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NCC की कम जानकारी पर राहुल का मजाक बनाने वालों, इतनी ज्यादती ठीक नहीं

सवाल पूछने वाला महज छात्र-छात्रा या कोई अदना आदमी हो, जरूरी नहीं. वह छद्म रूप में किसी दूसरी पार्टी का एजेंट भी हो सकता है

Updated On: Mar 26, 2018 05:40 PM IST

Ravi kant Singh

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NCC की कम जानकारी पर राहुल का मजाक बनाने वालों, इतनी ज्यादती ठीक नहीं

मैसूर के एक महिला कॉलेज में शनिवार को दिलचस्प वाकया हुआ. मौका था राहुल गांधी और कॉलेज की छात्राओं के मेल मुलाकात के दौर का. कार्यक्रम में सवाल-जवाब होगा, इसकी योजना पहले से तय थी. सो, राहुल गांधी से एक छात्रा ने पूछा कि अगर वह एनसीसी के 'सी' सर्टिफिकेट का एग्‍जाम पास कर लेती हैं, तो उसे क्‍या लाभ होगा? क्‍या उसे इससे आगे सेना में जाने में मदद मिलेगी? लेकिन राहुल गांधी को इस बारे में कुछ पता नहीं था. इसलिए उन्होंने छात्रा से बोल दिया कि एनसीसी की ट्रेनिंग के बारे में उन्‍हें कुछ जानकारी नहीं है. इसलिए वो सवाल का जवाब नहीं दे पाएंगे.

राहुल ने उधर जवाब दिया और इधर ट्विटर पर लोगों ने उन्हें ‘ट्रोल’ करना शुरू कर दिया. जमकर मजाक उड़ाए गए और एनसीसी को नेशनल कांग्रेस कोर तक बताया गया. सवाल है कि क्या दुनिया का हर शख्स सर्वज्ञानी हो सकता है? क्या किसी नेता को गूगल की तरह इतना प्रॉम्ट होना चाहिए कि इधर सवाल पूछा और उधर से जवाब आ जाए? क्या ट्रोल की यह परिपाटी नेताओं को सवाल-जवाब से वंचित नहीं करेगी? क्या इससे अपने नेता रटी-रटाई बातें नहीं बोलेंगे और उन्हीं सवालों के जवाब नहीं देंगे, जो पहले से तय हों, जिन पर वे रिहर्सल कर चुके हों? हां, ट्रोल का असर ऐसा ही होने वाला है.

कहां गया सवाल-जवाब का दौर

याद करें अरविंद केजरीवाल के सवाल-जवाब के खुले सत्र को. इंटरेक्शन के दौरान तब कोई भी उनसे सवाल पूछ सकता था. वे जवाब भी देते थे. लेकिन अब यह दौर समाप्त हो चला है. ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि खुले सत्र के खतरे बहुत हैं. सवाल पूछने वाला महज छात्र-छात्रा या कोई अदना आदमी हो, जरूरी नहीं. वह छद्म रूप में किसी दूसरी पार्टी का एजेंट भी हो सकता है. सवाल भी ऐसे हो सकते हैं कि लाइव प्रसारण में किसी को जलील किया जाए. किसी को शर्मिंदा किया जाए. बाद में ट्रोल की भी तैयारी मुकम्मल हो. लिहाजा कई नेताओं ने इससे दूरी बना ली है.

फोटो रॉयटर से

फोटो रॉयटर से

जब राहुल गांधी ट्रोल हो रहे थे, उस वक्त सोशल मीडिया पर ऐसे भी बयान देखने को मिले जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर सीधा हमला था. यूजर्स ने यहां तक कहा कि राहुल को हो सकता है एनसीसी की जानकारी न हो. इसमें कोई बुराई भी नहीं. उन्होंने ईमानदारी से इसे कबूला, कम से कम इसकी तारीफ तो बनती है. यूजर्स ने आरोप लगाए कि पीएम मोदी के लिए पहले से सवाल तय होते हैं कि उनसे क्या पूछना है.

फिलहाल राहुल गांधी के साथ ऐसा नहीं है क्योंकि उन्होंने लोगों से जुड़ने की अभी शुरुआत की है. अभी से वे ‘रणछोड़ दास’ नहीं हो सकते क्योंकि उन्होंने भी ‘स्क्रिप्टेड’ सवाल लेना शुरू किया तो उनके ‘जनसंपर्क’ का पलीता लग सकता है.

मैसूर में राहुल गांधी के जवाब पर मीनमेख निकालने से ज्यादा यह मंथन करना जरूरी है कि क्या देश में नेताओं की कोई पीढ़ी बची है जो लोगों के सवाल ले सके. सवाल ले भी तो उसका जवाब दे. और जवाब न पता हो तो उसे स्वीकारे. शायद नहीं क्योंकि देश की राजनीति और नेताओं के जनसंपर्क अब सवाल-जवाब से बहुत आगे निकल चुके हैं.

राहुल का सिंगापुर प्रकरण

ताजा मामला राहुल गांधी का सिंगापुर प्रकरण है. सिंगापुर के ली कुआन यिऊ स्कूल ऑफ पब्लिक पॉलिसी में एक डिस्कशन में राहुल गांधी हिस्सा ले रहे थे. कार्यक्रम के मॉडरेटर ने उनसे पूछा कि क्या वो बताना चाहेंगे कि भारत में जबतक नेहरू-गांधी की सरकार रही, तब तक विकास क्यों नहीं हुआ? राहुल ने कहा कि वो इसका जवाब जरूर देना चाहेंगे. उन्होंने जवाब की शुरुआत सवाल से करते हुए कहा, 'क्या आप सहमत हैं कि भारत आज सफल है?' मॉडरेटर ने जवाब दिया कि हां, जब से कांग्रेस ने प्रधानमंत्री का पद छोड़ा है, तबसे भारत सफल है, इस पर राहुल ने कहा कि 'तो मतलब आपका कहना है कि 2004 से आज तक भारतीय राजनीति में मेरा कोई रोल नहीं रहा? या तो मेरा रोल रहा है या नहीं रहा है. आप मुझे दोनों विकल्प नहीं दे सकते.'

राहुल चाहते तो इस सवाल पर चिढ़ सकते थे, जैसा कि अन्य नेताओं के इंटरव्यू में देखा जाता है लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया. कारण स्पष्ट है कि सीखने वालों के लिए रास्ते हमेशा खुले रहते हैं. फिर रास्ता चाहे सियासत का ही क्यों न.

एक वाकया यहां और मौजूं है. अगर कोई शख्स संसद में खड़ा होकर यह कह सकता है कि उसे फलां-फलां बातों की  जानकारी नहीं है, तो हमें इसमें बुरा क्या है. बुरा तब होता जब कोई जनप्रतिनिधि संसद या विधानसभा में सरपट झूठ बोलता. विरोध होने पर उसे जायज भी ठहराता. राहुल गांधी इससे बचते आए हैं. इसे बुरा कतई नहीं मान सकते क्योंकि डंके की चोट पर झूठ बोलने से अच्छा है विनम्रता से अपनी कमी स्वीकार करना. राहुल गांधी ने मैसूर में ऐसा ही किया. टि्वटर यूजर्स को चाहिए कि वे किसी पार्टी के एजेंट ना बनें और खामखां किसी को निशाने पर ना लें क्योंकि इससे बनना कुछ नहीं है सिवाय रायता फैलने के.

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