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राहुल भले ही नामदार हों लेकिन कांग्रेस में काम करने वालों को दे रहे हैं तरजीह

राहुल गांधी ने कांग्रेस की कमेटियों में नामदारों की जगह कामदारों को तरजीह दी है. कांग्रेस में तकरीबन 44 मे से 30 सचिव ऐसे नियुक्त किए गए है, जिनकी कोई परिवारिक राजनीतिक पृष्ठभूमि नहीं है

Updated On: May 03, 2018 04:00 PM IST

Syed Mojiz Imam
स्वतंत्र पत्रकार

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राहुल भले ही नामदार हों लेकिन कांग्रेस में काम करने वालों को दे रहे हैं तरजीह

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राहुल गांधी पर नामदार कहकर वार किया है.प्रधानमंत्री ये बताना चाहते थे कि राहुल गांधी राजनीति में अपने सरनेम की वजह से हैं. लेकिन राहुल गांधी ने कांग्रेस की कमेटियों में नामदारों की जगह कामदारों को तरजीह दी है. कांग्रेस में तकरीबन 44 मे से 30 सचिव ऐसे नियुक्त किए गए है, जिनकी कोई परिवारिक राजनीतिक पृष्ठभूमि नहीं है. इसके अलावा कांग्रेस में लगातार नए लोगों को लाने का प्रयास राहुल गांधी कर रहे हैं.

अभी हाल के नियुक्तियों में देखें तो राहुल गांधी ने दिल्ली के अनिल चौधरी को सचिव नियुक्त किया है, जो ओडिशा के इंचार्ज हैं. शेख मस्तान वली आंध्र प्रदेश से हैं. इनको भी ओडिशा का सहप्रभारी बनाया गया है. कांग्रेस के सचिव और बिहार से एमएलए शकील अहमद खान खुद भी बिना राजनीतिक पृष्ठभूमि वाले नेता हैं. शकील अहमद का कहना है कि राहुल गांधी जब से राजनीति में आए हैं, तब से उनकी कोशिश है कि नए लोगों को आगे बढ़ाएं. खासकर ऐसे लोगों को जो राजनीति में सीढ़ियां चढ़कर आए हैं.

राहुल गांधी अभी कांग्रेस की कार्यसमिति का भी गठन करने वाले हैं, जिसमें नए लोगों को मौका मिल सकता है. बल्कि तकरीबन 50 लोग और भी कांग्रेस में इस तरह की जिम्मेदारी पा सकते हैं, जिसके लिए कांग्रेस के भीतर बातचीत चल रही है. कांग्रेस के बारे में आरोप लगता रहा है कि वो विरासत की राजनीति करने वालों की पार्टी है. राहुल गांधी कई बार ये कह चुके हैं कि पार्टी ने यंग लोगों के लिए दरवाजा बंद कर दिया था, जिसकी वजह से नई लीडरशिप डेवलेप नहीं हो पाई है. इसलिए राहुल गांधी दिल्ली और कार्यकर्ता के बीच की दीवार तोड़ रहे हैं.

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कांग्रेस अधिवेशन में कहा- स्टेज खाली है...

राहुल गांधी ने कांग्रेस के अधिवेशन में पार्टी की परंपरा तोड़ दी थी, जिसमें स्टेज पर किसी को भी बैठने की अनुमति नहीं दी गई. राहुल गांधी ने मंच से कहा कि युवा लोगों के लिए स्टेज खाली है. इसके बाद दिल्ली के तालकटोरा स्टेडियम में भी राहुल गांधी ने मंच को खाली रखा, जिससे ये मैसेज देने में कामयाब हो गए कि कांग्रेस के भीतर मेहनत करने वालों को तरजीह दी जाएगी. इसलिए राहुल गांधी राज्यों में भी इस बात का ख्याल रख रहे हैं.

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परेश धनानी चार बार के विधायक हैं. गुजरात में विपक्ष के नेता की अहम ज़िम्मेदारी परेश धनानी को दी गयी है. कई प्रदेश के अध्यक्ष भी बिना परिवारिक राजनीतिक पृष्ठभूमि वाले हैं. हरियाणा के अध्यक्ष अशोक तंवर राजनीति में खुद अपनी राह बना रहे हैं. राहुल गांधी लगतार उनको अहमियत भी दे रहे हैं. जीतू पटवारी को मध्य प्रदेश का कार्यकारी अध्यक्ष बनाया गया है, जिससे साफ है कि राहुल गांधी भले सरनेम की वजह से बीजेपी के निशाने पर हों लेकिन राजनीति में नए लोगों को मौका दे रहे हैं. कांग्रेस के एक सीनियर नेता का कहना है कि मौका राहुल गांधी दे रहे हैं लेकिन परफार्मेंस खुद करना है. अगर ज़िम्मेदारी मिली है तो इसे निभाना भी चुनौती है. जो इस चुनौती में पास होगा वहीं राजनीति में आगे बढ़ पाएगा.

फ्रंटल संगठनों के लोग भी नए

राहुल गांधी ने यूथ कांग्रेस की कमान पंजाब से एमएलए अमरिंदर सिह राजा बरार को दे रखी है. वहीं एनएसयूआई के अध्यक्ष फैरोज़ खान हैं. ये लोग भी राजनीति में नए हैं. अपनी मेहनत से राजनीति में आगे बढ़ने की कोशिश कर रहे हैं. इस तरह पंचायत राज प्रकोष्ठ की जिम्मेदारी मीनाक्षी नटराजन के पास है. मीनाक्षी भी राजनीति में नयी तो नहीं हैं लेकिन छात्र संगठन से आगे बढ़ रही हैं.

फ्रंटल संगठनों में सिर्फ महिला कांग्रेस की अध्यक्ष सुष्मिता देब विरासत की राजनीति से आई हैं. उनके पिता संतोष मोहन देब असम में कांग्रेस के बड़े नेता थे. हालांकि सुष्मिता की राजनीति भी म्युनिसिपल कॉरपोरेशन से शुरू हुई है. यही नहीं हाल में कांग्रेस की जन आक्रोश रैली में मंच का संचालन रागिनी नायक और नदीम जावेद जैसे युवा लोगों ने किया था. इससे पहले कांग्रेस के अधिवेशन में भी इन दो लोगों को ज़िम्मेदारी निभाने का मौका मिला था. इससे पहले सोनिया गांधी के वक्त ये काम या तो जनार्दन द्विवेदी या फिर मुकुल वासनिक निभाते रहें हैं.

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सीनियर और विरासत वाले नेताओं पर सवाल

राहुल गांधी की टीम में विरासत की राजनीतिक पूंजी वाले ज्यादा नेताओं को स्थान नहीं मिला है. इसलिए जो लोग राजनीति के दूसरी या तीसरी पीढ़ी में हैं, वो सशंकित हो रहे हैं कि उनको स्थान मिलेगा या नहीं. हालांकि राहुल गांधी के सामने काबिल नए लोगों की टीम बनाने की चुनौती है. टीम राहुल में सचिन पायलट, ज्योतिरादित्य सिंधिया को अहम काम मिला है, जबकि मिलिंद देवड़ा, दीपेंद्र हुड्डा और गौरव गोगोई को संगठन में कोई खास काम नहीं मिल पाया है. मिलिंद देवड़ा राहुल गांधी के मित्र हैं, इनको प्रोफेशनल कांग्रेस में पद मिला है. इनके पिता मुरली देवड़ा केंद्र में मंत्री रहे हैं. गौरव गोगोई और दीपेंद्र हुड्डा पूर्व मुख्यमंत्रियों के पुत्र हैं. ये फेहरिस्त काफी लंबी है.

कांग्रेस के नेता का कहना है कि कांग्रेस के ऊपर खानदानी राजनीति का आरोप लगाने वाली बीजेपी के पास अब ऐसे नेताओं की भरमार है जो राजनीति की दूसरी या तीसरी पीढ़ी संभाल रहे हैं. कांग्रेस में जो लोग विरासत की राजनीति कर रहे हैं उनको भी जनता के बीच जाकर काम करना पड़ रहा है. हालांकि ये बात दीगर है कि राजनीति में पारिवारिक पृष्ठभूमि काफी महत्व रखती है. इससे राजनीति में मौके आसानी से मिलते हैं. नेतागिरी में वो मेहनत नहीं करनी पड़ती है जो एक आम कार्यकर्ता करता है.

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कांग्रेस के मौजूदा संगठन महासचिव अशोक गहलोत ने दिल्ली की रैली से पहले किस्सा सुनाया था कि जब वो जोधपुर के जिला अध्यक्ष थे तो रैली के लिए बस लेकर आते थे. लालकिले के पीछे ही बस रोककर तैयार होते थे. ज़ाहिर है कि कांग्रेस में ग्रासरूट वर्कर की कमी नहीं है लेकिन ग्रासरूट नेताओं की भारी कमी है. खासकर राज्यों में बीजेपी के मुकाबले कांग्रेस के पास नेताओं की कमी है.

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सीनियर नेताओं की अनदेखी नहीं

हालांकि राहुल गांधी ने जन आक्रोश रैली के दौरान कहा कि सीनियर नेताओं का सम्मान पार्टी में किया जाएगा. ये भी चेतावनी दे डाली कि जो लोग सीनियर नेताओं की अनदेखी करेंगे उनके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी. ज़ाहिर है कि राहुल गांधी नहीं चाहते हैं कि अभी सीनियर नेताओं को नाराज़ होने का मौका दिया जाए. हालांकि राहुल गांधी ने सलमान खुर्शीद के बहाने सीनियर नेताओं के बेवजह बोलने पर तसदीक की है. राहुल गांधी ने कहा कि पार्टी जब बीजेपी आरएसएस से लड़ाई लड़ रही है, तो गैरजरूरी बयान देने से बचना चाहिए.

कांग्रेस कार्यसमिति में कौन

राहुल गांधी के सामने सबसे बड़ी चुनौती कांग्रेस की कार्यसमिति के गठन की है, जिसमें नए और पुराने लोगों का सामंजस्य बिठाना है. राहुल गांधी को ये मैसेज देना है कि पार्टी में नए और फ्रेश लोगों को मौका दिया जा रहा है. लेकिन सीनियर नेताओं को भी एडजस्ट करना ज़रूरी है. हालांकि कार्यसमिति में आधे सदस्य चुनकर आते रहे हैं लेकिन ऐसा नहीं हुआ है. पार्टी ने राहुल गांधी को कार्यसमिति के गठन के लिए अधिकृत कर रखा है. कार्यसमिति में चुनकर आने की परंपरा टूटी है. सोनिया गांधी के कार्यकाल से ही ये खत्म हो रही है. इसके लिए राहुल गांधी को दोष देना अभी ठीक नहीं है. लेकिन इससे राहुल गांधी को मौका मिला है कि वो अपने मनपंसद लोगों को कार्यसमिति में नियुक्त कर सकते हैं.

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