S M L

राहुल गांधी मोदीफोबिया से ग्रस्त क्यों हैं?

हर तीसरे वाक्य में मोदी का जिक्र होना मोदी-फोबिया ही दिखाता है

Updated On: Jan 12, 2017 09:15 AM IST

Suresh Bafna
वरिष्ठ पत्रकार

0
राहुल गांधी मोदीफोबिया से ग्रस्त क्यों हैं?

दिल्ली के तालकटोरा स्टेडियम में बुधवार को कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने नया सिद्धांत प्रतिपादित किया कि कांग्रेस पार्टी का अर्थ है ‘डरो मत’. लेकिन उनके भाषण को सुनकर लगता है कि वे सबसे अधिक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से डरे हुए हैं.

राहुल गांधी के भाषण के हर तीसरे वाक्य में मोदी का जिक्र होना इस बात का सबूत हैं कि वे मोदीफोबिया से बुरी तरह ग्रस्त हैं. 131 साल पुरानी कांग्रेस पार्टी के होनेवाले अध्यक्ष राहुल गांधी की यह स्थिति देश के लोकतंत्र के लिए शुभ नहीं है.

इस देश की जनता को न तो नरेंद्र मोदी और न ही राहुल गांधी डरा सकते हैं. राहुल का यह आरोप भी हास्यास्पद है कि मीडिया के लोग नरेंद्र मोदी से डरकर अपनी बात खुलकर नहीं रख रहे हैं. राहुल गांधी को यह समझना चाहिए कि इंटरनेट के युग में कोई भी बात छिपाना संभव नहीं है.

दबाई नहीं जा सकतीं खबरें 

यदि कोई न्यूज चैनल या अखबार कोई खबर प्रसारित या प्रकाशित नहीं करता है तो उसके प्रतियोगी मीडिया ग्रुप में वह खबर प्रसारित हो जाती है. यदि मेनस्ट्रीम मीडिया किसी खबर को प्रसारित करने में दिलचस्पी नहीं लेता है तो इंटरनेट पर हजारों पोर्टल व सोशल मीडिया के माध्यम से वह खबर आम लोगों तक पहुंच सकती है. मीडिया पर आरोप लगाने के पहले राहुल गांधी को थोड़ा-सा अध्ययन कर लेना चाहिए था.

तालकटोरा स्टेडियम में राहुल गांधी ने सहारा और बिड़ला डायरी के संदर्भ में नरेंद्र मोदी पर भ्रष्टाचार के वही आरोप लगाए, जो पिछले एक महीने के दौरान वे हर जनसभा में लगाते रहे हैं.

राहुल के भाषण के एक घंटे पहले ही सुप्रीम कोर्ट ने इन आरोपों के आधार पर जांच का आदेश देने से इंकार कर दिया. सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी व निर्णय के संदर्भ में राहुल के ये आरोप मोदी पर चिपक नहीं रहे हैं.

दिलचस्प बात यह थी कि जिस वक्त तालकटोरा स्टेडियम में राहुल गांधी मोदी पर आरोप लगा रहे थे, उसी क्षण वहां दिल्ली की पूर्व मुख्‍यमंत्री शीला दीक्षित सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का स्वागत कर रही थीं. सहारा डायरी में शीला दीक्षित पर आरोप था कि उनको भी धन दिया गया था. सहारा डायरी के आधार पर मोदी पर आरोप लगाने के पहले शीला दीक्षित को कांग्रेस से बाहर करने का निर्णय लेना चाहिए था.

विपक्ष के नेता के तौर पर राहुल द्वारा नोटबंदी पर मोदी की आलोचना को समझा जा सकता है, लेकिन यह कहना कितना उचित है कि मोदी पद्मासन ठीक से नहीं कर पाते हैं और उन्होंने झाड़ू ठीक से नहीं पकड़ रखी थी? इस तरह की टिप्पणियों से राहुल की मानसिक स्थिति का ही अंदाजा लगाया जा सकता है.

तालकटोरा स्टेडियम में श्रोताअों के रूप में कांग्रेस पार्टी के वरिष्ठ नेता बैठे हुए थे, इसलिए राहुल गांधी से यह उम्मीद की जा रही थी कि वे जनसभाअों से हटकर भाषण देंगे, लेकिन उनका 75 प्रतिशत भाषण और वाक्य वही थे, जो वे कई जनसभाअों में बोल चुके थे. इन पुराने वाक्यों पर कांग्रेसी नेता तालियां बजाना नहीं भूलते थे.

कमजोर संगठन से जूझ रही है कांग्रेस 

कांग्रेस पार्टी की सबसे बड़ी समस्या उसके संगठन का कमजोर होना है. कई राज्यों में सालों तक कांग्रेस अध्यक्ष की नियुक्ति या राज्य की कार्यकारिणी का गठन नहीं हुआ है. राहुल गांधी को चाहिए कि वे मोदी सरकार पर आक्रामक रुख अख्तियार करने के साथ-साथ पार्टी संगठन को मजबूत करने की दिशा में भी कदम उठाए. उत्तर प्रदेश में चुनावी हार पर कई रिपोर्ट्स पर धूल की मोटी परतें जमी हुई हैं.

सोनिया गांधी अभी भी आधिकारिक रूप से कांग्रेस में नंबर एक हैं. (रॉयटर्स)

सोनिया गांधी अभी भी आधिकारिक रूप से कांग्रेस में नंबर एक हैं. (रॉयटर्स)

तालकटोरा स्टेडियम में नोटबंदी पर हुए इस जनवेदना सम्मेलन का एक संदेश यह भी है कि राहुल गांधी अभी औपचारिक रूप से कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष नहीं बने हैं, लेकिन अनौपचारिक तौर पर यह जिम्मेदारी निभाना शुरू कर दिया है. कांग्रेस पार्टी के लिए बेहतर होगा कि वे अविलंब औपचारिक तौर पर कांग्रेस अध्यक्ष जिम्मेदारी ग्रहण कर लें.

0

अन्य बड़ी खबरें

वीडियो
#MeToo पर Neha Dhupia

क्रिकेट स्कोर्स और भी

Firstpost Hindi