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मोदी लहर के बीच ये राहुल गांधी के लिए बाजीगर बनने का मौका है

राहुल अब जननेता के तौर पर सामने आए हैं. ऐसे में राहुल अगर कांग्रेस अध्यक्ष के तौर पर कामयाब होते हैं, तो उससे न सिर्फ पार्टी अपना खोया हुआ गौरव दोबारा हासिल कर सकेगी, बल्कि इससे लोकतंत्र का भी भला होगा

Dinesh Unnikrishnan Updated On: Nov 22, 2017 03:58 PM IST

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मोदी लहर के बीच ये राहुल गांधी के लिए बाजीगर बनने का मौका है

राहुल गांधी को देर सवेर कांग्रेस अध्यक्ष बनना ही था. उनकी ताजपोशी की औपचारिकता महज वक्त की बात थी. हर कोई जानता था कि राहुल गांधी ही एक दिन कांग्रेस की कमान संभालेंगे. लेकिन इसके बावजूद जब राहुल के राज्याभिषेक की चर्चा उठी तो इस बात को मीडिया में खासी तवज्जो मिली.

टीवी चैनलों पर तो राहुल की ताजपोशी को लेकर नॉन स्टॉप कवरेज हो रही है. 47 साल के राहुल के कांग्रेस अध्यक्ष बनने को लेकर कई लोगों ने जहां उनका समर्थन किया, वहीं कई लोग ऐसे भी सामने आए जिन्होंने राहुल की ताजपोशी पर खूब तंज कसे.

राज्य दर राज्य बीजेपी के हाथों मिल रही शिकस्त से कांग्रेस के सामने अस्तित्व का संकट खड़ा हो चुका है. ऐसे में कांग्रेस को पतन से बचाने के लिए राहुल गांधी ही आखिरी उम्मीद हैं. दरअसल कांग्रेस का पतन मई 2014 में मोदी लहर के साथ शुरू हुआ था. केंद्र में मोदी सरकार बनने के बाद कांग्रेस एक के बाद एक कई राज्यों में भी सत्ता से बाहर होती गई.

राहुल हैं कांग्रेस के उद्धारक?

अब अरसे बाद कांग्रेस कार्यकर्ता राहुल को पार्टी के उद्धारक के रुप में देख रहे हैं. कांग्रेस कार्यकर्ताओं को लगता है कि राहुल की नीतियां और कोशिशें दम तोड़ती पार्टी में नई जान फूंक सकती हैं. कार्यकर्ताओं को ये भी उम्मीद है कि, राहुल पार्टी के ढांचे में बड़े बदलाव करेंगे और नए चेहरों को मौका देंगे, जिससे पार्टी का जनाधार बढ़ाने में खासी मदद मिलेगी.

बेशक, कांग्रेस के लिए ये बेहद जरूरी है कि वो न सिर्फ अपना जनाधार बढ़ाए बल्कि देश की जनता का विश्वास भी दोबारा हासिल करे. साल 2014 के लोकसभा चुनावों में करारी हार ने कांग्रेस की चूलें हिलाकर रख दी थीं. तब पार्टी को महज 44 सीटें ही हासिल हुई थीं. मतलब साफ है कि कांग्रेस ने जनता का विश्वास लगभग पूरी तरह से खो दिया था. जनता के उसी विश्वास को दोबारा पाना ही कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी चुनौती है.

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फिलहाल राहुल के साथ एक सकारात्मक बात यह है कि उन्होंने अपने सियासी करियर को धीमे-धीमे लेकिन मजबूती के साथ संवारा है. राहुल ने खुद को एक ऐसे राजनेता के रूप में पेश किया है, जो आम आदमी की बात करता है. जननेता की छवि के चलते राहुल को अपने कद के किसी और नेता के मुकाबले मीडिया की कहीं ज्यादा तवज्जो मिल रही है.

नए राहुल की नई राजनीति

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि राहुल गांधी एक ऐसे नेता के तौर पर सामने आए हैं, जो जाति और धर्म की राजनीति से ऊपर है. जबकि राहुल के कई विरोधियों की जीत का मंत्र जाति और धर्म की राजनीति ही है. राहुल की सियासी सोच और उनकी नीतियां देश के धार्मिक अल्पसंख्यकों में सुरक्षा की भावना पैदा करती हैं. जबकि दक्षिणपंथी आंदोलन और कट्टर हिंदुत्व के चलते अल्पसंख्यक वर्ग अरसे से डरा-सहमा हुआ है क्योंकि कट्टरपंथी हिंदुत्व के झंडाबरदार अब यह तय करने में भी जुट गए हैं कि कौन क्या खाएगा और कौन क्या बोलेगा. यानी लोगों से अब मनमाफिक खाने-पीने और बोलने की आजादी भी छीनी जा रही है. ऐसे में राहुल गांधी अल्पसंख्यकों के लिए धार्मिक विश्वासों और व्यक्तिगत आजादी के मसीहा बनकर उभरे हैं.

Rahul Gandhi public rally in Gandhinagar

राहुल गांधी अगर अपने बहुलवादी राजनीतिक दृष्टिकोण पर मजबूती के साथ डटे रहे तो, वह देश के तटस्थ वोट बैंक के अंतिम नायक (लास्ट हीरो) के तौर पर अपनी नई पहचान भी बना सकते हैं. दूसरी बात यह है कि, राहुल ने शुरुआत से ही खुद को एक ऐसे नेता के रूप में स्थापित किया है, जो कांग्रेस पार्टी के पारिस्थितिकी तंत्र से बाहर है. यहां तक कि यूपीए सरकार के दौरान जब कांग्रेस पर लगातार भ्रष्टाचार के आरोप लग रहे थे, और अहम नीतिगत फैसलों के लिए सरकार के पास राजनीतिक इच्छाशक्ति का भारी अभाव था, तब भी राहुल पार्टी लाइन से दूर खड़े नजर आते थे.

लेकिन अब परिस्थितियां बदल चुकी हैं. राहुल अब खुद को भ्रष्टाचार से परे, ईमानदार और गरीबों के हमदर्द, एक ऐसे नेता के रूप में पेश करते हैं, जो समाज के दबे-कुचले लोगों की भलाई के लिए काम करना चाहता है. यही वजह है कि राहुल शुरुआत से ही 'सूट बूट की सरकार' कहकर मोदी और बीजेपी पर निशाना साधते आ रहे हैं. राहुल का आरोप है कि मोदी सरकार सिर्फ बड़े उद्योगपतियों पर ही मेहरबान है, उसे देश के गरीब जनता की कोई चिंता ही नहीं है.

गलतियों को स्वीकार करके बढ़ा जा सकता है आगे

राहुल गांधी अगर पूरे साहस के साथ ये स्वीकार कर लें कि कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार से न सिर्फ कई नीतिगत और राजनीतिक गलतियां हुईं, बल्कि कई मोर्चों पर सरकार अक्षम भी साबित हुई, तब राहुल शायद छिन्न-भिन्न हालत में पड़ी कांग्रेस की मरम्मत कर सकते हैं. राहुल की पेशकदमी के बिना कांग्रेस फिर से सियासी दौड़ में कामयाब नहीं हो सकती है.

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लेकिन, राहुल गांधी के मौजूदा राजनीतिक क्रियाकलापों और बयानों में अतीत में कांग्रेस से हुई गलतियों का कोई जिक्र नहीं मिलता है. अपने करारे तंज और मजाकिया टिप्पणियों के जरिए राहुल भले ही सोशल मीडिया पर छा गए हों, लेकिन मोदी सरकार के आर्थिक कुप्रबंधन को चुनौती देने के लिए उनके पास कोई मजबूत आर्थिक उपाय नहीं हैं. हालांकि राहुल बात-बात में आर्थिक नीतियों को लेकर मोदी सरकार पर हमला बोलते नजर आते हैं.

उदाहरण के लिए, राहुल आरोप लगाते हैं कि मोदी सरकार अपने साढ़े तीन साल के शासन में रोजगार के पर्याप्त अवसर मुहैय्या कराने में नाकाम रही है. राहुल का ये आरोप वाजिब हैं क्योंकि इन दिनों बेरोजगारी एक गंभीर मुद्दा बन चुकी है. मोदी के शासनकाल में नई नौकरियों का सृजन सबसे कम हुआ है. लिहाजा राहुल जिस समस्या की ओर इशारा करते हैं वो सही है. लेकिन राहुल के पास इस सवाल का जवाब नहीं है कि अगर वो प्रधानमंत्री होते तो पर्याप्त नौकरियां पैदा करने के लिए क्या करते? क्या राहुल के पास ऐसी कोई विश्वसनीय योजना है, जो हर महीने लाखों की तादाद में लोगों को रोजगार उपलब्ध करा सके?

क्या राहुल के पास है विजन?

राहुल ने नोटबंदी के मुद्दे पर भी मोदी सरकार के खिलाफ खूब आग उगली और जमकर हमले किए. राहुल लगातार यह कहते हुए आ रहे हैं कि नोटबंदी मोदी सरकार का सबसे खराब और नाकाम फैसला है, जो अपने लक्ष्य को हासिल नहीं कर पाया. जबकि नोटबंदी को सत्ता में आने के बाद मोदी सरकार के सबसे बड़े आर्थिक फैसले के तौर पर जाना जाता है. दुनिया के कई अर्थशास्त्रियों ने मोदी सरकार के इस फैसले की सराहना की थी, जिनमें नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री रिचर्ड थैलर भी शामिल थे. लेकिन नोटबंदी के बाद 2000 रुपये का नोट जारी करने से मोदी सरकार की जमकर आलोचना भी हुई. तब ये कहा गया कि जिस मकसद से नोटबंदी की गई थी, वो मकसद 2000 रुपये का नोट चलन में आने से नाकाम साबित हो गया है.

Rahul gandhi road show

लेकिन नोटबंदी की कड़ी आलोचना करने वाले राहुल गांधी के पास क्या ऐसी कोई योजना या नीति है, जिससे देश में चल रहीं समानांतर अर्थव्यवस्थाओं पर नकेल कसी जा सके? क्या राहुल के पास ऐसा कोई उपाय है जिससे नकदी और अन्य परिसंपत्तियों के रूप में लोगों द्वारा इकट्ठा किए गए कालेधन को उजागर किया जा सके? कुछ रिसर्च के मुताबिक, घरेलू बाजार में करीब 15 लाख करोड़ रुपये कालेधन के रूप में मौजूद हैं, जबकि विदेशों में करीब 65 लाख करोड़ रुपये मूल्य का कालाधन छिपाकर रखा गया है.

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इसमें कोई दो राय नहीं है कि कालेधन की समस्या को पहली प्राथमिकता मानकर जल्द से जल्द सुलझाने की सख्त आवश्यकता है. क्या राहुल के पास नोटबंदी के इतर कालेधन को समाप्त करने के लिए कोई और मजबूत आर्थिक योजना है? नोटबंदी की तरह ही राहुल और कांग्रेस ने गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स यानी जीएसटी के मुद्दे पर भी मोदी सरकार को आड़े हाथों ले रखा है. राहुल का कहना है कि जीएसजी को न सिर्फ गलत तरीके से लागू किया गया, बल्कि उसकी दरें भी ज्यादा रखी गई हैं, जिससे व्यापारियों को खासी मुश्किलें पेश आ रही हैं. ऐसे में फिर वही सवाल उठ खड़ा होता है कि, क्या राहुल के पास जीएसटी को आसान औऱ चाक-चौबंद बनाने का कोई पुख्ता खाका मौजूद है?

गुजरात चुनाव भी तय करेगा राहुल की दशा-दिशा

आखिर में, क्या कांग्रेस के अध्यक्ष के तौर पर राहुल गांधी की पदोन्नति से आगामी गुजरात विधानसभा चुनाव और 2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस का प्रदर्शन सुधरेगा? अगर ऐसा होता है, तब भी राहुल की मुश्किलें आसान नहीं होने वाली हैं, क्योंकि मोदी लहर का खुमार अब भी देश की जनता के सिर चढ़कर बोल रहा है. नोटबंदी और जीएसटी जैसे विवादित आर्थिक फैसलों के बावजूद मोदी की लोकप्रियता अब भी बरकरार है. इस साल की शुरूआत में उत्तर प्रदेश में हुए विधानसभा चुनाव में भी मोदी लहर अपनी बुलंदी पर दिखाई थी, जिसके चलते बीजेपी ने राज्य में एकतरफा जीत दर्ज की थी. यही वजह कि राहुल अपनी तुलना मोदी से करने से लगातार परहेज करते आ रहे हैं.

हालांकि, बहुत से राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि, राहुल गांधी के पार्टी की कमान संभालने के बाद कांग्रेस की किस्मत यकीनन चमकेगी. राहुल की कार्यशैली और नीतियों से कार्यकर्ताओं में जोश पैदा होगा, जिससे पार्टी का जनाधार बढ़ेगा.

कांग्रेस के लिए फिलहाल राहुल की पदोन्नति से ज्यादा गुजरात और हिमाचल प्रदेश के स्थानीय मुद्दे निर्णायक साबित हो सकते हैं. जिनमें गुजरात में कोटा आधारित राजनीति और हिमाचल में सत्ता विरोधी लहर जैसे कारक शामिल हैं. वैसे बतौर कांग्रेस उपाध्यक्ष भी राहुल के पास पार्टी के सभी मामलों पर पूरा नियंत्रण रहा है. लेकिन अब कांग्रेस के शीर्ष पद पर उनकी तरक्की से पार्टी को नई जिंदगी मिल सकती है.

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इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि अगर राहुल के नेतृत्व में कांग्रेस मजबूत होगी तो उससे लोकतंत्र का फायदा होगा. ऐसा इसलिए क्योंकि साल 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद जब से कांग्रेस का पतन शुरू हुआ, तब से केंद्र की शक्तिशाली मोदी सरकार के फैसलों और नीतियों पर सवाल पूछ सकने वाले राजनीतिक विपक्ष का सर्वथा अभाव है. जो कि एक लोकतंत्र के लिए बुरा संकेत है. लिहाजा ऐसा देखा गया है कि, मजबूत विपक्ष के अभाव में अक्सर मीडिया उसकी भूमिका निभा रही है.

'ब्रैंड-न्यू' गांधी यानी नए-नवेले राहुल गांधी को अब जनता और राजनीतिक विरोधी गंभीरता से लेने लगे हैं. अतीत की अपनी छवि से छुटकारा पाकर राहुल अब जननेता के तौर पर सामने आए हैं. ऐसे में राहुल अगर कांग्रेस अध्यक्ष के तौर पर कामयाब होते हैं, तो उससे न सिर्फ पार्टी अपना खोया हुआ गौरव दोबारा हासिल कर सकेगी, बल्कि इससे लोकतंत्र का भी भला होगा. वहीं राहुल देश की जनता के सामने मोदी के अलावा एक और राजनीतिक विकल्प के तौर पर सामने आएंगे. लेकिन फिलहाल सभी के जेहन में एक ही सवाल है कि क्या राहुल गांधी ऐसा कर पाएंगे?

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