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कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में राहुल गांधी के सामने उम्मीदों का बोझ!

राजनीतिक परिवार से होने के नाते राहुल गांधी के कंधे पर उम्मीदों का भार ज्यादा है. देश ने राहुल गांधी को आंकने में वैसी उदारता नहीं बरती जैसा कि उनके पूर्वजों के मूल्यांकन में

Debobrat Ghose Debobrat Ghose Updated On: Dec 07, 2017 09:17 AM IST

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कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में राहुल गांधी के सामने उम्मीदों का बोझ!

इस रस्म अदायगी का कांग्रेस के कार्यकर्ताओं और ओहदेदारों को कुछ दिनों से इंतजार था. कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने सोमवार को पार्टी के अध्यक्ष पद के उम्मीदवार के रुप में नामांकन का पर्चा भरा. चूंकि नामांकन दाखिल करने वाले एकमात्र व्यक्ति वही हैं, सो उनका अध्यक्ष पद के लिए निर्वाचित होना तय है. हां, इस बात की औपचारिक घोषणा कुछ दिनों बाद की जाएगी.

तो फिर, एक तरह से तय हो गया है कि गांधी परिवार की अगली पीढ़ी फिर से उस संस्था की बागडोर अपने हाथ मे लेगी जिसकी शुरूआत 1885 में आम शिक्षित भारतीयों की पार्टी के रूप में हुई थी. लेकिन जिसमें तब से लेकर अब तक इतने बदलाव आए हैं कि वह अब एक परिवार की जागीर बनकर रह गई है. यह एक ऐसी पार्टी है जिसकी अध्यक्षता कभी राहुल गांधी के प्रसिद्ध पूर्वजों ने की थी. और, अब वो खुद पार्टी के अध्यक्ष पद पर निर्वाचित होने जा रहे हैं तो पार्टी की प्रमुख का पद उनकी मां सोनिया गांधी खाली करेंगी.

पर्चा दाखिल करने के समय माहौल उफनते उत्साह सा था 

कांग्रेस के 24 अकबर रोड मुख्यालय में राहुल गांधी नामांकन का पर्चा दाखिल करने के लिए आए तो माहौल उफनते उत्साह का था. पार्टी के कार्यकर्ता भावी अध्यक्ष के निर्वाचन की बात सोचकर खुशी में मगन नजर आ रहे थे. माहौल किसी परिकथा से कम नहीं था- लग रहा था प्रजा अपने राजकुमार के राज्यारोहण का जश्न मना रही हो. मानकर चल रही हो कि 2014 के लोकसभा चुनाव और फिर इसके बाद देश के विभिन्न राज्यों के विधानसभा के चुनावों में पार्टी भले धराशायी नजर आई हो लेकिन राहुल गांधी अध्यक्ष बनकर फिर से संजीवनी बूटी के जोर से पार्टी को जिंदा खड़ा कर दिखाएंगे.

अध्यक्ष पद संभालने के बाद राहुल गांधी पर कांग्रेस को फिर से मजबूत बनाने की बड़ी चुनौती होगी

कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए अपना नामांकन भरने जाते हुए राहुल गांधी

एकदम सवेरे से विभिन्न राज्यों के पार्टी कार्यकर्ताओं का कांग्रेस मुख्यालय में जमघट लगना शुरू हो गया था. जैसे ही पार्टी के उपाध्यक्ष ने नामांकन का पर्चा दाखिल किया, जश्न मनाते कार्यकर्ताओं की भीड़ ने शोर मचाया. नारे लगे, पटाखे छूटे, ढोल बजे और लोगों में मिठाइयां बांटी गईं.

तकरीबन 3 साल के अरसे के बाद कांग्रेस मुख्यालय में पार्टी के कुछ कद्दावर नेता नजर आए, ऐसे नेता जो कभी पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और राजीव गांधी की विश्वस्त टोली का हिस्सा हुआ करते थे, जैसे कि- मोतीलाल वोरा, अहमद पटेल, अंबिका सोनी, कमलनाथ, सुशील कुमार शिंदे, मनमोहन सिंह, अशोक गहलोत, शीला दीक्षित.

नामांकन का पर्चा दाखिल होने के तुरंत बाद अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी (एआईसीसी) के मीडिया विभाग के प्रभारी रणदीप सिंह सुरजेवाला ने कहा, 'यह एक ऐतिहासिक दिन है. कांग्रेस कार्यकर्ताओं के लिए उत्सव और जश्न का दिन. राहुल गांधी के अध्यक्ष बनने पर इतिहास का एक नया अध्याय शुरू होना है. हजारों की संख्या में कांग्रेस कार्यकर्ता इस दिन का इंतजार कर रहे थे जब वो पार्टी का एक नई ऊर्जा के साथ नेतृत्व करेंगे.'

राहुल गांधी के कंधे पर उम्मीदों का भार बहुत ज्यादा 

दुनिया के सबसे शक्तिशाली राजनीतिक परिवारों में से एक के वारिस के रूप में राहुल गांधी के लिए जिंदगी कठिन रही है. परदादा जवाहर लाल नेहरू, दादी इंदिरा गांधी और पिता राजीव गांधी! ऐसे परिवार का होने के नाते राहुल गांधी के कंधे पर उम्मीदों का भार बहुत ज्यादा है. और एक बात यह भी है कि देश ने राहुल गांधी को आंकने में वैसी उदारता नहीं बरती जैसा कि उनके पूर्वजों के मूल्यांकन में.

राहुल गांधी पिछले तीन महीने से लगातार गुजरात का दौरा कर पार्टी के लिए चुनाव प्रचार कर रहे हैं

राहुल गांधी पिछले तीन महीने से लगातार गुजरात का दौरा कर कांग्रेस पार्टी के लिए चुनाव प्रचार कर रहे हैं

आजादी के बाद शुरूआती वर्षों में पार्टी की अगुवाई जवाहर लाल नेहरू ने की और उन्हें ज्यादातर जनता का भरपूर समर्थन हासिल था. जबकि इंदिरा गांधी का अपने शासन के वक्त लोगों से रिश्ता उथल-पुथल से भरा रहा. उन्होंने पार्टी को परिवार केंद्रित बनाने की राह अपनाई यानी एक ऐसी सर्व-शक्तिशाली पार्टी जिसने एक परिवार को अकूत अधिकार दे दिए. राहुल के पिता राजीव गांधी का प्रधानमंत्री बनना संयोग की देन था. उन्होंने बहुमत के जितने ज्यादा बड़े आंकड़े के साथ पार्टी को जीत दिलवाई वह अपने आप में एक रिकॉर्ड है. इस रिकॉर्ड की बराबरी करने में किसी दूसरे को कई जमाने लग जाएंगे. साल 1984 के लोकसभा चुनावों में राजीव गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस को 533 में से 404 सीटें मिली थीं. उस वक्त पार्टी ने इंदिरा गांधी की हत्या के तुरंत बाद के वक्त में चुनाव लड़ा था.

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एक तो विरासत का यही बोझ राहुल के कंधे पर बहुत भारी है, दूसरे उनके सामने एक बड़ी चुनौती पार्टी को फिर से खड़ा करने की है क्योंकि कांग्रेस बीते कुछ वर्षों से एकदम रसातल में पहुंच गई है.

यह काम कठिन है क्योंकि रास्ता आसान नहीं. राहुल की सियासी बढ़त की राह में आज के वक्त के सबसे ताकतवर सियासी हस्ती के रुप में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खड़े हैं.

वरिष्ठ कांग्रेस नेता अंबिका सोनी का कहना है कि 'कोई चीज ठहर जाए तो प्रगति नहीं कर सकती. कांग्रेस 100 साल से भी ज्यादा पुरानी पार्टी है. राहुल गांधी नए नेता के रुप में पार्टी-संगठन में नई ऊर्जा और ताकत का संचार करेंगे. नेतृत्व का मतलब होता है अपने साथ के लोगों को राह दिखाना, उन्हें किसी मुकाम तक पहुंचाना. राहुल गांधी यह बात साबित करेंगे.'

राजनीति में राहुल गांधी को हमेशा अपनी मां सोनिया गांधी का मार्गदर्शन मिलता रहा है

राजनीति में राहुल गांधी को हमेशा अपनी मां सोनिया गांधी का मार्गदर्शन मिलता रहा है (फोटो: पीटीआई)

राहुल के आगे हाल-फिलहाल की चुनौतियां

राहुल के सामने फौरी चुनौती गुजरात विधानसभा चुनाव में पार्टी को आगे बढ़कर नेतृत्व देने की है. अगली बड़ी चुनौती होगी, अध्यक्ष बनने के बाद गठबंधन के सहयोगी दलों से रिश्ता बनाने की. अंदरुनी फेरबदल के जरिए पार्टी का कायाकल्प करना, कांग्रेस की राज्य स्तर की इकाइयों को मजबूत करना और एक पुरानी पार्टी को असरदार नेतृत्व देना- राहुल के लिए दूरगामी चुनौती के मोर्चे हैं.

कांग्रेस की दिल्ली इकाई की प्रवक्ता और पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी की बेटी शर्मिष्ठा मुखर्जी ने फ़र्स्टपोस्ट से कहा, 'राहुल जी के आगे तात्कालिक चुनौती गुजरात के चुनाव हैं और इस मोर्चे पर वो आगे बढ़कर पार्टी का नेतृत्व कर रहे हैं. वो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तरह राजनीतिक विरोधी के निजी प्रसंगों को आलोचना का विषय नहीं बना रहे बल्कि मुद्दों के आधार पर सवाल उठा रहे हैं. जैसे कि उन्होंने सवाल उठाया है कि मानव विकास सूचकांक के लिहाज से गुजरात का दर्जा नीचे क्यों है. बीजेपी में तो वरिष्ठ नेता पार्टी के मार्गदर्शक मंडल में डाल दिए गए हैं. लेकिन इसके उलट कांग्रेस में पार्टी के वरिष्ठ नेता नीति निर्माण में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं. नामांकन का पर्चा दाखिल करने से पहले राहुल गांधी ने पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी और पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से मुलाकात की. यह एक अच्छा संस्कार है.'

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अखिल भारतीय कांग्रेस समिति के मुख्यालय में नामांकन का पर्चा दाखिल करने से पहले राहुल गांधी प्रणब मुखर्जी से मिले. पूर्व राष्ट्रपति ने पुष्प भेंट कर के और माथे पर तिलक लगाकर उन्हें आशीर्वाद दिया.

पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने नामांकन भरने से पहले राहुल गांधी को माथे पर तिलक लगाकर आशीर्वाद दिया

पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने नामांकन भरने से पहले राहुल गांधी को माथे पर तिलक लगाकर आशीर्वाद दिया

शर्मिष्ठा मुखर्जी ने फ़र्स्टपोस्ट से अपनी बातचीत में आगे कहा, 'कांग्रेस निरंतरता, बदलाव और विकास की राह पर चलने वाली पार्टी है. हमारी जड़ें परंपराओं में हैं और वहां कोई भारी बदलाव नहीं होने जा रहा. राहुल बेशक अपनी मंडली बनाएंगे लेकिन पार्टी के वरिष्ठ नेता महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहेंगे. राहुल गांधी की टीम में युवा नेता होंगे, साथ ही उसमें नई पीढ़ी और पुरानी पीढ़ी के नेताओं के अनुभवों का योग भी होगा.'

युवाओं में उत्साह

राहुल गांधी के नामांकन का जश्न मनाने के लिए पार्टी मुख्यालय में सिर्फ कांग्रेस के कार्यकर्ता और वरिष्ठ नेता ही नहीं बल्कि सेवा दल, यूथ कांग्रेस और कांग्रेस के छात्र संगठन नेशनल स्टुडेंट्स यूनियन ऑफ इंडिया (एनएसयूआई) के सदस्यों की भी जुटान हुई थी.

पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने एकदम सटीक मुहावरे का इस्तेमाल करते हुए कहा कि राहुल का अध्यक्ष पद के लिए नामांकन का पर्चा दाखिल करना एक ‘उत्सव’ सरीखा है. उन्होंने कहा कि यह युवा भारत के सूरज के उगने का समय है. राहुल एक अच्छे प्रधानमंत्री साबित होंगे.

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कांग्रेस पार्टी की नई पीढ़ी और कांग्रेस से जुड़े संगठनों का मानना है कि राहुल को छोड़कर पार्टी में अन्य किसी भी नेता की पहचान और पहुंच अखिल भारतीय स्तर पर नहीं है.

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कैप्टन अमरिंदर सिंह-राहुल गांधी (फोटो: पीटीआई)

कांग्रेस महासचिव के रूप में राहुल गांधी के कार्यकाल का जिक्र करते हुए एनएसयूआई के मीडिया प्रभारी नीरज मिश्रा ने कहा, 'महासचिव बनने के बाद पहला काम उन्होंने एनएसयूआई और यूथ कांग्रेस को लोकतांत्रिक बनाने का किया. राहुल गांधी की दृष्टि एनएसयूआई का नेतृत्व चुनने में मददगार साबित हुई. पहले पदाधिकारियों की नियुक्ति सीधे हुआ करती थी. इस प्रणाली में हममें से कई लोगों को जो किसी राजनीतिक पृष्ठभूमि के नहीं हैं लेकिन अलग-अलग क्षेत्रों में अपनी योग्यता साबित की है, कांग्रेस का हिस्सा बनने और आगे काम करने का मौका मिला. राहुल जी के दिशा-निर्देश और नेतृत्व से पार्टी को और ज्यादा मजबूत बनाने में मदद मिलेगी. उन्होंने पिछले महीने कहा था कि किसी के पास कोई पद हो या ना हो, उसे भारत के संविधान में वर्णित मूल्यों को आगे बढ़ाने का काम करते रहना चाहिए.'

पीढ़ियों के बदलाव को किस तरह अमली जामा पहनाते हैं

राजनीतिक विश्लेषक नीरजा चौधरी ने इन तमाम बातों के सार-संक्षेप के तौर पर कहा, 'बहुत कुछ इस बात पर निर्भर करता है कि राहुल गांधी संगठन के हर स्तर पर पीढ़ियों के बदलाव को किस तरह अमली जामा पहनाते हैं, युवा नेताओं को मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ आदि राज्यों के 2018 के चुनावों में पार्टी का चेहरा बनाकर किस तरह पेश करते हैं. नए और नौजवान चेहरों और पुरानी पीढ़ी के नेताओं को एक साथ मिलाकर आगे ले चलना एक चुनौती साबित होगी.'

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