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ऐसे ही ऊटपटांग बयान देते रहेंगे तो 2019 में मोदी को चैलेंज कैसे करेंगे राहुल?

राहुल गांधी ने अपने ज्ञान, भारतीय समाज और अर्थव्यवस्था के बारे में जानकारी देकर अपनी भलाई से ज्यादा नुकसान ही किया है

Sanjay Singh Updated On: Jun 12, 2018 09:25 AM IST

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ऐसे ही ऊटपटांग बयान देते रहेंगे तो 2019 में मोदी को चैलेंज कैसे करेंगे राहुल?

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी का ताजातरीन ज्ञान अमेरिका के एक 'शिकंजीवाला' और एक 'ढाबावाला' पर है. उनके मुताबिक इन दोनों ने कोका-कोला और मैकडोनाल्ड्स की शुरुआत की थी. इससे फिर ये बहस छिड़ गई है क्या कांग्रेस अध्यक्ष में खुद को नरेंद्र मोदी के विकल्प के रूप में पेश करने की क्षमता है, जिससे वो अगले साल प्रधानमंत्री पद पर आसीन हो सकें.

कांग्रेस अध्यक्ष ने नई दिल्ली में सोमवार को पार्टी के ओबीसी सम्मेलन में कोका-कोला और मैकडोनाल्ड्स की शुरुआत को लेकर विस्तार से बात की. उनका इरादा देशभर में ओबीसी समुदाय को पार्टी की तरफ खींचना था, जिससे ये समुदाय अगले आम चुनाव में कांग्रेस को वोट दें.

राहुल गांधी ने अपनी बात कुछ इस तरह रखी: 'कोका कोला कंपनी का नाम सुना है आपने. अब बताओ कोका कोला किसने शुरू किया. कोई जानता है. मैं बताता हूं, वो अमेरिका में शिकंजी बेचता था, पानी में चीनी मिलाता था, उसके एक्सपीरियंस का आदर हुआ, हुनर का आदर हुआ, पैसा मिला, कोका कोला कंपनी बनाया. मैकडोनाल्ड्स का नाम सुना है, सब जगह नाम लिखा है. उसको चालू किसने किया. कौन था वो ढाबा चलाता था. आप मुझे वो ढाबा वाला दिखा दो जिसने (भारत में) कोका कोला कंपनी बनाई हो. कहां है वो.'

राहुल ने अपना नुकसान किया

कांग्रेस अध्यक्ष की दलील ये थी कि बैंक और सत्ता जैसे अवसर के दरवाजे छोटे उद्यमियों और ओबीसी समुदाय के लोगों के लिए बंद हैं. राहुल ने उपस्थित लोगों से कहा कि वो (ओबीसी) को कॉरपोरेशन, विधानसभा और संसद में देखना चाहते हैं. यह कहकर कांग्रेस पार्टी की तरफ से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार राहुल गांधी ने अपने ज्ञान, भारतीय समाज और अर्थव्यवस्था के बारे में जानकारी और देश का नेतृत्व करने की अपनी योग्यता के बारे में बनी लोकप्रिय अवधारणा को लेकर अपनी भलाई से ज्यादा नुकसान ही किया है

अगर राहुल ने बड़ा काम करने वाले किसी शिकंजीवाले या ढाबे वाले के बारे में, या पहली पीढ़ी में ही गरीब से अमीर बनने वाले किसी भारतीय कारोबारी, जिसने अर्थव्यवस्था में हलचल पैदा की और वैश्विक स्तर पर नाम कमाया, के बारे में पहली बार सुना है तो यह उनकी समस्या है.

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लेकिन उनका ये कहना कि कोका-कोला जैसी कोई कहानी उन्हें भारत में नहीं मिली, तो इसके लिए उन्हें अपने परनाना जवाहर लाल नेहरू और दादी इंदिरा गांधी को दोष देना चाहिए. इन दोनों का विश्वास समाजवादी अर्थव्यवस्था में था, जहां अर्थव्यवस्था पर राज्य का नियंत्रण होता है और वही नमक, साइकिल, घड़ी से लेकर सबकुछ बनाता है और होटल भी चलाता है. यहां तक कि निजी क्षेत्र में भी उत्पादन पर नियंत्रण रखा जाता है. राहुल गांधी जो सवाल पूछ रहे हैं, उसके लिए 60 साल तक सीधे या फिर रिमोट कंट्रोल के जरिए देश पर शासन करने वाला उनका परिवार ही जिम्मेदार है.

अपनी दलीलों को खुद एक बार जांचे राहुल

ये कहकर कि छोटे उद्यमियों और ओबीसी समुदाय के लिए बैंकों के दरवाजे बंद हैं, राहुल गांधी सिर्फ यही बता रहे हैं कि छह दशक तक उनके परिवार ने इस देश पर किस तरह शासन किया और आजादी के बाद किस तरह की बैंकिंग व्यवस्था और वित्तीय संस्थान खड़े किए. ऐसा लगता है कि राहुल गांधी ने नरेंद्र मोदी सरकार की ओर से पिछले कुछ सालों में गरीबों के लिए शुरू जीरो-बैलेंस वाले जन-धन बैंक खातों या फिर मुद्रा योजना और स्टार्ट अप इंडिया के बारे में नहीं सुना है.

दूसरा, जब राहुल गांधी ये कहते हैं कि वो ओबीसी को सामाजिक और राजनीतिक क्षेत्र में फलने-फूलने का मौका देंगे तो निश्चित रूप से उन्होंने मंडल आयोग और भारतीय राजनीति के मंडलीकरण के बारे मे नहीं सुना है. भारतीय राजनीति का कोई भी छात्र ये नहीं कह सकता कि स्थानीय निकाय, राज्य विधान सभाओं और संसद में ओबीसी का प्रतिनिधित्व कम है. हालांकि उनके पास इस पर बहस शुरू करने की इच्छा या शक्ति नहीं है कि ओबीसी प्रतिनिधित्व का एक बड़ा हिस्सा ओबीसी में प्रभावशाली जातियां क्यों ले जाती हैं और इसका फायदा पिछड़ों में अति पिछड़ों को क्यों नहीं मिलता है. कांग्रेस अध्यक्ष इस स्थिति का विश्लेषण एक के बाद एक राज्य और दलों के आधार पर भी कर सकते हैं.

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क्षेत्रीय दलों के पाले में ओबीसी बैंक

इसके अलावा, उनकी पार्टी हरियाणा और गुजरात में सामाजिक और आर्थिक रूप से मजबूत और राजनीतिक रूप से प्रभावी जाट और पाटीदरों के लिए आरक्षण की मांग के लिए सबसे आगे रही है. लेकिन वो इस बारे में इसलिए बात नहीं करते क्योंकि इससे पिछड़ों में अति पिछड़ों का और मोहभंग हो जाएगा. राज्यों में प्रभावी ओबीसी वोटबैंक अधिकतर क्षेत्रीय दलों के पाले में चला गया है.

मुख्यधारा के अधिकतर राष्ट्रीय और क्षेत्रीय दलों की अगुवाई अब ओबीसी समुदाय के नेता कर रहे हैं. राहुल गांधी की अगुवाई वाली कांग्रेस इसका अपवाद है. वो एकमात्र ऐसे नेता हैं जो खुलकर अपनी जाति का ढिंढोरा पीटते हैं और खुद को 'न सिर्फ हिंदू बल्कि जनेऊधारी हिंदू (ब्राह्मण)' बताते हैं. लेकिन गुजरात विधानसभा चुनाव खत्म होने के बाद अब कांग्रेस और उनके अध्यक्ष को यह बात याद नहीं है.

तीसरा, लगता है कि राहुल गांधी यह भी भूल गए हैं कि प्रधानमंत्री पद के लिए उनके प्रमुख विरोधी नरेंद्र मोदी की पृष्ठभूमि साधारण या चाय बेचने वाले की है. 2014 लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान मोदी और उनकी पार्टी ने पूरी दुनिया को ये बता दिया कि चायवाला के साथ वो अति पिछड़ा समुदाय से ताल्लुक रखते हैं. राहुल शायद इस ओर ध्यान नहीं देना चाहते हैं कि ओबीसी को अपनी तरफ खींचने के लिए मोदी और बीजेपी क्या कहते और करते है.

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