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राहुल गांधी के एकजुट विपक्ष का सपना महज एक कपोल कल्पना है

राहुल गांधी चाहे जितनी कोशिश कर लें लेकिन 2019 के चुनाव में पार पाना आसान नहीं है

Updated On: Aug 18, 2017 12:59 PM IST

Sandipan Sharma Sandipan Sharma

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राहुल गांधी के एकजुट विपक्ष का सपना महज एक कपोल कल्पना है

बहुत पुरानी कहावत है- एक रहे तो जीत, बंट गए तो हार. विडंबना है कि राहुल गांधी ने इसे 70 के दशक में अपनी ही दादी और कांग्रेस को अस्थिर करने की रणनीति के रूप में सुना होगा.

राहुल गांधी ने गुरुवार को विपक्षी दलों के मंच से एकजुट होने की जरूरत पर जोर देते हुए ये बात कही ताकि 'ये लोग (बीजेपी) कहीं ना दिखें.'

अगर सैद्धांतिक रूप में देखा जाए कि जनता परिवार 1977 में कांग्रेस को उखाड़ सकती है, अगर वीपी सिंह और देवीलाल 1989 में राजीव गांधी को हरा सकते हैं तो साझा विपक्ष के विचार में वाकई कुछ दम जरूर है. लेकिन, अगले चुनाव का अंकगणित बताता है कि अगर समूचा विपक्ष भी एकजुट हो जाए, तो वे नरेंद्र मोदी को नहीं रोक सकते.

IndiraGandhi

मोदी और बीजेपी को हराने का सपना पूरा करने के लिए विपक्ष के सामने सबसे बड़ी चुनौती ये नहीं है कि वह एकजुट नहीं हो सकता. यह संभव है क्योंकि कई पार्टियों के सामने अस्तित्व का खतरा है. बल्कि, यह बीजेपी की योजना है कि वह चुनाव से पहले विशाल गठबंधन खड़ा करे, जो विपक्ष को शतरंज की बिसात पर उस स्थिति में भी मात दे जब वे एकजुट हो जाएं.

बीजेपी की योजना में ठीक बात ये है कि ऐसे कुछ राज्य ही हैं जहां आशंका है कि विपक्ष एकजुट होकर बीजेपी का सामना करे. बाकी राज्यों में या तो बीजेपी के साथ बड़ा गठबंधन है या फिर विपक्ष को मात देने की संभावना उसके साथ है.

इस समय पश्चिम बंगाल, कर्नाटक, उत्तर प्रदेश, दिल्ली और ओडिशा ही ऐसे राज्य हैं जहां कम से कम कागज पर ही सही, विपक्ष बीजेपी को तगड़ी चुनौती देने की स्थिति में है. बाकी सभी जगहों पर बीजेपी बेहतर स्थिति में है.

उदाहरण के लिए महाराष्ट्र को लें. यह अब लगभग साफ हो चुका है कि बीजेपी अगले चुनाव में गठबंधन के लिए शरद पवार को लुभा रही है. बीजेपी के लिए पवार एक तरह से जीवन बीमा की तरह हैं अगर 2019 में (या 2018 में भी अगर विधानसभा चुनावों के साथ लोकसभा चुनाव हों) एनडीए के साथ बने रहने से शिवसेना इनकार कर दे. पवार के साथ गठबंधन कांग्रेस और शिवसेना को अलग-थलग कर देगा. कहा जाता है कि राजनीति में रिश्ते अजीब होते हैं. लेकिन दुनिया इधर से उधर हो जाए, फिर भी कांग्रेस और शिवसेना एक साथ नहीं आ सकती. ऐसे में त्रिकोणात्मक संघर्ष होगा, जिसका फायदा बीजेपी को होगा.

बिहार में संयुक्त मोर्चा का फायदा बीजेपी और उसके नए सहयोगी नीतीश कुमार को है. इससे पहले भी आरजेडी और कांग्रेस को कई बार हराने का इतिहास यह गठबंधन बना चुका है. चूंकि लालू का मुस्लिम यादव वोटर सवर्ण और गैर यादव ओबीसी (बीजेपी समर्थक) वोटर और महादलित व महिला (नीतीश प्रशंसक) वोटरों के साथ इकट्ठा नहीं होते, उनकी पार्टी कांग्रेस के साथ लड़कर जीत नहीं पाएगी.

कई अन्य राज्यों में बीजेपी के मुकाबले एकमात्र विपक्षी दल कांग्रेस है. यह कांग्रेस का दुर्भाग्य है कि इनमें से किसी भी राज्य में उसे स्पष्ट बढ़त हासिल नहीं है. विपक्ष कहलाने वाली दूसरी पार्टियां बमुश्किल वर्तमान समीकरण में कोई बदलाव ला पाएंगी. राजस्थान, मध्यप्रदेश, गुजरात, हिमाचल प्रदेश और छत्तीसगढ़ में जल्द ही चुनाव होने वाले हैं. जब तक कांग्रेस इन राज्यों में अच्छा प्रदर्शन नहीं करती, आने वाले चुनावों में विपक्ष के तौर पर यह खुद के लिए भी बोझ बन जाएगी.

Monsoon session of Parliament

दूसरी तरफ बीजेपी ने संभावित सहयोगियों की तलाश में तेजी दिखाई है. तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश में यह क्षेत्रीय ताकतों- चेन्नई में एआईडीएमके और हैदराबाद में टीआरएस, वाईएसआर या टीडीपी को अपने साथ जोड़ने को तैयार है. नए सहयोगयों और उत्तर पूर्व तक उसकी पहुंच से न सिर्फ उसकी संभावित हार की क्षतिपूर्ति होगी, बल्कि यह एनडीए की 2014 की अंकतालिका को और भी समृद्ध कर सकती है.

गांधी चाहें जितना बोल लें कि वे साझा विपक्ष चाहते हैं लेकिन आज जो राजनीतिक संभावनाएं मौजूद हैं, उसमें उनकी योजना सफल होती नहीं दिखती. जब तक कि राजनीति में कोई उथल-पुथल वाली बड़ी घटना ना हो, जो इतना प्रलय मचाने वाली हो कि मोदी को अलोकप्रिय बना दे, बुरी तरह से धराशायी विपक्ष की वर्तमान स्थिति चुनाव के बाद भी बदलने वाली नहीं है.

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