S M L

राहुल गांधी नए तेवर में सही लेकिन 2019 के लिए पीएम मोदी के सामने तैयार नहीं दिखते

राहुल गांधी की जो रफ्तार है, उससे नहीं लगता कि राहुल गांधी 2019 के महायुद्ध के लिए तैयार हो रहे हैं, शायद उनकी नजर 2024 के आम चुनाव पर है

Updated On: Jan 25, 2018 01:26 PM IST

Shivam Vij

0
राहुल गांधी नए तेवर में सही लेकिन 2019 के लिए पीएम मोदी के सामने तैयार नहीं दिखते

साल में एक बार, कमोबेश हर साल ऐसा लगता है कि राहुल गांधी सियासत को गंभीरता से ले रहे हैं. लेकिन कुछ ही दिनों में उनकी धार खत्म हो जाती है. रफ्तार खत्म हो जाती है. राहुल गांधी के अमेरिका दौरे से लेकर गुजरात चुनाव तक ऐसा लगा कि राहुल गांधी सियासत का नया चैप्टर लिख रहे हैं. लेकिन एक बार फिर उनका असर खत्म होता दिख रहा है.

वो सब कुछ सही कहते हैं, करते हैं. लेकिन खबरों के रोज के तूफान में एक बार फिर से वो अपने लिए पॉजिटिव माहौल नहीं बना पा रहे हैं. उनकी पार्टी लगातर गलत वजहों से सुर्खियों में है. इससे ऐसा लगता है कि राहुल गांधी एक बार फिर गायब हो गए हैं. भले ही वो इस वक्त आस-पास ही हों, लेकिन, यूं लगता है कि वो लोगों के जहन से निकल गए हैं.

इसी संदर्भ में एक बात तो एकदम पक्के तौर पर कही जा सकती है. राहुल का हाल ही में हुआ बहरीन का दौरान फ्लॉप रहा था. उनकी अमेरिकी दौरे की कामयाबी को दोहराने की कोशिश कामयाब नहीं हुई. क्या आपको याद है कि राहुल गांधी ने बहरीन में क्या कहा? मुझे तो बिल्कुल नहीं याद.

यह भी पढ़ेंः क्या राहुल गांधी ने कभी खुद से सवाल पूछा है?

चर्चा है कि कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी अब अक्सर अप्रवासी भारतीयों से मिलने और बात करने की योजना पर काम कर रहे हैं. ठीक उसी तरह, जैसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सत्ता में आने के बाद शुरू किया था. लेकिन मोदी ये काम पीएम बनने से पहले नहीं कर रहे थे. वैसे भी देश की राजनीति में अप्रवासी भारतीयों के वोट की कोई खास अहमियत नहीं है. सियासत के बड़े मैदान में अप्रवासी भारतीयों का रोल बहुत अहम नहीं है.

rahul gandhi 2

राहुल गांधी हाल ही में अपने संसदीय क्षेत्र अमेठी भी गए. वहां भी उनके दौरे को लेकर खराब बातें ही ज्यादा चर्चा में रहीं. ट्विटर पर खुली लड़ाई अपनी जगह ठीक चल रही है. मगर, बीजेपी ने राहुल गांधी के खिलाफ जंग मे व्हाट्सऐप के तौर पर नया मोर्चा खोल दिया है.

अपने हक में आए फैसले को भुनाने में नाकाम रहे राहुल गांधी

पिछले कुछ हफ्तों में कुछ ऐसे कानूनी मामले उठे, जो कांग्रेस के हक में जा सकते थे. पाया गया कि ऑगस्टा-वेस्टलैंड हेलीकॉप्टर की खरीद में कुछ भी गलत नहीं था. 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन और महाराष्ट्र के आदर्श हाउसिंग सोसाइटी के मामले में भी बात कांग्रेस के हक में ही गई. बीजेपी फिर भी लगातार कांग्रेस को एक भ्रष्ट पार्टी बताती रहती है. इन कानूनी मोर्चों पर मिली फतह को कांग्रेस राहुल गांधी को पीड़ित कहकर भुना सकती थी. लेकिन राहुल ऐसा करने में नाकाम रहे.

ऐसा नहीं कि कानूनी मामलों से कांग्रेस पूरी तरह दूर ही रही. राहुल ने एक कानूनी मसले पर अपनी राय रखी, जबकि उन्हें ऐसा बिल्कुल नहीं करना चाहिए था. राहुल गांधी ने सुप्रीम कोर्ट के चार जजों के चीफ जस्टिस के खिलाफ प्रेस कांफ्रेंस करने के मसले मीडिया से बात की. इसकी कोई जरूरत नहीं थी. इससे तो उन चार जजों के दावे पर ही दाग लगा, जो न्यायपालिका की निष्पक्षता का मसला उठा रहे थे.

यह भी पढ़ेंः क्या राजनीति में अछूत होती जा रही है कांग्रेस?

अगर आप राहुल गांधी की बातें ध्यान से सुनें, तो लगेगा कि वो हर बात सही ही कहते हैं. वो किसानों और जवानों की बात करते हैं. राहुल गांधी ने पीएम नरेंद्र मोदी से कई मुश्किल सवाल पूछे हैं. इनमें रोजगार का मसला भी था और चीन के साथ डोकालाम का सीमा विवाद भी.

देश की राजनीति में एजेंडा सेट करने में नाकाम रहे हैं राहुल

राहुल गांधी ने हाल में छोटे और मध्यम दर्जे के उद्योगों के जरिए रोजगार पैदा करने का अपना विजन भी देश के सामने रखा है. फिर भी वो देश की राजनीति का एजेंडा नहीं सेट कर पा रहे हैं. शायद इसकी वजह वो जगहें हैं, जो वो अपनी बात रखने के लिए चुनते हैं. या फिर वो बातें, जो राहुल कहते हैं. शायद उनकी बातों में निरंतरता की कमी है. कभी वो बहरीन में नजर आते हैं, तो कभी अमेठी में.

गुजरात के द्वारका में राहुल गांधी

कांग्रेस ये कहती है कि ये मीडिया की गलती है. मीडिया कुछ ज्यादा ही मोदी समर्थक है और कांग्रेस की विरोधी. लेकिन, प्रधानमंत्री बनने से पहले यही बात नरेंद्र मोदी भी महसूस करते थे. तभी तो उन्होंने ऐसे काम करने शुरू किए, जिनकी अनदेखी कर पाना मीडिया के लिए मुमकिन नहीं था. मसलन, अगर राहुल गांधी और उनकी पार्टी को मौके का फायदा उठाना आता, तो वो देश भर में पकौड़े पर चर्चा का अभियान छेड़ सकती थी. प्रधानमंत्री मोदी ने रोजगार से जुड़े सवाल के जवाब में पकौड़े बेचने वालों को अपनी सरकार के रोजगार देने का नतीजा बताकर राहुल को शानदार मौका दिया था.

प्रधानमंत्री मोदी ने ज़ी न्यूज़ को दिए इंटरव्यू में कहा था कि सड़क किनारे चाय-पकौड़े बेचने वालों को भी रोजगार पाए लोगों में गिना जाना चाहिए.

राहुल गांधी ने वादा किया है कि वो अगले छह महीने में देश को नई कांग्रेस देंगे. छह महीने बाद अगले आम चुनाव में एक साल से भी कम वक्त बचेगा. इस दौरान प्रधानमंत्री मोदी तो अपना चुनाव प्रचार शुरू भी कर चुके होंगे.

राहुल को ऐसा माहौल बनाना होगा जिससे वो सत्ताधारी दल को मजबूत चुनौती दे सकें

कांग्रेस के संगठन में फेरबदल के साथ, राहुल गांधी को कर्नाटक के विधानसभा चुनाव में खुद ही आगे आकर प्रचार की कमान संभालनी होगी. इस दौरान उन्हें देश भर में अपने आप को लेकर माहौल बनाने का काम जारी रखना होगा. ताकि, वो सत्ताधारी दल को मजबूत चुनौती दे सकें. यह भी पढ़ेंः अजय माकन का एंटी 'आप' स्टैंड कांग्रेस के कमबैक को पलीता लगाने वाला है

किसी राज्य के चुनाव पर ध्यान लगाना और देश भर में पार्टी को नई धार और रफ्तार देकर 2019 के लिए तैयार करना, दो अलग-अलग चुनौतियां हैं. केंद्र में विपक्षी दल की जिम्मेदारी निभाना, सत्ताधारी दल की कमजोरी का फायदा उठाना, बहुत बड़ी जिम्मेदारी है. इस जिम्मेदारी को कोई भी राज्य के चुनाव पर ध्यान देते हुए पूरी तरह से नहीं निभा सकता. फिर पार्टी के संगठन पर भी ध्यान देने की जरुरत रहती ही है.

गुजरात चुनाव के दौरान की तस्वीर

अगर, कांग्रेस एक या दो राज्यों में चुनाव जीत भी लेती है, तो भी पार्टी को 2019 के आम चुनाव में इससे कुछ खास मदद नहीं मिलेगी. लोग आम तौर पर राज्यों और राष्ट्रीय चुनावों में अलग-अलग तरह से वोट करते हैं. राज्य के चुनावों में स्थानीय मुद्दे हावी रहते हैं. गुजरात में पटेलों की नाराजगी, 2019 के चुनाव में कांग्रेस के लिए ज्यादा फायदेमंद नहीं रहने वाली.

2018 में होने वाले कई राज्यों के चुनाव से कांग्रेस की राष्ट्रीय स्तर की तैयारी को झटका लगेगा

कांग्रेस के लिए कर्नाटक पर अपना पूरा ध्यान लगाना नुकसानदेह साबित हो सकता है. अगर, कांग्रेस कर्नाटक में चुनाव हारती है, तो ये सिद्धारमैया के साथ राहुल गांधी की भी हार होगी. इसके बाद मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में चुनाव होंगे. एक राज्य के बाद दूसरे राज्य के चुनाव से कांग्रेस की राष्ट्रीय स्तर की तैयारी को झटका लगेगा.

यह भी पढ़ेंः क्या सच में राहुल गांधी का इतना विरोध होता है या सबकुछ प्रायोजित है?

2018 में राहुल गांधी के पास कोई बहाना नहीं बचा है. अब वो कांग्रेस के अध्यक्ष बन चुके हैं. उन्हें किसी ने चुनौती नहीं दी. अब कांग्रेस में नई पीढ़ी बनाम पुराने नेताओं की जंग भी नहीं रही. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सामने 4 साल सरकार चलाने के बाद एंटी इन्कम्बेंसी के रूप में बड़ी चुनौती है. वो बेरोजगारी और ग्रामीण इलाकों में तरक्की की रफ्तार थमने जैसी मुश्किलों से जूझ रहे हैं. आज की तारीख में नीतीश कुमार और अरविंद केजरीवाल जैसे क्षेत्रीय नेता भी नहीं हैं, जो मोदी विरोध के नाम पर सुर्खियां बटोर रहे हों.

आज राहुल गांधी के लिए मौका बेहद मुफीद है. वो अपने पक्ष में राष्ट्रीय स्तर पर माहौल बना सकते हैं. वो अपनी पार्टी को मोदी जैसे ताकतवर नेता को चुनौती देने के लिए मजबूती से खड़ा कर सकते हैं. लेकिन, जो रफ्तार है, उससे नहीं लगता कि राहुल गांधी 2019 के महायुद्ध के लिए तैयार हो रहे हैं. शायद उनकी नजर 2024 के आम चुनाव पर है.

0

अन्य बड़ी खबरें

वीडियो
Ganesh Chaturthi 2018: आपके कष्टों को मिटाने आ रहे हैं विघ्नहर्ता

क्रिकेट स्कोर्स और भी

Firstpost Hindi