S M L

विरोधियों के खिलाफ राव करते थे आईबी का इस्तेमाल

आईबी का काम राजनीतिक खुफिया सूचनाएं पीएम तक पहुंचाना था. नरसिम्हा राव के समय यह काम बखूबी हुआ

Updated On: Nov 17, 2016 05:02 PM IST

Ajay Singh Ajay Singh

0
विरोधियों के खिलाफ राव करते थे आईबी का इस्तेमाल

भारतीय राजनीति में बाबरी मस्जिद ध्वंस के बाद का समय प्रधानमंत्री पीवी नरसिंम्हा राव बेहद उथल-पुथल भरा रहा.

लखनऊ में एनडी तिवारी और अर्जुन सिंह उनके खिलाफ लगातार विद्रोह की मुद्रा में मोर्चा खोले रहते थे.

नरसिम्हा राव एक शातिर राजनीतिज्ञ थे जो राजनीति में जासूसी का महत्व जानते थे. मंत्रिपरिषद में विभिन्न विभाग- खासकर गृह मंत्रालय-  संभालते हुए राव ने भारत के आंतरिक खुफिया तंत्र इंटेलिजेंस ब्यूरो (आईबी) को कैसे संभालना है, इसमें निपुणता हासिल कर ली थी.

इसका रहस्योद्घाटन राजनीतिक विरोधियों के खिलाफ खुफिया सूचनाएं जुटाने के लिए आईबी के इस्तेमाल को लेकर 'हॉफ लायन' किताब के आने के बाद हुआ.

जो लोग प्रधानमंत्री कार्यालय की कार्यप्रणाली के बारे में जानते थे, उनके लिए यह शायद ही आश्चर्य का विषय रहा हो.

मनमोहन सिंह के समय में प्रधानमंत्री कार्यालय में कार्यरत एक वरिष्ठ अधिकारी ने बयान दिया था, 'यह कहना ऐसा ही है जैसे कहा जाए कि राव हर सुबह ब्रश करते हैं.'

आईबी प्रमुख का इस्तेमाल

वास्तव में यह रूपक सबसे उपयुक्त है. जवाहर लाल नेहरू के समय से लेकर राव के समय तक आईबी प्रमुख प्रधानमंत्री के निरंकुश उपयोग के लिए इस्तेमाल होते रहे हैं.

वास्तव में, अक्सर प्रधानमंत्री के दिन की शुरुआत आईबी प्रमुख की रिपोर्ट से ही शुरू हुआ करती थी.

जबसे सरकारों ने राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार नियुक्त करना शुरू किया, तब से यह दस्तूर सख्ती से नहीं लागू किया जा सका.

लेकिन इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता कि सरकार की आंतरिक सुरक्षा के मामले में आईबी प्रमुख का पद अब भी बेहद अहम भूमिका अदा करता है.

जिन लोगों ने राव के कार्यकाल में यह आईबी प्रमुख का पद संभाला, उन पर करीब से एक निगाह डालना काफी दिलचस्प होगा.

एमके नारायणन को आईबी प्रमुख के रूप में राजीव गांधी लाए थे. बाद में 1991 में उन्होंने प्रधानमंत्री के रूप में चंद्रशेखर को आगे बढ़ाया. नारायणन 10 जनपथ के करीबी के रूप में जाने जाते थे.

वीजी वैद्य बने आईबी प्रमुख

जब राव प्रधानमंत्री बने तो नारायणन को अपना कार्यकाल पूरा करने दिया और उसके बाद महाराष्ट्र कैडर के आईपीएस अधिकारी वीजी वैद्य को आईबी प्रमुख के रूप में लेकर आए.

वैद्य इस पोस्ट पर 1994 तक रहे. तीन साल बाद डीसी पाठक ने उनका उत्तराधिकार संभाला.

यह दिलचस्प है कि वैद्य को संघ परिवार के करीबी के रूप में जाना जाता था. हालांकि, निष्कलंक छवि के अधिकारी वैद्य और उनके उत्तराधिकारी पाठक दोनों ही पूर्णतया खुफियागीर थे जिन्होंने दृढ़तापूर्वक आईबी की भूमिका को सुरक्षित रखा.

इशरत जहां मामले में वैद्य ने पूर्व आईबी चीफ की हैसियत से प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को एक भावुक पत्र लिखकर गुजारिश की कि आईबी और सीबीआई के बीच चल रहे झगड़े को खत्म करा दिया जाए.

इसके बाद सीबीआई ने फर्जी एनकाउंटर मामले में आईबी अधिकारियों को फंसाने की बजाय अपना कदम पीछे खींच लिया था.

वैद्य आईबी के साथ मजबूती से खड़े रहे और यह रेखांकित किया कि सीबीआई और आईबी के बीच की यह लड़ाई जमीन पर आॅपरेशन चलाने वाली इन एजेंसियों का मनोबल तोड़ देगी.

वैद्य और पाठक के पूर्णतया खुफिया पृष्ठभूमि को देखते हुए राजनीतिक विरोधियों की जासूसी के लिए आईबी के संसाधनों के इस्तेमाल की बात को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. फिर भी यह सवाल उठता है कि वे कितने प्रभावी हो सकते थे?

आईबी में काम करने वाले लोग कहते हैं कि 1991 से 1996 के बीच फोन लाइन टैपिंग को लेकर कोई नियामक तंत्र नहीं था.

जासूसी को बनाया आसान 

टेलीफोन लाइन पर टेलीग्राफ विभाग और पद के एकाधिकार ने एजेंसियों के लिए जासूसी को आसान बना दिया था जिससे वे अनुमति लेने की बात को नजरअंदाज करके समांतर व्यवस्था करके लोगों की बातचीत टैप कर करा सकते थीं.

खुफिया एजेंसियों की कार्यप्रणाली से परिचित सूत्र स्वीकार करते हैं कि प्रधानमंत्री के विरोधियों की बातचीत रिकॉर्ड करने और उनकी गतिविधि पर निगाह रखने का काम आईबी का था.

आईबी खुफिया सूचनाओं के लिए ऐसे लोगों के घरों में घरेलू नौकर के रूप में अपने लोग रखती थी.

उस समय आईबी प्रमुख का मुख्य काम राजनीतिक खुफिया सूचनाएं जुटाना और इसे प्रधानमंत्री तक पहुंचाना था. नरसिम्हा राव के केस में यह काम बड़ी आस्था से किया गया.

उस समय के जासूस स्वीकार करते हैं कि राव खुफिया एजेंसियों को बहुत ध्यान से सुनते थे क्योंकि ये सूचनाएं उन्हें रणनीति बनाने में मदद करती थीं.

इसमें कोई हैरानी की बात नहीं है कि राव ने 10 जनपथ में अपना प्रभाव बनाए रखा और अपने तरीके से सरकार चलाई. इस वजह से राव और सोनिया गांधी के बीच रिश्ते में काफी तल्खी रही.

यह विवादास्पद सवाल अब भी उठता है कि क्या इसमें कोई बदलाव आया है? जिन लोगों ने खुफिया एजेंसियों में निर्णायक पदों पर काम किया है वे बताते हैं कि खुफिया एजेंसियों के राजनीतिक इस्तेमाल पर अमल तो अब तक जारी है, लेकिन तरीका बदल गया है.

संचार नेटवर्क पर प्राइवेट टेलीकॉम कंपनियों के वर्चस्व के बाद फोन टैपिंग को ज्यादा नियामक बना दिया गया है और आईबी प्रमुख की जगह राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार ने ले ली है.

लेकिन यह सोचना भोलापन होगा कि आईबी राजनीतिक खुफिया सूचनाएं नहीं जुटाती.

0

अन्य बड़ी खबरें

वीडियो
KUMBH: IT's MORE THAN A MELA

क्रिकेट स्कोर्स और भी

Firstpost Hindi