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2019 के 'दंगल' के लिए बीजेपी के 'चाणक्य' से दांव सीखें राहुल, तभी मोदी से मुकाबला मुमकिन  

अमित शाह से सीखकर राहुल अध्यक्ष पद की नई पारी शुरू करें तो चमत्कार की उम्मीद हो सकती है

Updated On: Dec 11, 2017 08:01 PM IST

Kinshuk Praval Kinshuk Praval

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2019 के 'दंगल' के लिए बीजेपी के 'चाणक्य' से दांव सीखें राहुल, तभी मोदी से मुकाबला मुमकिन  

राहुल गांधी और अमित शाह. दो चेहरे जो देश की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी के अध्यक्ष हैं. बुनियादी फर्क बस इतना कि अमित शाह ने अध्यक्ष बनने से पहले लोकसभा चुनाव में ‘महाजीत’ दिलाने की अग्निपरीक्षा पास की थी. बीजेपी के लिए ऐतिहासिक जनमत जुटाया था. उनकी रणनीति ने यूपी के जातीय समीकरणों के चक्रव्यूह से बने एसपी-बीएसपी के किलों को ध्वस्त कर दिया था. लोकसभा में 71 सीटें बीजेपी की झोली भरी थीं. भले ही मोदी लहर का असर यूपी में विरोधियों पर सुनामी बन कर टूटा लेकिन अमित शाह का चुनावी मैनेजमेंट बीजेपी के लिए सबसे बड़ी उपलब्धि था जिसकी तकरीबन दो दशक से दरकार थी.

जबकि राहुल गांधी अध्यक्ष बनने से पहले यूपी का महत्वपूर्ण विधानसभा चुनाव हार चुके हैं. गोवा, मणिपुर और उत्तराखंड के नतीजे भी कांग्रेस और राहुल के लिए निराशाजनक रहे. लेकिन कांग्रेस ने पुरानी चली आ रही परंपराओं का निर्वाह करते हुए राहुल पर पार्टी के पुनरुद्धार की जिम्मेदारी सौंपी. वो भी तब जब गुजरात विधानसभा चुनाव चल रहे हैं और हिमाचल प्रदेश विधानसभा चुनाव के नतीजे आने वाले हैं.

Rahul files nomination for Congress president

राहुल खुद को जननेता के तौर पर उभारें

राहुल को निर्विरोध अध्यक्ष बना कर कांग्रेस ने पीएम मोदी के मुकाबले उतारने के लिए भी औपचारिक ऐलान कर दिया है. अब कांग्रेस राहुल को ‘मास लीडर’ के तौर पर उभारने की रणनीति पर काम कर रही है. लेकिन राहुल को कांग्रेस में बड़ी जिम्मेदारी संभालते हुए दस साल से ज्यादा हो चुके हैं. इसके बावजूद जननेता के तौर पर वो आजतक पहचान नहीं बना सके. साल 2007 में पार्टी के महासचिव बने तो साल 2013 में उपाध्यक्ष भी बने. राहुल के मार्गदर्शन के लिए हमेशा ही कांग्रेस के दिग्गज नेता अहमद पटेल, प्रणब मुखर्जी, पी चिंदबरम, ए के एंटनी, दिग्विजय सिंह, गुलाम नबी आज़ाद, वीरप्पा मोइली और पी चिंदबरम जैसे बड़े नेता मौजूद रहे. राहुल ने उनसे राजनीति का ककहरा भी सीखा लेकिन सिवाए 'सत्ता को जहर' बताने जैसे बयानों के अलावा राहुल ऐसा कुछ नहीं कर सके जो पार्टी के कार्यकर्ताओं में जोश भर पाता या फिर देश की आम जनता से उन्हें कनेक्ट कर पाता.

शाह से सीखें शह और मात का खेल

अब भले ही कांग्रेस के लिए राहुल पीएम पद के उम्मीदवार हैं लेकिन पीएम मोदी से मुकाबले से पहले उन्हें बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह को चुनावी दंगल में टक्कर देनी होगी. चुनाव में राहुल को अमित शाह जैसा बड़ा सरप्राइज़ देने की तैयारी करनी होगी. राहुल को कामयाब अध्यक्ष बनने के लिए अमित शाह की ही तरह कांग्रेस को बूथ लेवल पर मजबूत करना होगा. उन्हें पार्टी के घटते वोट शेयर को बढ़ाना होगा. इसके लिए नए सिरे से जमीनी कार्यकर्ता की तरह उन्हें एक एक इलाके का दौरा कर वहां की जनता की आवाज़ सुननी होगी और सियासी नब्ज टटोलनी होगी क्योंकि दिल्ली में बैठकर 'दिल्ली फतह' करना अब आसान नहीं रहा. इसके लिए 'देश-दर्शन' कर राहुल कांग्रेस के लिए 'भारत की नई खोज' करें.

amit shah 3

ऐसे भी नहीं बीजेपी के 'शाह' हैं अमित

अमित शाह पार्टी के अध्यक्ष के तौर पर बीजेपी के कमल को राज्य दर राज्य खिलाने का काम कर रहे हैं. राहुल को अमित शाह की चुनावी शैली से अपनी जीत के लिए जरूरी बातें सीखनी चाहिए क्योंकि आज जो कांग्रेस की हालत है वो ही कभी बीजेपी की भी हुआ करती थी. आज कांग्रेस के पास हिमाचल प्रदेश, पंजाब, कर्नाटक जैसे गिनती के 5 राज्यों में सरकार है. ऐसी ही स्थिति कमोबेश तब अमित शाह के साथ भी थी जब उन्हें पार्टी अध्यक्ष की कमान सौंपी गई थी. लेकिन उन्होंने 3 साल में 11 चुनाव जिता कर अध्यक्ष बनाए जाने के फैसले को साबित कर दिखाया.

अमित शाह को जब लोकसभा चुनाव के वक्त यूपी की जिम्मेदारी मिली तो उस वक्त यूपी में बीजेपी की कुल 10 सीटें थीं. बीजेपी निराशा के उस दौर में थी जहां से वापसी की उम्मीदें करना मुश्किल था. लेकिन ‘मोदी मैजिक’ और शाह की ‘चाणक्य नीति’ ने यूपी में सारे समीकरण ही बदल डाले. पार्टी ने न सिर्फ 71 सीटें हासिल की बल्कि 42.3 फ़ीसदी वोट भी हासिल किया. 17.5 फ़ीसदी से 42.3 फ़ीसदी वोट शेयर हासिल करने के पीछे शाह का सोशल इंजीयरिंग ही जीत की इमारत को ऊंचा करता चला गया जिसमें ब्राह्मण, राजपूत, वैश्य और अन्य ऊंची जातियों के अलावा पिछड़ी जातियां, निचली पिछड़ी जातियां, गैर जाटव, दलितों के वोटों ने जीत की इमारत को बुलंद किया. इस ऐतिहासिक कामयाबी के पीछे अमित शाह का बूथ मैनेजमेंट सबसे निर्णायक रहा जिसने घर घर कमल खिलाने का काम किया. ऐतिहासिक जीत का ही करिश्मा यूपी विधानसभा चुनाव में भी दिखा जहां बीजेपी ने 40 फीसदी वोट हासिल करते हुए 312 सीटें जीतीं.

Amit Shah and Narendra Modi in Ahmedabad

अमित शाह अपने बोल्ड फैसलों के लिए जाने जाते हैं. हालांकि उनके सभी फैसलों पर पीएम मोदी की मुहर ही अंतिम होती है. लेकिन कम समय में ही शाह हर राज्य की सियासी और अवाम की नब्ज टटोलने में माहिर होते चले गए. यही वजह है कि जहां वो महाराष्ट्र और जम्मू-कश्मीर में अकेले चुनाव लड़ने का फैसला करते हैं तो बिहार में चुनाव हारने के बावजूद वापसी करते हुए एनडीए की सरकार भी बना लेते हैं. आज कांग्रेस में अमित शाह की तरह राजनीति के माहिर दांव चलने वाला कोई चेहरा नहीं दिखाई देता है.

गुजरात में भी शाह दे सकते हैं सरप्राइज

कहना गलत न होगा कि कांग्रेस का जहां से सोचना खत्म होता है वहां से अमित शाह अपनी रणनीति बनाना शुरू करते हैं. गुजरात में भले ही कांग्रेस हार्दिक-जिग्नेश-अल्पेश के जरिए पटेल-दलित-ओबीसी कार्ड पर चले अपने दांव पर इठला रही है लेकिन कोई नहीं जानता है कि इस जुगलबंदी का तोड़ अमित शाह शायद बहुत पहले ही ढूंढ चुके होंगे जो नतीजों में सबको एक बार फिर चौंका जाए. चुनाव के बाद नतीजों पर कयास तो यूपी विधानसभा चुनाव के वक्त भी लगाए गए थे और कहा गया था कि जाटों ने बीजेपी का दामन छोड़ दिया है और यूपी में मायावती वापसी कर रही हैं. लेकिन फिर जो हुआ वो अब इतिहास है और ऐतिहासिक भी.

rahul_alpesh_jignesh

राहुल पर अपेक्षाओं का दबाव बहुत ज्यादा है. वो निर्विरोध अध्यक्ष बने हैं. इसका सीधा मतलब भी ये है कि वो अपनी टीम बनाने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र हैं. ऐसे में राहुल पार्टी की बागडोर संभालने के बाद अब अमित शाह की तरह हर जाति और वर्ग को ध्यान में रखकर अपनी ऐसी टीम बनाएं जो कि सोशल इंजीनियरिंग के पैमाने पर खरी उतर सके.अब गुजरात और हिमाचल प्रदेश के चुनावों नतीजों से आगे बढ़ते हुए राहुल को  मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ जैसे बीजेपी शासित राज्यों में चुनावी जीत का मंत्र ढूंढना होगा और इसके लिए वो बीजेपी के चाणक्य से सियासत की शाह और मात की चाल सीख सकते हैं.

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