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कांग्रेस की झप्पी पॉलिटिक्स: पड़ जा गले... से बात नहीं बनने वाली

दिल्ली के राजीव चौक मेट्रो स्टेशन के बाहर खड़े हो कर कांग्रेसी कार्यकर्ताओं ने ‘झप्पी सेवा’ यानी गले लगाने का कार्यक्रम रखा और आते-जाते लोगों को गले लगाकर राहुल की ‘गांधीगीरी’ का संदेश दिया

Updated On: Jul 25, 2018 03:25 PM IST

Kinshuk Praval Kinshuk Praval

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कांग्रेस की झप्पी पॉलिटिक्स: पड़ जा गले... से बात नहीं बनने वाली

कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से,

ये नए मिज़ाज का शहर है ज़रा फ़ासले से मिला करो

मशहूर शायर बशीर बद्र की ये चंद तहरीरें पूरे शहर के बेगाने होने की दास्तां कहती हैं. लेकिन सियासी शहर में अवाम का मिज़ाज पढ़ने वाली राजनीतिक पार्टियों में ‘तपाक’ से गले मिलने की होड़ शुरू हो गई है. दरअसल, संसद में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के गले लगने के बाद अब कांग्रेस की रणनीति में ‘झप्पी पॉलिटिक्स’ की एन्ट्री हो गई है.

दिल्ली में कांग्रेसी कार्यकर्ताओं ने गले लगाने का 'अभूतपूर्व' काम शुरू किया है. राजीव चौक मेट्रो स्टेशन के बाहर खड़े हो कर कांग्रेसी कार्यकर्ताओं ने ‘झप्पी सेवा’ यानी गले लगाने का कार्यक्रम रखा. आते-जाते लोगों को कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने गले लगाकर राहुल की ‘गांधीगीरी’ का संदेश दिया.

संदेश का सार ये है कि देश से नफरत को मिटाना है और राहुल के सपनों को सच करना है. इन कार्यकर्ताओं के हाथ में राहुल-मोदी की गले मिलने वाली तस्वीरें थीं. जिसमें लिखा था कि 'नफरत मिटाओ और देश बचाओ'. कांग्रेस को शायद उम्मीद है कि उसकी ये 'स्कीम' देश में मनरेगा योजना की तरह ही पॉपुलर हो सकती है.

कुछ इसी तरह फिल्म 'लगे रहो मुन्नाभाई' के बाद 'गांधीगीरी' का दौर देश की राजनीति में देखने को मिला था. लोग फूल और गुलदस्ता लेकर अपना विरोध जताते थे. ‘गेट वेल सून’ कहा करते थे. सरकार-प्रशासन की नीतियों के खिलाफ या फिर आपसी गिले-शिकवे भुलाने के लिए फूल दिए जाने लगे थे. झप्पियां देकर अपनी भावनाओं को इजहार करते थे.

राहुल गांधी की 'झप्पी' बनी  गांधीगीरी का नया स्टाइल 

लेकिन रीयल लाइफ में देश में लगभग खत्म हो चुकी या अपने अस्तित्व के लिए जूझ रही इस 'परंपरा' को कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने ही संसद में फिर से जीवित करने का काम किया है. तभी अब नए दौर में राहुल गांधी की 'झप्पी' कांग्रेस के नए युग में गांधीगीरी का नया स्टाइल बन गई है.

rahul gandhi poster

राहुल पीएम को गले लगा कर कह रहे हैं कि 'वो गुस्से को गले लगा कर जीतेंगे'. उनकी भावनात्मक अपील में सिस्टम को लेकर आक्रोश और गुस्सा साफ देखा जा सकता है. लेकिन उनका भाव गले लगाने और प्यार बांटने का है जिसे शायद संसद में सत्ता पक्ष नहीं समझ सका.

कांग्रेस की गांधीगीरी का ये नया पैटर्न राहुल से प्रेरित है और उन्हीं के प्रचार के लिए भी है. गले लगाकर अभिभूत होने वाले कांग्रेसी कार्यकर्ताओं का कहना है कि राहुल गांधी ने जिस तरह संसद में प्रधानमंत्री को गले लगा कर नफरत मिटाने का संदेश दिया, उसे लोगों तक पहुंचाया जा रहा है. ऐसा लग रहा है कि कांग्रेस ने सियासत के ब्लैक-बोर्ड पर पहले नफरत शब्द लिखा और फिर राहुल गांधी ने उसे डस्टर से मिटा दिया.

लेकिन पीएम मोदी को गले लगाने के बाद राहुल गांधी ने अपनी आंखों का 'चमत्कार' भी दिखाया था. आंखों का वो 'करिश्मा' पोस्टरों और तस्वीर से गायब है. शायद कांग्रेस उसे छुपाना चाहती है. ना मालूम क्यों इस मामले में हाथों में गले मिलने वाली तस्वीर थामे आम आदमी को गले लगाती कांग्रेस आंखें चुरा रही है. तस्वीर में सिर्फ गले मिलने वाला सीन है जबकि उसके बाद का वो दृश्य नहीं है जिसमें राहुल की आंखों की 'गुस्ताखियां' झलक रही हैं. पीएम मोदी से गले मिलने से ज्यादा राहुल के आंख मारने की अदा ने मीडिया और सोशल मीडिया पर सुर्खियां बटोरी हैं.

कांग्रेस के युवा कार्यकर्ताओं में आम आदमी को गले लगाने का जोश दिखाई दे रहा है तो पार्टी के बुजुर्ग और वरिष्ठ नेता कह रहे हैं कि- लगे रहो राहुल!

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कांग्रेस के लिए ये तस्वीर अब कांग्रेस घोषणा-पत्र का मुखपृष्ठ भी हो सकती है क्योंकि ऐसा लग रहा है जैसे राहुल ने संसद में पीएम मोदी को गले लगाकर मानो एक नया संविधान ही गढ़ दिया हो. तभी मुंबई में कांग्रेस नेता संजय निरुपम ने बिना देर किए ही दो दिन पहले पीएम मोदी से गले मिलने वाली राहुल की तस्वीर के पोस्टर भी छपवा डाले.

बीजेपी के गले पड़ते हुए नजर आ रही है कांग्रेस की नई गांधीगीरी

कांग्रेस के पोस्टरों को लेकर बीजेपी का विरोध भी जायज है. सत्तर साल से कांग्रेस के पोस्टरों में गांधी-नेहरू-इंदिरा-राजीव-सोनिया को देश देख रहा था. लेकिन अब राहुल के साथ पीएम मोदी को दिखाया जा रहा है. इससे लग रहा है कि कांग्रेस की नई गांधीगीरी बीजेपी के 'गले पड़' ही गई है. बीजेपी का आरोप है कि राहुल के प्रचार के लिए कांग्रेस पीएम मोदी का सहारा ले रही है.

कांग्रेस भले ही मोदी सरकार के खिलाफ अपने प्रचार अभियान में गले मिलने का सहारा ले रही हो लेकिन साल 2019 के लोकसभा चुनाव में मोदी विरोधी दल आपस में गले मिलने को तैयार नहीं दिख रहे हैं. उनके लिए विपक्ष का महागठबंधन ‘गले की हड्डी’ जैसा दिख रहा है. यहां तक कि पीएम पद की उम्मीदवारी को लेकर भी उनके बीच में ‘गला-काट’ कॉम्पिटिशन है.

बहरहाल पार्टियों के ‘गले-गले तक’ भरी सियासत में अगर गले मिलने की परंपरा जन्म ले रही है तो इसे देखकर कहीं जनता का 'गला न भर आए'  क्योंकि जनता ये जानती है कि चुनाव के बाद गले लगाने वाली सियासी पार्टियां ठीक वैसे ही आंख मारती हैं जैसा कि राहुल ने पीएम को गले लगाने के बाद किया था.

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