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राहुल चिलमन से लगे बैठे हैं, साफ छुपते भी नहीं सामने आते भी नहीं

अगले साल यूपी, उत्तराखंड और पंजाब जैसे महत्वपूर्ण राज्यों में विधानसभा चुनाव है.

Updated On: Nov 18, 2016 04:39 PM IST

Amitesh Amitesh

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राहुल चिलमन से लगे बैठे हैं, साफ छुपते भी नहीं सामने आते भी नहीं

‘कांग्रेस वर्किंग कमेटी ने सर्वसम्मति से अपनी इच्छा जताई है कि राहुल गांधी को अब कांग्रेस अध्यक्ष की जिम्मेदारी सौंप देनी चाहिए.’ कांग्रेस वर्किंग कमेटी की बैठक के बाद पार्टी के वरिष्ठ नेता एके एंटनी ने ये जानकारी दी.

इससे यह तो साफ हो गया कि राहुल गांधी के कांग्रेस अध्यक्ष के पद पर ताजपोशी तय हो गई है. अब इस पर आखिरी फैसला कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गांधी को करना है.

2013 में कांग्रेस उपाध्यक्ष बनाए जाने के बाद से ही राहुल गांधी पार्टी में नंबर दो की भूमिका में काम करते रहे हैं. उनके पार्टी अध्यक्ष बनने को लेकर अटकलें लगाई जाती रही हैं.

लेकिन, कांग्रेस की सबसे ताकतवर कमेटी की तरफ से उनके अध्यक्ष बनाए जाने को लेकर ‘तीव्र इच्छा’ प्रकट करने के बाद अब अटकलों पर विराम लगता दिख रहा है.

अब तय हो गया है कि राहुल गांधी जल्द ही सोनिया गांधी की जगह कांग्रेस की बागडोर संभालेंगे. बस मौके का इंतजार है. कांग्रेस वर्किंग कमेटी की बैठक में कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गांधी नहीं गई. खराब सेहत का हवाला दिया गया.

उनकी गैर-मौजूदगी में उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने ही वर्किंग कमेटी की बैठक की अध्यक्षता की. इस दौरान पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने राहुल के अध्यक्ष बनाए जाने को लेकर अपनी इच्छा जताई जिस पर एके एंटनी समेत बाकी सदस्यों ने अपना समर्थन किया.

बैठक के बाद एके एंटनी ने कहा ‘नरेंद्र मोदी के तानाशाही शासन से निपटने के लिए अब राहुल को कमान देने का वक्त आ गया है.’

इस बीच कांग्रेस वर्किंग कमेटी ने चुनाव आयोग से पार्टी के सांगठनिक चुनाव के लिए एक साल का और वक्त मांगा है जो कि दिसंबर 2016 में ही खत्म हो रहा था. मतलब अगले साल के आखिर तक का मौका कांग्रेस को मिल गया है जिसमें वो राहुल की ताजपोशी कर सकती है. लेकिन, सवाल यही खड़ा हो रहा है कि आखिरकार कांग्रेस इतनी देरी क्यों कर रही है. कांग्रेस किस मौके की तलाश में है. राहुल के लिए फिलहाल राहें आसान नहीं लग रही हैं. अगले साल यूपी, उत्तराखंड और पंजाब जैसे महत्वपूर्ण राज्यों में विधानसभा चुनाव है. राहुल के लिए ये चुनाव किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं है.

कांग्रेस के युवराज ने यूपी की खाक छाननी शुरू कर दी है, लेकिन, पार्टी को रेस में लाने की उनकी कोशिश परवान नहीं चढ़ पा रही है. उत्तराखंड में भी एंटीइन्कम्बेंसी फैक्टर के चलते कांग्रेस के लिए दोबारा सरकार बनाना आसान नहीं रहने वाला है.

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बची-खुची उम्मीदें पंजाब से हैं. राहुल गांधी के रणनीतिकारों को लगता है कि पंजाब में जीत राहुल के लिए राहत वाली हो सकती है.

इस हालात में कांग्रेस के रणनीतिकार नहीं चाहते हैं कि राहुल के ऊपर कोई आंच आए और इस वक्त यूपी चुनाव से पहले उनकी ताजपोशी कर मुश्किलें खड़ी की जाएं.

लोकसभा चुनाव के बाद से ही कांग्रेस की हालत खराब है. महाराष्ट्र से लेकर हरियाणा तक, असम से लेकर केरल तक कई राज्य कांग्रेस के हाथ से निकल चुके हैं. इन सभी राज्यों में राहुल का करिश्मा नहीं चला.

अलबत्ता इन राज्यों में हार के लिए राहुल की नीति को भी जिम्मेदार ठहराया गया जो कि पार्टी के भीतर के कलह को संभाल नहीं पाए.

वरिष्ठ पत्रकार अंबिकानंद सहाय कहते हैं, ‘नेहरू-गांधी परिवार की छवि करिश्माई नेतृत्व के लिए जानी जाती है. लेकिन, यह करिश्माई नेतृत्व राहुल गांधी के भीतर दिख नहीं रहा है. ऐसे में कांग्रेस के उपर राहुल के नेतृत्व को अचानक थोपा गया तो कांग्रेस ‘सडेन डेथ’ की तरफ चली जाएगी. लेकिन, उसके सामने यही सबसे बड़ी दुविधा भी है कि कांग्रेस नेहरू-गांधी परिवार के बगैर बिखर भी जाएगी.’

अब इसी उहापोह में कांग्रेस फंसी है. राहुल अघोषित तौर पर कांग्रेस का नेतृत्व तो कर रहे हैं लेकिन, नंबर दो से नंबर एक की भूमिका में खुलकर आ भी नहीं पा रहे हैं. राहुल को अभी सोनिया गांधी की छत्रछाया में ही रखना बेहतर माना जा रहा है.

कांग्रेस के सांगठनिक चुनाव का एक साल और टल जाना इस बात का इशारा कर रहा है कि कांग्रेस को अभी सोनिया ही संभालेंगी, राहुल को थोड़ा और निखारने की कोशिश होगी.

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