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राहुल गांधी को पहले लगा था कि नोटबंदी गेमचेंजर साबित हो सकती है: मिलिंद देवड़ा

फ़र्स्टपोस्ट के साथ लंबी बातचीत के दौरान मिलिंद देवड़ा ने राहुल के राजतिलक, नोटबंदी, कांग्रेस की सियासी संभावनाएं और अपनी खुद की राजनीतिक यात्रा समेत कई मुद्दों पर बेबाकी के साथ अपने विचार रखे

Updated On: Dec 05, 2017 10:21 PM IST

FP Staff

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राहुल गांधी को पहले लगा था कि नोटबंदी गेमचेंजर साबित हो सकती है: मिलिंद देवड़ा

बतौर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की ताजपोशी कमोबेश तय हो चुकी है. छुटपुट विरोध के अलावा कांग्रेस के किसी भी बड़े नेता ने राहुल की ताजपोशी का विरोध नहीं किया है. पार्टी नेताओं को लगता है कि राहुल के नेतृत्व में कांग्रेस नई बुलंदियों को छुएगी. ऐसे ही एक नेता हैं कांग्रेस के पूर्व सांसद मिलिंद देवड़ा.

फ़र्स्टपोस्ट के साथ लंबी बातचीत के दौरान मिलिंद देवड़ा ने राहुल के राजतिलक, नोटबंदी, कांग्रेस की सियासी संभावनाएं और अपनी खुद की राजनीतिक यात्रा समेत कई मुद्दों पर बेबाकी के साथ अपने विचार रखे. मिलिंद देवड़ा ने खुलासा किया कि, शुरूआत में नोटबंदी के बारे में राहुल गांधी के विचार बहुत सकारात्मक थे, और उन्होंने इसे एक बड़ा क्रांतिकारी कदम (गेम चेंजर) माना था.

मिलिंद देवड़ा साल 2004 से 2014 तक मुंबई दक्षिण निर्वाचन क्षेत्र से कांग्रेस के सांसद रह चुके हैं. वह कांग्रेस के दिवंगत नेता मुरली देवड़ा के बेटे हैं. कांग्रेस पार्टी में मिलिंद देवड़ा की पहचान शहरी इलाके के प्रमुख चेहरे के तौर पर है.

नोटबंदी पर राय

यूपी सरकार में संचार एवं सूचना प्रौद्योगिकी राज्यमंत्री रह चुके मिलिंद देवड़ा ने बताया कि, जिस वक्त नोटबंदी की घोषणा की गई थी, तब कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने मोदी सरकार के इस फैसले का तुरंत विरोध नहीं किया था.

देवड़ा के मुताबिक, 'उस समय, कांग्रेस पार्टी के भीतर इस बात पर जोर दिया जा रहा था, हमें नोटबंदी के कदम का विरोध करना चाहिए. लेकिन राहुल गांधी के विचार इस मामले में पार्टी के बाकी नेताओं से अलग थे. राहुल ने कहा था कि, हमें इंतजार करना चाहिए. राहुल को लगता था कि, नोटबंदी का फैसला देश की अर्थव्यवस्था के लिए क्रांतिकारी कदम साबित हो सकता है. देवड़ा ने आगे बताया कि, कांग्रेस ने काफी बाद में नोटबंदी की आलोचना की थी और इसे लागू करने के तरीके पर सवाल उठाए थे.

देवड़ा का कहना है कि, जिस समय नरेंद्र मोदी ने नोटबंदी का ऐलान किया था, तब उन्होंने भी केंद्र सरकार के इस कदम का स्वागत और समर्थन किया था. देवड़ा के मुताबिक, 'अगर आप मेरे ट्विटर अकाउंट को देखें, तो आप पाएंगे कि, नोटबंदी के ऐलान के कुछ देर बाद ही मैंने ट्वीट किए थे. अपने ट्वीट में मैंने भी उम्मीद जताई थी कि नोटबंदी गेम चेंजर साबित हो सकती है. उस समय मुझे लगा था कि, अवैध और कालेधन के बेरोकटोक आवागमन की रोकथाम के लिए नोटबंदी एक अच्छी नीति साबित होगी.

उन्होंने कहा, 'लेकिन नोटबंदी के अगले ही दिन जब हमें खबर मिली कि सरकार नए नोटों की प्रिंटिंग के लिए टेंडर (निविदाएं) निकाल चुकी है, तो हम सब हैरत में रह गए. तब हमें एहसास हुआ कि, सरकार ने जिस मकसद को लेकर नोटबंदी की थी, वह नए नोटों के बाजार में आने से नाकाम हो जाएगा. दरअसल सरकार को कालेधन के कैश में लेनदेन पर रोक लगाना थी, लेकिन वह ऐसा नहीं कर सकी.

क्या थी नोटबंदी पर राय?

देवड़ा ने आगे कहा, 'नोटबंदी को कुछ भी कहा जा सकता है, लेकिन उसे सुधार नहीं माना जा सकता है. सरकार ने जिस तरह से नोटबंदी को लागू किया, उसके लिए सरकार की आलोचना होनी ही थी. अगर लोग नोटबंदी जैसे फैसले के लिए सरकार की आलोचना नहीं करते तो, कोई और भी ऐसा निरंकुश और मनमाना फैसला दोबारा करने के बारे में सोच सकता है.'

देवड़ा ने अमेरिकी सरकार के एक वरिष्ठ अधिकारी के साथ अपनी एक बैठक को याद करते हुए बताया, 'उस अमेरिकी अधिकारी ने कहा था कि, वह कई 'बनाना रिपब्लिक' के साथ काम कर चुका था, जहां उसने सरकारों को कई अजीबोगरीब फैसले करते देखा था, लेकिन उन सभी फैसलों में नोटबंदी सबसे मूर्खतापूर्ण फैसला रहा. उस अमेरिकी अधिकारी के मुताबिक, नोटबंदी का फैसला इसलिए मूर्खतापूर्ण था, क्योंकि यह दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में लागू किया गया है.'

राहुल गांधी पर राय

राहुल गांधी के पार्टी अध्यक्ष की भूमिका संभालने के फैसले के सवाल का जवाब देते हुए देवड़ा ने कहा, 'मेरा मानना है कि, अगर राहुल यूपीए-2 के दौरान सरकार में शामिल हो गए होते तो, उससे कांग्रेस पार्टी का और भी ज्यादा भला होता. लेकिन अब भी देर नहीं हुई है. कांग्रेस अध्यक्ष के तौर पर राहुल की ताजपोशी पार्टी के लिए मील का पत्थर साबित होगी.'

वंशवाद और परिवारवाद की राजनीति के तहत राहुल गांधी की तरक्की पर उठे सवालों का जवाब देते हुए देवड़ा ने कहा, 'यह एक लंबी बहस का मु्द्दा है. एक तर्क यह दिया जाता है कि, क्या कांग्रेस अध्यक्ष का पद सिर्फ एक व्यक्ति के लिए आरक्षित है. लेकिन जब किसी अन्य व्यक्ति को पार्टी अध्यक्ष या प्रधानमंत्री बनाया जाता है, तो तर्क यह दिया जाता है कि, वह व्यक्ति कठपुतली है.'

rahul gandhi

मिलिंद देवड़ा ने इसके बाद गुजरात विधानसभा चुनाव पर बात की. देवड़ा का कहना है कि, राहुल गांधी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के गृह राज्य गुजरात में कांग्रेस के लिए जबरदस्त प्रचार अभियान चला रहे हैं. देवड़ा के मुताबिक, बीजेपी के गढ़ में कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी के आक्रामक प्रचार अभियान ने न सिर्फ बीजेपी को चिंता में डाल दिया है, बल्कि राजनीतिक विश्लेषकों को भी हैरान कर दिया है. जिसके चलते राजनीतिक विश्लेषकों के बीच यह बहस छिड़ गई है कि, क्या राहुल गुजरात में भगवा पार्टी के लिए कड़ी चुनौती पेश कर रहे हैं या नहीं.

देवड़ा के मुताबिक, "जो लोग राहुल को अच्छी तरह से जानते हैं, उन्हें पता है कि राहुल के विचार बहुत परिपक्व और ठोस होते है. वह हर समस्या का विश्लेषण और निदान बहुत कुशलतापूर्वक करते हैं. उदाहरण के लिए, उन्होंने सही वक्त पर पहचान लिया था कि, पंजाब में ड्रग्स (नशीले पदार्थ) एक बड़ी समस्या हैं."

जीएसटी पर राय

देवड़ा ने बताया कि, नोटबंदी की तरह ही जीएसटी के मुद्दे पर भी कांग्रेस के भीतर अलग-अलग राय थी. जीएसटी कानून जब संसद में था, तब कांग्रेस के कुछ नेता उसके समर्थन में थे, जबकि कुछ इसके विरोध में बोल रहे थे. हालांकि कांग्रेस में ऐसे लोगों की तादाद ज्यादा थी जो गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स (जीएसटी) के पारित होने का विरोध करने की वकालत कर रहे थे. ऐसे में राहुल गांधी फिर एक बार सामने आए थे. राहुल ने कहा था कि, जीएसटी की पहल कांग्रेस ने की थी, लेकिन बीजेपी जीएसटी के उद्देश्य और मूल आत्मा को समझने में नाकाम रही.

देवड़ा के मुताबिक, 'उस समय कई नेताओं का कहना था कि, जिस समय कांग्रेस सत्ता में थी, तब बीजेपी ने जीएसटी का विरोध किया था, लेकिन अब बीजेपी जीएसटी को कांग्रेस से छीनने की कोशिश कर रही है. लिहाजा हमें इसे पारित करने की इजाजत नहीं देना चाहिए. जीएसटी के सबसे बड़े समर्थक बने बैठे नरेंद्र मोदी कभी इसके सबसे बड़े विरोधी थे. लेकिन तब राहुल गांधी ने कहा था कि, जीएसटी यकीनन कांग्रेस का विचार है, लेकिन अर्थव्यवस्था की भलाई के लिए अब इसे संसद में पारित होने देना चाहिए.'

मोदी और बीजेपी पर राय

देवड़ा का कहना है कि, कांग्रेस नरेंद्र मोदी को 'सुगम संचारक' (कंज्यूमेट कम्यूनिकेटर) मानती है. लिहाजा हमारी पार्टी को उनसे यह कला सीखने की जरूरत है.

देवड़ा के मुताबिक, 'लोगों को अपने विचार के समर्थन में लामबंद करने के लिए संचार शैली (भाषा शैली) बहुत महत्वपूर्ण होती है. मोदी इस कला में खासे माहिर हैं. वह एक सुगम संचारक हैं यानी लुभावनी बातें करने में दक्ष हैं. जबकि राहुल गांधी में आक्रामकता और लुभावनी बातों का अभाव हैं. यही वजह है कि मोदी और राहुल के बीच कभी-कभी बड़ा अंतर नजर आता है.'

हालांकि, देवड़ा अपनी पार्टी के अंदर ठोस और कल्याणकारी उपायों की कमी से खासे निराश हैं. उनके मुताबिक, 'जब मैं बीजेपी से संबंध रखने वाले अपने दोस्तों से बात करता हूं, तो वो कहते हैं कि बीजेपी अपने हर फैसले का प्रचार बहुत जोरशोर से करती है.'

PM Modi in Surendranagar

मसलन, अगर बिजली सप्लाई को लेकर कोई फैसला लिया जाता है, तो मंत्रालय में इस बात को लेकर कई बैठकें होती हैं कि, इस घटना को कैसे यादगार बनाया जाए. लोगों तक बिजली कैसे पहुंचाई जाएगी, इस बात को लेकर ज्यादा चर्चा नहीं की जाती है. उसी तरह, अगर डिजिटलीकरण के बारे में कोई फैसला होता है, तो इससे जुड़े आयोजनों पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है, जैसे कि, सीआईएससीओ (सिस्को) अध्यक्ष को समारोह में बुलाना वगैरह.

मुंबई के इंफ्रास्ट्रक्चर (बुनियादी ढांचे) पर राय

हाल ही में, मुंबई के एल्फिंस्टन रोड स्टेशन पर हुई भगदड़ पर भी देवड़ा ने अपने विचार रखे. उन्होंने कहा, "मैंने साल 2012 में रेल मंत्री को एक पत्र लिखा था. इसी संबंध में शिवसेना के नेताओं ने भी रेल मंत्री को पत्र लिखे थे. लेकिन मंत्रालय की ओर से हम सभी को एक जैसा ही जवाब मिला था. रेल मंत्रालय ने जवाब में हमसे कहा था कि, 'इस समस्या पर गौर किया जा रहा है.' इस घटना से जाहिर हो जाता है कि, राजनेता भी कभी-कभी लोगों के मुद्दों को उठाते रहते हैं. लेकिन समस्या का समाधान तब मुश्किल हो जाता है, जब संबंधित विभाग के अधिकारी अपनी जिम्मेदारी नहीं समझते हैं."

मिलिंद देवड़ा मुंबई में मेयर के सीधे चुनाव के पक्षधर हैं. देवड़ा का मानना है कि, अगर हम मेयर को सीधे तौर पर चुनेंगे तो इससे प्रशासनिक स्तर पर शहर में बहुत सुधार होगा. देवड़ा के मुताबिक, 'मुंबई में अधिकारियों की बहुलता है, जिसकी वजह से अक्सर असल मुद्दे हाशिए पर चले जाते हैं.' देवड़ा का कहना है कि, मेयर के सीधे चुनाव पर राज्य सरकारें और सभी पार्टियां हमेशा से चुप्पी साधे रही हैं, क्योंकि वह सत्ता और शक्ति को अपने हाथ से जाने नहीं देना चाहती हैं.'

खुद के राजनीतिक सफर पर विचार

राजनीतिक परिवार से संबंध रखने वाले देवड़ा का कहना है कि, शुरू में उनका इरादा राजनीति में आने का नहीं था. लेकिन जब वह विदेश से भारत वापस लौटे तो उन्होंने सामाजिक कार्यों में हिस्सा लेना शुरू कर दिया.

सामाजिक कार्यों में रुचि को देखते हुए पिता मुरली देवड़ा ने उनकी खासी मदद की. पिता मुरली देवड़ा और पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने ही दक्षिण मुंबई में कंप्यूटर शिक्षा के लिए एक संस्थान की स्थापना करवाई थी. जिसमें गरीब वर्ग के बच्चों और लोगों को कंप्यूटर की शिक्षा दी जाती है.

देवड़ा ने आगे बताया, 'मेरी उम्र जब 27 साल थी, तब राहुल गांधी ने मुझे चुनाव लड़ने के लिए कहा था. राहुल के कहने पर ही मैंने राजनीति में प्रवेश किया था. जब मैंने पहली बार दक्षिण मुंबई से चुनाव लड़ा था, तब लोगों ने मुझे यह कहते हुए निराश करने की कोशिश की थी कि, इस सीट समेत पूरे देश में अब सिर्फ बीजेपी ही चुनाव जीतेगी. लेकिन मुझे खुद पर और जनता पर विश्वास था. मेरे पास खोने के लिए कुछ भी नहीं था. फिर जब चुनाव के नतीजे आए, तो मैंने चुनाव में जीत दर्ज की और मेरी पार्टी भी सत्ता में आ गई.'

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