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देसी पंजाब की धरती पर विदेशी पंजाबियों का चुनाव प्रचार?

आम आदमी पार्टी के लिए दोबारा एनआरआई चुनाव प्रचार कर रहे हैं

Updated On: Feb 02, 2017 07:52 PM IST

Ajaz Ashraf

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देसी पंजाब की धरती पर विदेशी पंजाबियों का चुनाव प्रचार?

कनाडा के टोरंटो में ग्वेलफ-हम्बर यूनिवर्सिटी से एम.ए कर रहे जोबन रंधावा ने पढ़ाई से वक्त निकाल कर पंजाबी नायक करतार सिंह सराभा के बारे में एक किताब पढ़ी.

करतार सिंह सराभा की कहानी युवाओं में नया जोश, नया हौसला भरने वाली है. ये कहानी है 19 बरस के एक अनाड़ी युवक की, जिसने बर्कले की कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी में पढ़ाई छोड़कर अंग्रेजों के खिलाफ स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल होने चला आया था.

सराभा ने पढ़ाई छोड़कर गदर पार्टी ज्वाइन कर ली और भारत आकर अंग्रेजों के खिलाफ बगावत का बिगुल बजा दिया. उन्हें 1915 में अंग्रेजों ने पकड़कर सिर्फ 19 साल की उम्र में फांसी पर लटका दिया था.

एक सदी के बाद आज करतार सिंह सराभा का जिक्र पंजाब की किताबों में तो नहीं मिलता. मगर जोबन रंधावा जैसे एनआरआई के दिलों में सराभा जैसा जज्बा जोर मार रहा है.

जोबन को करतार की कहानी में सबसे दिलचस्प बात ये लगी कि करतार ने अमेरिका में रहते हुए जो आजादी महसूस की, उस आजादी को अपने साथी देशवासियों को दिलाने के लिए करतार ने जान की बाजी लगा दी. जबकि करतार चाहते तो आराम से अमेरिका में अपनी बढ़िया जिंदगी जी सकते थे. अच्छा कैरियर बना सकते थे.

जोबन रंधावा जैसे अप्रवासी जब बरसों बरस पश्चिमी देश में रहने के तजुर्बे की पंजाब की जिंदगी से तुलना करते हैं. तो, उन्हें पता चलता है कि पंजाब में प्रशासन पूरी तरह से बिकाऊ है. यहां सरकारी सिस्टम का पहिया ठप पड़ा है.

पंजाब पर राज करने वालों को ड्रग और शराब के नशे से बर्बाद हो रही युवा पीढ़ी की कोई परवाह नहीं है. पंजाब का ये हाल देखकर जोबन रंधावा के दिल में खयाल आया कि क्यों न करतार सिंह सराभा की तरह वो भी अपने पंजाब के लिए कुछ करें?

जोबन ने इसकी शुरुआत अपने फेसबुक पेज पर 'चलो पंजाब' के नारे से की. इसमें रंधावा ने तमाम अप्रवासियों से पंजाब के चुनाव में हिस्सा लेने की अपील की. ताकि वो वोटरों को चुनाव में अच्छी सरकार चुनने में मदद कर सकें.

जोबन की 'चलो पंजाब' पोस्ट फेसबुक पर वायरल हो गई. इसे दो लाख लोगों ने शेयर किया. साफ है कि ये पोस्ट शेयर करने वाले कांग्रेस या अकाली दल के समर्थक तो थे नहीं. आजादी के बाद से कांग्रेस और अकाली दल ने ही पंजाब पर राज किया है.

पंजाब में आम आदमी पार्टी का चुनाव प्रचार कर रहे हैं एनआरआई (फोटो: भाई गुरमीत सिंह बब्बर की फेसबुक वॉस से)

पंजाब में आम आदमी पार्टी का चुनाव प्रचार कर रहे हैं एनआरआई (फोटो: भाई गुरमीत सिंह बब्बर की फेसबुक वॉस से)

तमाम पंजाबी अप्रवासी, पंजाब के बुरे हाल के लिए कांग्रेस और अकाली दल को ही जिम्मेदार मानते हैं. उन्हें लगता है कि आम आदमी पार्टी, पंजाब की दो ध्रुवीय राजनीति में नया कोण जोड़ सकती है. इसकी वजह आम आदमी पार्टी का साफ-सुथरी राजनीति का वादा है. 2014 के चुनाव में पंजाब में आम आदमी पार्टी ने 30 फीसद वोट हासिल कर चार सीटें जीती थीं.

सोशल मीडिया पर आम आदमी पार्टी काफी ताकतवर है

जोबन रंधावा की पोस्ट को मिली कामयाबी का आम आदमी पार्टी ने फौरन सियासी फायदा उठाना शुरू कर दिया. पार्टी ने 'चलो पंजाब' के नारे को अपनी मुहिम का हिस्सा बना लिया.

सोशल मीडिया पर आम आदमी पार्टी काफी ताकतवर है. पार्टी ने अप्रवासियों के बीच पैठ बनाने के लिए एनआरआई ऐप भी बना लिया. और चुनाव प्रचार में इसका फायदा उठाने की कोशिश कर रही है.

कनाडा में आम आदमी पार्टी ने अपनी टीम में फेरबदल किया. जिसके बाद सुमेश हांडा, सुरिंदर मावी और जोबन रंधावा पार्टी के मुख्य कार्यकर्ता बन गए.

इन्हीं की कोशिशों का नतीजा है कि पंजाब के चुनाव में बड़ी तादाद में एनआरआई प्रचार में जुटे हैं. इससे आम आदमी पार्टी का प्रचार ज्यादा नया और तेज-तर्रार दिख रहा है. उन्हें प्रचार करते देखकर वोटर भी सवाल करते हैं कि आखिर वो विदेश की अपनी अच्छी खासी जिंदगी छोड़कर पंजाब में क्यों प्रचार कर रहे हैं?

वो भी ऐसी पार्टी के लिए जिसका दिल्ली से बाहर कोई खास असर नहीं. पंजाब के चुनाव में एनआरआई की हिस्सेदारी भले ही खुद से शुरू हुई हो. मगर प्रचार में उनका इस्तेमाल एक रणनीति के तहत हो रहा है.

2014 के आम चुनाव में भी कई अप्रवासियों ने आम आदमी पार्टी के लिए वोट मांगे थे. हालांकि उस वक्त एक संगठित कोशिश नहीं थी. बल्कि अपनी डफली, अपना राग जैसा प्रचार था.

इस बार एनआरआई ऐप और उनकी मदद के लिए सुरिंदर मावी जैसे लोगों की मौजूदगी ने पंजाब में चुनाव प्रचार में एनआरआई की भागीदारी को जानदार बना दिया है. कनाडा में सुरिंदर मावी ने ये कोशिश की कि वहां से पंजाब के चुनाव में जो लोग भी प्रचार के लिए आना चाहते हैं, वो एक ही फ्लाइट से भारत आएं.

यही वजह है कि 19 जनवरी को अप्रवासी पंजाबियों से भरा पूरा विमान दिल्ली पहुंचा. जाहिर है इस बात ने काफी सुर्खियां बटोरीं. लोग सोच में पड़ गए कि एनआरआई इतनी बड़ी तादाद में आकर पंजाब की चुनावी नदी में गोता क्यों लगाना चाह रहे हैं?

सुरिंदर मावी कहते हैं कि ये सब अचानक नहीं हुआ. इसके पीछे महीनों की प्लानिंग थी. मावी ने जिस तरह से आम आदमी पार्टी के प्रचार अभियान की योजना बनाई, उससे उन्हें टोरंटो स्टार अखबार में भी जगह मिली थी.

इस वक्त सुरिंदर मावी पंजाब में हैं. मैंने उनसे उस वक्त बात की जब वो कपूरथला में एनआरआई से भरी एक बस लेकर प्रचार के लिए निकले थे. इस बस में पाल बडवाल भी थे. बडवाल 1972 में कनाडा में जाकर बस गए थे. उन्होंने कहा कि पंजाब में प्रचार के लिए आना उनके लिए राजनीतिक तीर्थ यात्रा जैसा है. मुझे आखिरी सांस तक तसल्ली रहेगी कि मैंने अपनी मातृभूमि पंजाब के लिए कुछ किया.

ये अंदाजा लगाना जरा मुश्किल है कि इस वक्त कितने एनआरआई पंजाब में चुनाव प्रचार कर रहे हैं. विदेश में आम आदमी पार्टी की संयोजक प्रीति मेनन शर्मा कहती हैं कि उन्होंने पांच हजार तक गिनती की और उसके बाद गिनना छोड़ दिया.

विदेशों में बसे पंजाबी आप के लिए प्रचार कर रहे हैं

अकाली और कांग्रेस के मुकाबले कम संसाधनों में भी पंजाब में आप का अच्छा प्रचार हो रहा है (फोटो: भाई गुरमीत सिंह बब्बर की फेसबुक वॉस से)

अकाली और कांग्रेस के मुकाबले कम संसाधनों में भी पंजाब में आप का अच्छा प्रचार हो रहा है (फोटो: भाई गुरमीत सिंह बब्बर की फेसबुक वॉस से)

मेनन कहती हैं कि सिर्फ कनाडा से ही अप्रवासी पंजाबी नहीं आए हैं, बल्कि फिलीपींस जैसे देश से भी आकर उनकी पार्टी के लिए प्रचार कर रहे हैं. अब पांच हजार एनआरआई हों या फिर आम आदमी पार्टी के दावे के मुताबिक पंद्रह हजार, पार्टी को ऐसे कार्यकर्ता मिल गए हैं, जो अपना खर्च खुद उठा सकते हैं.

कांग्रेस और अकाली दल के मुकाबले आम आदमी पार्टी के पास संसाधन कम हैं. एनआरआई की वजह से वो अब अपने संसाधन दूसरे मोर्चों पर लगा सकते हैं.

जोबन रंधावा बड़े गर्व से बताते हैं कि 28 जनवरी को जालंधर में 1300 अप्रवासियों की रैली निकालकर उन्होंने इतिहास रच दिया था. 250 कारों के काफिले में सवार एनआरआई, लोगों से आम आदमी पार्टी के लिए वोट करने की अपील कर रहे थे.

प्रचार कर रहे अप्रवासी, आम आदमी पार्टी के चेहरे हैं. मगर इनसे बेहतर काम पार्टी की ऑटोमैटिक कॉलिंग मशीनरी चलाने वाली टीम है. इस टीम को 2012-13 में श्रीकांत कोचरकोटला ने तैयार किया था.

श्रीकांत, लॉस एंजेलेस में एक वित्तीय कंपनी में सलाहकार हैं. उन्होंने ऑटोमैटिक कॉलिंग की आम आदमी पार्टी की टीम के जरिए हर इंसान को अपने प्रचार में शामिल करने की कोशिश की है. ताकि पार्टी बिना टीवी चैनलों और अखबार के भी ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंच सके.

आम आदमी पार्टी का ऑटोमैटिक कॉलिंग सिस्टम कुछ इस तरह काम करता है- जो भी आम आदमी पार्टी के लिए कॉल के जरिए प्रचार करने का इरादा रखता है, उसे अपनी सेवाएं emc3.aamaadmiparty.org पर रजिस्टर करानी होती हैं.

सिस्टम पहले ये चेक करता है कि उस आदमी ने कभी पार्टी के लिए दान किया है या नहीं. ये नहीं देखा जाता कि उसने कितना पैसा दान दिया था. सिर्फ दान देने वाला रजिस्टर होता है और वो सिस्टम का हिस्सा बन जाता है.

श्रीकांत कहते हैं कि इस पड़ताल से हम उन लोगों को सिस्टम का हिस्सा बनने से रोक पाते हैं जो हमारे सिस्टम में आकर फोन कॉल के जरिए हमें ही नुकसान पहुंचाने का इरादा रखते हैं.

जब कोई भी आदमी आम आदमी पार्टी की इस वेबसाइट पर रजिस्टर हो जाता है, तो आम आदमी पार्टी के डेटा बेस से एक नंबर को कॉल लगाई जाती है. कॉल करने वाला, मतदाता से बात करता है. वो पंजाब की ड्रग की समस्या पर चर्चा करता है. फिर वोटर को ये बताता है कि आम आदमी पार्टी इस समस्या को कैसे हल करेगी.

फोन कॉल से भी पार्टी प्रचार हो रहा है पंजाब में 

आम आदमी पार्टी की जर्मनी कैंपेनिंग टीम प्रचार के लिए रणनीति तैयार करती हुई.

आम आदमी पार्टी की जर्मनी कैंपेनिंग टीम प्रचार के लिए रणनीति बनाती हुई.

पंजाब में चुनाव के ऐलान के बाद, ज्यादातर बातचीत इस बात पर होती है कि आम आदमी पार्टी के किसी कार्यकर्ता ने उस वोटर से मुलाकात की है या नहीं. वोटर से पूछा जाता है कि वो अपने इलाके के आम आदमी पार्टी के प्रत्याशी को जानता है कि नहीं.

इस बाततीच के आधार पर एक फीडबैक रिपोर्ट तैयार होती है. ये रिपोर्ट चंडीगढ़ भेजी जाती है. वहां पर एक आदमी इन रिपोर्ट्स का फॉलो-अप करता है.

उस इलाके में प्रचार की जिम्मेदारी निभा रहे नेताओं को प्रचार की खामियां बताई जाती हैं, ताकि वो उन्हें झट से दूर कर सके. उम्मीदवारों को उन गावों में जाने को कहा जाता है, जहां का वोटर उन्हें नहीं जानता.

श्रीकांत कोचरकोटला बताते हैं कि 15 अगस्त से 29 जनवरी के बीच पंजाब के वोटरों को इस सिस्टम से पांच लाख फोन कॉल की जा चुकी हैं. वो कहते हैं कि जब आप किसी वोटर को अपने लिए वोट करने के लिए मना लेते हैं. तो आप उसके साथ पूरे परिवार को अपना समर्थक बना लेते हैं. श्रीकांत बताते हैं कि 7136 लोगों ने उनकी वेबसाइट के जरिए पांच या इससे ज्यादा कॉल की है.

लास वेगास की गुरिंदर कौर अब तक 14273 फोन कॉल कर चुकी हैं. महिला कार्यकर्ताओं में वो पहले नंबर पर हैं. मगर अमेरिका के ही सैक्रामेंटो के रहने वाले बलबीर ने कॉल करने के मामले में सबको बहुत पीछे छोड़ दिया है. वो अब तक 29494 फोन कॉल कर चुके हैं.

श्रीकांत कहते हैं कि जब तक वो फोन नहीं कर लेते उनके बदन में  खुजली सी होती रहती है. वो रोजाना फोन पर करीब छह घंटे मतदाताओं से बात करते हैं.

वो कहते हैं कि ये बेहद मुश्किल काम है. कई लोग गालियां देते हैं. बलबीर कहती हैं कि ज्यादा फोन करने से उनके कान में कुछ दिक्कत भी आ गई है. ये कॉल सेंटर आम आदमी पार्टी ने सिर्फ भारत में ही नहीं खोले हैं. अमेरिका, न्यूजीलैंड और कनाडा में बैठे पार्टी के समर्थक भी ऐसे कॉल सेंटर के जरिए पंजाब के वोटर्स को लुभाने में जुटे हैं.

 ड्रग्स समस्या पंजाब में सबसे अहम चुनावी मुद्दा है

ये समझना जरा मुश्किल है कि जो लोग पंजाब छोड़कर बरसों पहले दूसरे देशों में जा बसे हैं वो पंजाब के चुनाव में इतनी दिलचस्पी क्यों ले रहे हैं. शायद ऐसा इसलिए है कि पंजाब और सिख धर्म का गहरा नाता है. तमाम परंपराएं पंजाब से जुड़ी हैं. शायद विदेश में बसे पंजाबियों की आस्था ही उन्हें पंजाब से जोड़े हुए है. ये लोग उत्तरी अमेरिका और यूरोप के गुरुद्वारों के जरिए पंजाब से संपर्क में बने हुए हैं.

पंजाब में आम आदमी पार्टी का प्रचार करते हुए एनआरआई

पंजाब में आम आदमी पार्टी का प्रचार करते हुए एनआरआई

किसी और राज्य के मुकाबले, पंजाब के लोग बड़ी तादाद में विदेश जाकर बसे हैं. इन लोगों का अपने वतन में रहने वाले परिजनों-रिश्तेदारों से नाता बना हुआ है.

यही वजह है कि पंजाब की ड्रग समस्या को वो अपनी समस्या मानते हैं. क्योंकि उनके कई रिश्तेदारों के बच्चे इस वजह से बर्बाद हुए हैं. इसीलिए बहुत से अप्रवासी पंजाबियों का अकाली दल से मोह भंग हुआ है.

फिर विदेश में जा बसे बहुत से पंजाबियों ने अपने सूबे में जमीन-जायदाद खरीदी है. यहां उसकी रखवाली स्थानीय लोग ही करते हैं. कई बार इन संपत्तियों पर अवैध कब्जे हो जाते हैं. उनके खिलाफ गलत मुकदमे दर्ज करा दिए जाते हैं.

एनआरआई की कई मांगों में से एक ये भी है कि उनकी जिन संपत्तियों पर अवैध कब्जे हो गए हैं, वो उन्हें वापस दिलाए जाएं. अप्रवासियों के अपने राज्य में निवेश के मौके मुहैया कराए जाएं. क्योंकि इस काम में भी उन्हें बहुत दिक्कतें आती हैं.

अप्रवासी पंजाबी, आम आदमी पार्टी को लेकर उत्साहित हैं. क्योंकि उन्हें लगता है कि आम आदमी पार्टी अकाली दल और कांग्रेस के राज में पैदा हुई तमाम बुराइयों को दूर कर सकती है. पंजाब में विकास की नई उम्मीद जगा सकती है.

आज पंजाब में जितनी दिक्कतें हैं. एनआरआई और दूसरे वोटरों को जितनी उम्मीदें हैं. शायद सत्ता में आने पर आम आदमी पार्टी उन्हें पूरी न कर पाये.

ऐसे में जोबन रंधावा और दूसरे अप्रवासी पंजाबियों को याद रखना चाहिए कि अमेरिका में पढ़ाई छोड़कर आए करतार सिंह सराभा अपने मिशन में नाकाम रहे थे. करतार, अंग्रेजों से भारत को तो नहीं आजाद करा पाए थे. अंग्रेजों ने उन्हें 1915 में सूली पर चढ़ा दिया था.

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