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अपनी 'हरकतों' से राहुल गांधी ने दिखा दिया कि न वो अच्छे नेता हैं न अभिनेता

भारत के सामाजिक मनोविज्ञान को लेकर राहुल की समझ उनके आजू-बाजू मंडराने वाले चंद सलाहाकारों की समझावन पर बनी है और ये सलाहकार जमीनी सच्चाई से एकदम कटे हुए हैं

Updated On: Jul 21, 2018 03:46 PM IST

Ajay Singh Ajay Singh

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अपनी 'हरकतों' से राहुल गांधी ने दिखा दिया कि न वो अच्छे नेता हैं न अभिनेता

ड्रामेबाजी का हुनर सीखे हुए अभिनेता किसी किरदार को निभाते वक्त मैथड एक्टिंग का सहारा लेते हैं ताकि उनकी अदायगी सच्ची जान पड़े. राजनेता हुनरमंद अभिनेताओं से कहीं ज्यादा होशियार होते हैं, उन्हें ड्रामेबाजी और अभिनय का फर्क पता होता है. कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की विडंबना ये है कि उन्हें ना तो ड्रामेबाजी आती है ना ही अभिनय करना.

शुक्रवार के दिन संसद में एनडीए सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव की बहस में उन्होंने जब शिरकत की तो साबित हो गया कि वे ना तो राजनेता हैं और ना ही अभिनेता. जान पड़ता है, वो अब भी इसी खोज-टटोल में लगे हैं कि आखिर उनके होने का क्या मतलब होता है. लगता है, वे हमेशा आजू-बाजू मंडराने वाले चंद यार दोस्तों की मंडली के इशारे पर चल रहे हैं जो उन्हें सियासत के हर अहम मसले पर सलाह दिया करती है.

राहुल का झूठ आया सामने

गौर कीजिए कि राहुल ने एक के बाद एक किस तरह हवा-हवाई किस्म के मुद्दे उठाए. उन्होंने बीजेपी के अध्यक्ष अमित शाह का मसला उठाने के लिए संसद के मंच को चुना क्योंकि उन्होंने अच्छी तरह पता था कि संसद में कुछ कहो तो उसे मानहानि के दायरे में नहीं गिना जाता और ना ही उस पर कानूनी कार्रवाई की जा सकती है. राहुल गांधी सरीखे कद के नेता के लिए ऐसा बरताव एकदम अनुचित माना जाएगा. इसी तरह जब उन्होंने राफेल सौदे के मसले पर अपने अंदाज में पोल-खोल किया और निर्मला सीतारमण पर आरोप लगाया कि उन्होंने देश के सामने झूठ बोला तो यह बात बिल्कुल जाहिर थी कि वे मारकर मैदान से भाग खड़े होने की रणनीति अपना रहे हैं.

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उन्होंने फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों से हुई अपनी तथाकथित बातचीत का हवाला देते हुए दावा किया कि निर्मला सीतारमण ने झूठ बोला है लेकिन शाम होते-होते मैक्रों के दफ्तर ने स्पष्ट कर दिया कि राहुल गांधी से फ्रांस के राष्ट्रपति की ऐसी कोई बातचीत नहीं हुई है. राहुल ना सिर्फ अपनी बात के झूठे निकले बल्कि यह भी साबित हो गया कि वे समझ के एकदम ही कच्चे राजनेता हैं और अब भारत के दौरे पर आया कोई भी राष्ट्राध्यक्ष उनसे दो गज दूर का ही नाता रखना चाहेगा क्योंकि उसे पता होगा कि कांग्रेस अध्यक्ष से राजकाज के गंभीर मामलों पर कोई बात कहने के मामले में यकीन नहीं किया जा सकता.

राहुल ने जिस तरह बिना किसी ठोस आधार के अपनी बात कही वो बहुत परेशान करने वाला है. उन्होंने एक उद्योगपति का जिक्र किया, उसका नाम नहीं बताया और कहा कि सौदे में नये सिरे से संशोधन करके युद्धक विमान (फाइटर प्लेन) की कीमत कई गुणा बढ़ाने से उस उद्योगपति को फायदा हुआ है. चूंकि राहुल धाराप्रवाह बोले चले जा रहे थे सो उनके बोलने में तथ्यों का ख्याल जरा भी नहीं था. सच तो ये है कि तथ्य राहुल के लिए कोई मतलब ही नहीं रखते.

राहुल गांधी ने अविश्वास प्रस्ताव के दौरान जो कुछ बोला वह बड़बोलेपन की श्रेणी में आता है और अमेरिकी दार्शनिक हैरी फैंक्फर्ट ने बड़बोले व्यक्ति के बारे में विस्तार से चर्चा करते हुए लिखा है कि 'किसी आदमी के लिए झूठ बोलना तबतक नामुमकिन है जबतक उसे यह यकीन ना हो कि वो सच को जानता है लेकिन मुंह से कूड़ा-कर्कट उगलना हो तो फिर ऐसी किसी चिन्ता-फिक्र की जरूरत नहीं रह जाती.'

सलाहकारों की सिखाई हुई ड्रामेबाजी

भाषण के दौरान आक्रामक तेवर अपनाना और बार-बार ये दावा करना कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उनसे आंख मिलाकर बातें नहीं कर सकते- दरअसल उनके सलाहकारों की सिखाई हुई ड्रामेबाजी का ही हिस्सा था.

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राहुल गांधी के सियासी बरताव में एक खास तरतीब नजर आती है. यूपीए के शासन के वक्त उन्होंने खुद को एक बुद्धिजीवी राजनेता के रूप में पेश किया. उन दिनों उनके भाषणों का मिजाज बहुत कुछ वैसा ही हुआ करता था जैसा कि अखबार के ‘ऑपएड’ पन्ने पर छपने वाले लेखों का होता है. तब के समय में उन्होंने पटना, इलाहाबाद, हैदराबाद और दिल्ली में भी बुद्धिजीवियों के साथ बैठक की, इरादा ये था कि बुद्धिजीवियों की नजर से हिन्दुस्तान को समझा जाए. पटना में हुई ऐसी ही बैठक में एक थिंकटैंक के नुमाइंदे ने मुझसे कहा वो कुछ बना-बनाया फार्मूला दोहराया करते हैं जो उनकी जबान पर चढ़ गए हैं.

गलाफाड़ तेवर से नैतिक बल गायब

साल 2014 से राहुल ने खुद को सियासत में यंग्री यंगमैन के रूप में पेश करना चाहा यानी एक ऐसा नौजवान जो प्रधानमंत्री से भिड़ने को उतावला हो. मोदी को चुनौती देने में राहुल की कोई गलती है, ऐसा तो खैर कोई नहीं कहेगा लेकिन मोदी को चुनौती देने के क्रम में हुआ ये कि गुस्से का अभिनय करते हुए राहुल सियासत ही भूल गए. वो इतने गलाफाड़ तेवर के साथ अपनी बात कहने लगे कि उसके भीतर से नैतिक बल जाता रहा. मिसाल के लिए, भाषण खत्म करने के बाद उनका मोदी की तरफ बढ़ना अपने मिजाज में और संसदीय मर्यादा के लिहाज से सवालों के घेरे में होने के बावजूद रणनीति के तौर पर अच्छा माना जाएगा लेकिन फिर उन्होंने किसी कॉलेज जाने वाले लड़के तरह खीसे निपोरे और आंख मटकाईं और उनके ऐसा करने से भारतीय राजनीति के भीतर मोहब्बत का पैगाम देने वाले मसीहा की उनकी अदायगी मिट्टी में मिल गई.

इन बातों का जाहिर सा संदेश यही है कि भारत के सामाजिक मनोविज्ञान को लेकर राहुल की समझ उनके आजू-बाजू मंडराने वाले चंद सलाहाकारों की समझावन पर बनी है और ये सलाहकार जमीनी सच्चाई से एकदम कटे हुए हैं. राहुल को भले ही अपनी पार्टी के कुछ नेताओं की वाहवाही मिल जाए क्योंकि वाहवाही करने वाले ये नेता चापलूसी के दम पर टिके हुए हैं लेकिन राहुल को दार्शनिक फ्रैंकफर्ट की एक और सीख जरूर याद रखनी चाहिए, इससे उनका भला होगा. ऊपर हमने जिस लेख का जिक्र किया है उसी लेख में फ्रैंकफर्ट ने यह भी कहा है कि 'ऐसे आदमी (यानी हमारे इस लेख के एतबार से राहुल गांधी) को जरा भी यह फिक्र नहीं सताती कि वो जो कुछ कह रहा है उसका सच्चाई से कुछ रिश्ता है भी या नहीं. वह बस बातों को कहीं से उठा लेता है और अपना मकसद साधने के लिए उन बातों के सहारे एक कहानी बुन लेता है.’

सियासी बरताव के बारे में राहुल गांधी को सलाह देने वाले शायद दवा की ऐसी ही घूंट राहुल गांधी को पिला रहे हैं और इसी कारण राहुल गांधी का ‘शो’ सियासत के रंगमंच पर एक अफसोसनाक कॉमेडी के रूप में सामने आ रहा है.

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