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राफेल सौदे पर CAG की रिपोर्ट से विपक्षी दलों में इतनी निराशा क्यों है? यहां जानिए पूरा मामला

सीएजी की इस रिपोर्ट से विपक्षी दलों, खासकर कांग्रेस को निश्चित ही निराशा होगी क्योंकि कांग्रेस चुनावी फायदे के लिए राफेल सौदे को एनडीए का बोफोर्स साबित करने पर तुली हुई है

Updated On: Feb 13, 2019 09:46 PM IST

Yatish Yadav

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राफेल सौदे पर CAG की रिपोर्ट से विपक्षी दलों में इतनी निराशा क्यों है? यहां जानिए पूरा मामला

इंतजार खत्म हुआ और राफेल सौदे पर सीएजी(नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक) की बहुप्रतीक्षित रिपोर्ट अब सबके सामने हैं. रिपोर्ट इस बात को खारिज करती है कि पीएम मोदी की अगुवाई में एनडीए सरकार ने फ्रांस के साथ महंगा सौदा किया था.

रिपोर्ट में यूपीए और एनडीए के कार्यकाल (2007-2015) में हुए सौदे की तुलना करते हुए कहा गया है कि भारत और फ्रांस की सरकार के बीच हुआ 36 राफेल जेट का सौदा यूपीए सरकार के दौर के सौदे(बाचतीत) की तुलना में 2.86 प्रतिशत सस्ता है और एनडीए सरकार ने विमान की विशेष सुविधाओं के मद में 17.8 प्रतिशत राशि की बचत की है.

हालांकि रिपोर्ट में सौदे की कुल धनराशि के बारे में नहीं बताया गया है. सीएजी की इस रिपोर्ट से विपक्षी दलों, खासकर कांग्रेस को निश्चित ही निराशा होगी क्योंकि कांग्रेस चुनावी फायदे के लिए राफेल सौदे को एनडीए का बोफोर्स साबित करने पर तुली हुई है. सीएजी के मुताबिक सौदे में किसी किस्म की धांधली नहीं हुई है.

दरअसल, सीएजी ने यूपीए सरकार की यह कहते हुए आलोचना की है कि उसने भारतीय वायुसेना के लिए बेहद जरुरी इस विमान की खरीददारी में इतनी देर लगाई. सीएजी ने विमान की खरीद में लागत का जो आंकलन किया है उसमें छह अलग-अलग पैकेज-फ्लाईअवे एयरक्राफ्ट पैकेज, रखरखाव पैकेज, भारत वायु सेना की खास जरुरतों के हिसाब से विमान में लगाई गई सुविधाएं, हथियारों से संबंधित पैकेज, अन्य संबद्ध सेवाओं और सिम्युलेटर पैकेज के तहत छानबीन की गई है.

CAG ने अपनी रिपोर्ट में किया सांकेतिक अक्षरों का इस्तेमाल

सीएजी की रिपोर्ट से जाहिर होता है कि एनडीए सरकार ने हथियारों के पैकेज को लेकर फ्रांस की सरकार के साथ जो सौदा तय किया वो भी पिछली यूपीए सरकार के समय हुई सौदेबाजी की तुलना में सस्ता है. सीएजी की रिपोर्ट में साफ कहा गया है कि सौदे के लिए हुई बातचीत के दौरान एनडीए सरकार ने राफेल जेट के लिए जरुरी मिसाइलों को हासिल करने में कामयाबी हासिल की और इससे सौदे में रकम की बचत हुई जबकि यूपीए सरकार के समय सौदे को लेकर हुई बातचीत में ऐसा ना हो सका था और सौदा अपने अंतिम मुकाम तक नहीं पहुंच पाया था.

सीएजी ने रक्षा-मामलों के सौदे से जुड़ी संवेदनशीलता का विशेष ख्याल रखते हुए रिपोर्ट में संकेत-अक्षरों का इस्तेमाल करके लिखा है कि 'साल 2016 में मैसर्स डीए ने ISE के लिए 'IS' M€ मूल्य की बोली लगाई थी. इसके अतिरिक्त मैसर्स डीए ने ISE के उपकरणों के बाबत 'IS1' M€ की बोली लगाई थी और उपकरणों के समेकन के मद मे 'IS2' M€ की बोली लगी थी.

आखिरकार ISE के लिए कुल 'AX3' M€ रकम पर सौदा तय हुआ (2016) जिसमें NRC के लिए 'AX4' M€ और एकीकरण के लिए 'IS2' M€ को जोड़ लिया गया था. इसमें उपकरणों के मद में दी जा रही राशि भी शामिल थी. ऑडिट(अंकेक्षण) में 2007 में हुई पेशकश में मौजूद गुंजाइश और 2016 में हुए करार के बीच मेल बैठाकर देखा गया.

2007 के प्रस्ताव में मिसाइल 'A1' शामिल था. इसे 2015 में भारतीय वायुसेना ने सौदे के दायरे से बाहर कर दिया क्योंकि इस मिसाइल को रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (डीआरडीओ) ने स्वदेशी तौर पर बना लिया था. मिसाइल 'A1' के स्थान पर, भारतीय वायुसेना ने विमान में फिट करने के लिए मिसाइल A2 को चुना. मिसाइल 'A1' की जगह मिसाइल A2 को विमान में लगाने के कारण कीमत में जो अन्तर पैदा(यानि IS3)हुआ उसे ISE के मूल्य 'XX' M€ से घटाया गया.

घटाने पर सौदे की रकम 'AX1' M€ आती है. इस तरह ऑडिट में तुलनात्मक रुप से आकलन करने पर सौदे की रकम 'AX2' M€ बैठेगी लेकिन अंतिम रुप से सौदा 'AX3' M€ पर तय हुआ और 17.08 प्रतिशत की बचत हुई.'

शर्त थी कि विक्रेता विमान के मूल्य में ही लागतों को शामिल करके रकम बताए

राफेल लड़ाकू विमान

बहरहाल देश के महालेखा परीक्षक ने दस्सॉ द्वारा दी जा रही फायनेंशियल और परफार्मेंस गारंटियों के मसले पर रक्षा मंत्रालय से असहमति जतायी है और इस बात के लिए आलोचना की है कि विमान के विक्रेता को फायदा उठाने दिया गया. साल 2007 में जब यूपीए ने सौदे के लिए पेशकश की थी तो कंपनी ने फायनेंशियल और परफार्मेंस गारंटी दी थी, इस मद में आने वाली लागत ऑफर में शामिल थी क्योंकि रिक्वेस्ट फॉर प्रपोजल(प्रस्ताव के लिए अर्जी) में शर्त थी कि विक्रेता विमान के मूल्य में ही ऐसी लागतों को शामिल करके रकम बताए.

लेकिन 2015 में जो पेशकश की गई उसमें ऐसी कोई गारंटी नहीं दी गई क्योंकि सौदा अन्तर-शासकीय समझौते(इन्टर गवर्नमेंटल एग्रीमेंट) के जरिए हो रहा था. विक्रेता को ऐसी गारंटी वहन करने के मद में जो रकम बैंक शुल्क के रुप में अदा करनी थी वो विक्रेता के मुताबिक 1.25 प्रतिशत के बैंक दर से 'AAB1' मिलियन यूरो के बराबर आती है जबकि भारत की तरफ से सौदे की बातचीत कर रही टीम के आकलन से इतनी रकम 0.34 प्रतिशत के दर से आएगी.

महालेखा परीक्षक का कहना है कि 2007 में सौदे के लिए जो पेशकश की गई थी उस वक्त परफार्मेंस गारंटी और अनुबंध के कुल मूल्य की 10 प्रतिशत वारंटी शामिल थी और इसे विमान के मुहैया करा दिए जाने की अवधि यानी 5.5 सालों के लिए रोका रखा जाना था. इस गिनती से बैंक-शुल्क के तौर पर कुल 'AAB2' मिलियन यूरो की रकम निकलकर आती है.

महालेखा परीक्षक (सीएजी) की रिपोर्ट में कहा गया है कि विमान के विक्रेता को बैंक शुल्क अदा न करने के कारण कुल 'AAB3' मिलियन यूरो की बचत हुई. कायदे से विक्रेता को ये बचत मंत्रालय को अदा कर देनी चाहिए थी. मंत्रालय ने बैंक गारंटी को लेकर ऑडिट में लगाए गए हिसाब से सहमति जतायी है लेकिन साथ में यह भी कहा है कि बचत दरअसल मंत्रालय को हुई क्योंकि बैंक गारंटी के तौर पर दिए जाने वाले शुल्कों का भुगतान नहीं हुआ.

फ्रांस की सरकार सौदे के दायित्वों को पूरा करने के लिए समान रुप से जिम्मेदार: रक्षा मंत्रालय  

लेकिन महालेखा परीक्षक की रिपोर्ट में कहा गया है कि साल 2007 में सौदे के लिए हुई बातचीत के तथ्यों से तुलना करके देखें तो बचत मैसर्स डीए(दस्सॉ) को हुई है. महालेखा परीक्षक की रिपोर्ट में कहा गया है कि सौदा अन्तर-शासकीय समझौते के तहत हुआ लेकिन इसके बावजूद न तो विक्रेता ही बैंक गारंटी या फिर संप्रभु गारंटी(सॉवेरन गारंटी) देने को तैयार हुआ और न ही फ्रांस की सरकार ही ऐसा करने को रजामंदी हुई.

संप्रभु गारंटी की जगह सौदे में लेटर ऑफ कंफर्ट प्रदान किया गया जिसपर फ्रांस के प्रधानमंत्री के हस्ताक्षर थे. महालेखा परीक्षक का मानना है कि समझौते की शर्तों के उल्लंघन की दशा में मामले के निपटारे की प्रक्रिया लंबी है इसलिए ऐसी चीजों(लेटर ऑफ कंफर्ट) से बचा जा सकता था.

लेकिन रक्षा मंत्रालय ने महालेखा परीक्षक को जवाब के रुप में कहा है कि सौदा रणनीतिक सहयोग वाले दो पक्षों के बीच हुआ है और सौदे में शामिल दोनों ही पक्ष संप्रभु राष्ट्र हैं और दोनों राष्ट्रों के बीच रणनीतिक संबंध लंबे वक्त से कायम हैं.

यह भी कहा जा रहा है कि विधि एवं न्याय मंत्रालय की सलाह पर सौदे से जुड़े दायित्व को दस्सॉ और फ्रांस सरकार का साझा दायित्व बना दिया गया और दायित्व को कई हिस्सों में बांट दिया गया. रक्षा मंत्रालय ने महालेखा परीक्षक से कहा है कि फ्रांस की सरकार सौदे से जुड़े दायित्वों को पूरा करने के लिए समान रुप से जिम्मेदार है.

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