही सरकार रही. सत्ता को राहुल जहर बताते हैं जबकि कांग्रेस उस सत्ता के अमृत को आजादी के बाद से अबतक पीती आई है. जाहिर तौर पर सत्ता के सुरूर में किसी भी गैर कांग्रेसी सरकार का विकास पागल ही दिखेगा. जिस विकास के लिए मोदी सरकार बड़े फैसलों का रिस्क ले रही हो, वो ही विकास कांग्रेस के नारों में पागल बताया जा रहा है.

कांग्रेस शायद इस खुशफहमी में है कि उसके अच्छे दिन लौट सकते हैं. कांग्रेस को उम्मीद लग रही है कि वो नोटबंदी-जीएसटी की जुगलबंदी से गुजरात में मोदी-शाह की जमीन को हिला सकती है. राहुल में ये अहसास जगाया जा रहा है कि उनके भूकंप लाने वाले बयानों से सत्ता विरोधी लहर की सुनामी लाई जा सकती है. एक बार फिर राहुल उसी पुरानी रणनीति के साथ आगे बढ़ रहे हैं जिस पर चल कर कांग्रेस ने साल 2014 का लोकसभा चुनाव हारा था. वो कांग्रेस का अहंकार नहीं था, बल्कि सत्ता के नशे का अतिरेक था.

मोदी विरोध की राजनीति ने कांग्रेस को अपनी उपलब्धियां बताने का मौका नहीं दिया और अब मोदी विरोध की राजनीति कांग्रेस को अपना विजन बताने का मौका नहीं दे रही है. कांग्रेस को सोचना होगा कि सिर्फ नारों के शोर से चुनाव नहीं जीता जा सकता है. नारों में भले ही विकास पागल दिख रहा हो लेकिन जमीनी स्तर पर जनता का दिमाग खराब नहीं है. दिमाग सिर्फ उस राजनीति का ही खराब होता है जो विकास की जगह आरक्षण और तुष्टिकरण का सहारा लेती है.

Rahul-Akhilesh

सियासत में व्यक्तिगत विरोध पराजय की पृष्ठभूमि तैयार करता है. यूपी में राहुल-अखिलेश का गठबंधन मोदी के व्यक्तिगत विरोध पर आमादा था जिसका हश्र सिंहासन ने देखा. जिस तरह यूपी में काम बोलता हुआ नहीं दिखा उसी तरह विकास को पागल समझने की भूल भी कांग्रेस को नहीं करनी चाहिए. क्योंकि कांग्रेस के साथ विरोधाभास ये है कि उसी के हर सवाल और आरोप के लिए वो भी बराबरी की ही जिम्मेदार मानी जाती है. एक हकीकत अब जुमला भी बन चुका है कि ‘देश में सत्तर साल से कांग्रेस ने क्या किया’?

कांग्रेस को भी इतनी हिम्मत जुटानी चाहिए कि वो भी विकास के नाम पर वोट मांग सके. विकास किसी पार्टी विशेष का चेहरा या चुनाव चिन्ह नहीं है जिस पर किसी खास का अधिकार हो, बल्कि ये पूरे देश की पुकार और जरूरत है. बस जरूरत इतनी भर है कि हर राजनीतिक दल कम से कम विकास के नाम पर ईमानदार हो.

फिलहाल गुजरात विधानसभा चुनाव के मद्देनजर कांग्रेस को ये सोचना चाहिए कि वो चुनाव में क्या कह कर वोट मांगे? क्योंकि जब बाढ़ में उसके विधायकों के इलाके डूबे हुए थे तब सारे विधायक अपनी जनता को भूल कर कांग्रेसी नेता अहमद पटेल के सियासी करियर को डूबने से बचाने कर्नाटक चले गए थे. शायद यही सदमा विकास बर्दाश्त नहीं कर सका.

 

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