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यूरोप में राहुल गांधी: विदेश से बीजेपी पर हमलों के मायने क्या हैं?

राहुल गांधी भी इस कोशिश में हैं कि विदेशों में बसे भारतीय नागरिकों को पहले प्रभावित करने की कोशिश की जाए

Updated On: Aug 25, 2018 11:17 AM IST

Syed Mojiz Imam
स्वतंत्र पत्रकार

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यूरोप में राहुल गांधी: विदेश से बीजेपी पर हमलों के मायने क्या हैं?

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी यूरोप की यात्रा पर हैं. पहले जर्मनी में फिर ब्रिटेन में राहुल गांधी ने बीजेपी और आरएसएस पर निशाना साधा है. जर्मनी में राहुल गांधी ने कहा कि मॉब लिंचिंग की वजह बेरोजगारी है. इससे आगे बढ़ते हुए आईएसआईएस जैसे हालात पैदा होने का अंदेशा जताया है. जिसके बाद बीजेपी ने इस मसले को तूल दिया और विवाद को बढ़ा दिया लेकिन इससे बेपरवाह राहुल गांधी ने संघ परिवार पर एक धर्म की सत्ता का समर्थन करने का आरोप लगा दिया. उन्होंने संघ परिवार की तुलना मुस्लिम ब्रदरहुड से की है, जो कट्टरपंथी संगठन है.

ऐसा नहीं है कि राहुल गांधी ये सब अनजाने में बोल रहे हैं बल्कि ये सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है. राहुल गांधी का एनआरआई कम्यूनिटी के बीच चुनाव अभियान का आगाज़ है. एक तरफ तो ये दिखाना चाहते हैं कि कांग्रेस एक प्रोग्रेसिव पार्टी है, जो बीजेपी नहीं है. दूसरी और वो कांग्रेस के पक्ष में माहौल बनाने का प्रयास कर रहे हैं.

विदेश में क्यों बयानबाजी?

2014 के चुनाव में मोदी के पक्ष में माहौल बनाने का काम एनआरआई कम्यूनिटी ने बखूबी निभाया था. प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेंद्र मोदी के दौरे में इस कम्यूनिटी का उत्साह इसकी गवाही देता है. राहुल गांधी भी इस कोशिश में हैं कि विदेशों में बसे भारतीय नागरिकों को पहले प्रभावित करने की कोशिश की जाए. हालांकि राहुल गांधी के पास मोदी वाला करिश्मा नहीं है. लेकिन जिस तरह से राहुल गांधी प्रभावी ढंग से अपनी बात रख रहे हैं. उसका असर चुनाव तक हो सकता है, जो माहौल बीजेपी के पक्ष में था वो कांग्रेस के साथ आ सकता है.

धार्मिक सहिष्णुता का मुद्दा

जिस तरह से देशभर में मॉब लिंचिंग की घटनाए हुई है, उससे कांग्रेस के आरोपों को ताकत मिली है. बीजेपी की सरकारें इसको रोक पाने में कामयाब नहीं हुई हैं. जो घटनाएं हुई हैं, उसमें पुलिस की लापरवाही भी सामने आ रही है. इन घटनाओं का विदेश में कवरेज हो रहा है, जिससे लोगों को पता है. राहुल गांधी ये सब याद दिला रहे हैं. विदेश में रह रहे भारतीय अल्पसंख्यक हैं, उनको पता है कि अल्पसंख्यक होने के क्या दुख-दर्द हैं.

जिस तरह से यूरोप को आतंकी सगठनों ने निशाना बनाया है, उससे वहां के लोग आगाह हैं. राहुल ने इसमें संघ परिवार को भी लपेट लिया है, जिससे ये लगता है कि राहुल गांधी से समझ गए है कि बीजेपी का कोर समर्थक हिल नहीं रहा है. उस पर मेहनत बेकार है.

अब विदेशी धरती से गैर बीजेपी समर्थक को कांग्रेस के साथ लाने की कोशिश कर रहे हैं. राहुल को लग रहा है कि हिंदुत्व के मैदान में बीजेपी से लड़ना मुफीद नहीं है. इस मामले में कांग्रेस का दायरा सीमित है. पार्टी की विचारधारा इस बात की इजाज़त नहीं देता है. हिंदुत्व की लाइन पर ज्यादा चलना मुश्किल है. हालांकि राहुल गांधी बीजेपी के जवाब में सॉफ्ट हिंदू वाला काम करते रहेंगे. लेकिन गुजरात में इसका फायदा नहीं मिला है ना ही कर्नाटक में पार्टी को बहुमत मिल पाया है.

बेरोजगारी का मुद्दा, मीडिया का ध्यान

बेरोजगारी का मसला इस वक्त सबसे बड़ा मुद्दा है. नोटबंदी की वजह से बेरोजगारी में इज़ाफा हुआ है. लेकिन यही बात राहुल गांधी भारत में कहते हैं तो कोई गौर नहीं करता है. विदेश में कहा तो मीडिया ने भी ध्यान दिया है. भारत में इसको लेकर बहस तेज़ हो गई है. भले ही कांग्रेस अध्यक्ष की डिबेट में निंदा की जा रही है. लेकिन वो मीडिया का ध्यान खींचने में कामयाब रहे हैं, जिस बात को राहुल गांधी जनता के बीच पहुंचाने की कोशिश कर रहें है, वो आसानी से अंजाम तक पहुंच गया है.

लिंचिंग की वजह बेरोज़गारी

बाकायदा राहुल गांधी ने मॉब लिंचिंग का मुद्दा सांप्रदायिकता से हटाकर बेरोज़गारी से जोड़ दिया है, जो सामाजिक मसला बन गया है. बीजेपी इस मामले में राहुल गांधी के ट्रैप में फंस गई है. बीजेपी विदेश में देश को बदनाम करने का राग अलापती रही. वहीं बड़े करीने से राहुल गांधी ने सामान्य हिंदू को लिंचिंग के आरोप से बरी कर दिया है. जो धारणा बन रही थी कि इस तरह की घटना हिंदू-मुस्लिम के बीच संघर्ष का नतीजा है. उसे खारिज कर दिया बल्कि इस मामले को बेरोज़गारी से जोड़कर नए बहस की तरफ मोड़ दिया है. युवकों को कांग्रेस की तरफ आकर्षित करने की कवायद भी है.

सेंट्रिस्ट आइडिया की पैरोकारी

राहुल गांधी पार्टी की कोर विचारधारा को प्रमोट कर रहे हैं, जिसमें कांग्रेस सभी को साथ लेकर चलने का दावा करती है. लेकिन हालात ऐसे नहीं हैं. कांग्रेस के भीतर 'म' शब्द से परहेज 2014 के बाद से दिखाई दे रहा है. पार्टी की वर्किंग कमेटी में इसकी झलक साफ है. जहां नए अल्पसंख्यक चेहरों को मौका नहीं दिया गया है. ज़ाहिर है कि कांग्रेस अध्यक्ष को अपनी पार्टी के भीतर बहुसंख्यक की राजनीति के हिमायती लोगों को पहचान कर पार्टी को दुरुस्त करने की जरूरत है. कांग्रेस को राजनीतिक नफा-नुकसान का सोचकर बिना आगे बढ़ना ही धर्मनिरपेक्ष राजनीति की पैरोकारी होगी.

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं)

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