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पंजाब विधानसभा चुनाव 2017: भगवंत मान के बादल विरोधी बोल

किकली कलीर दी, भीड़ पूरी ताकत से जवाब देती है गप्प सुखबीर दी.

Updated On: Feb 03, 2017 07:41 PM IST

Sandipan Sharma Sandipan Sharma

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पंजाब विधानसभा चुनाव 2017: भगवंत मान के बादल विरोधी बोल

आम आदमी पार्टी के नेता भगवंत मान अपनी हर रैली में बादल परिवार को अपने चुटकुलों से निशाने पर लेते हैं. ऐसे हर चुटकुले का भीड़ जमकर साथ देती है.

जलालाबाद में एक रोड शो में एसयूवी पर मुश्किल से संतुलन बनाकर खड़े हुए भगवंत मान - ऐसा करना मुश्किल है इसीलिए पेगवंत मान के नाम से मशहूर इस शख्स के लिए दिल से दुआ भी निकलती है. भगवंत अपने भाषण की शुरुआत एक पंक्ति से करते हैं जो अब बहुत मशहूर हो चुकी है.

वो कहते हैं किकली कलीर दी, भीड़ पूरी ताकत से जवाब देती है गप्प सुखबीर दी.

जलालाबाद के इस बाज़ार में भीड़ भगवंत मान की एक झलक पाने के लिए उमड़ रही है. 

भगवंत भीड़ से संवाद कायम कर लेते हैं. 

भगवंत चिल्लाते हैं: चिट्टा मेरे...

भीड़ कहती है: मेरे भाई दा..

भगवंत: बॉर्डर ते...

भीड़: मंगाई दा    

भगवंत: दस्सो कित्ता चाही दा

भीड़: घर-घर पहुंचाई दा

भगवंत: चिट्टा साडा लहू है

भीड़: मैं बादलां दी बहू है. मैं बादलां दी बहू है....

 

फिर इस तरह तालियों की आवाज गूंजती है जैसे बादल गरज रहे हों. कुछ लोग झूमने लगते हैं, कुछ चीखते हैं और कुछ भगवंत मान से हाथ मिलाने की कोशिश करते हैं.

करीब-करीब हर आदमी अपना मोबाइल निकालकर रिकॉर्ड करने लगता है. भगवंत का कारवां किकली के अगले मुकाम के लिए बढ़ जाता है.

पंजाब अभियान की पहचान भगवंत की किकली

मान की किकली आम आदमी पार्टी के पंजाब अभियान की पहचान बन चुकी है. किकली वो कविता है जो पंजाब में लड़कियां हाथ पकड़कर, एक गोल घेरे में नाचते हुए गाती हैं.

गुदगुदाने वाले मजाक से भरपूर किकली से ये पता चलता है कि पंजाब के हर नुक्कड़ पर किस बात की चर्चा है, चिट्टा की बुराई की (नशीली दवा जिसका नाम इसके सफेद रंग की वजह से पड़ा.)

खुद नशे की समस्या से जूझ रहे एक आदमी को पंजाब में नशेबंदी की बात करते देखना मजेदार है.

हर रोज मान के लड़खड़ाने के या रैलियों में मदहोश होकर पांच मिनट तक लोगों की ओर चुम्मियां उछालने के किस्से अखबारों में छपते हैं या सोशल मीडिया पर वाइरल हो जाते हैं.

कभी-कभी वो कहीं खो जाते हैं और सामने की ओर अपनी बड़ी-बड़ी आंखों से ताकते रहते हैं और आपको अपनी हंसी रोकनी पड़ती है. लेकिन मान को लेकर इतनी दीवानगी है कि जब-जब मान मुट्ठी तानकर इंकलाब का नारा लगाते हैं, लोग नशा मुक्त पंजाब का ख्वाब देखने लगते हैं.

मान अपनी जमीन से जुड़े देहाती तौर-तरीकों और रंगीन लाइफस्टाइल की वजह से निचले तबके के लिए एक नायक की तरह उभरे हैं.

लोगों के मन में उनकी छवि अस्सी के दशक के अमिताभ बच्चन जैसी है, एक कुली, मर्द तांगेवाला और, एक शराबी भी.

पंजाब की सड़कों पर वो उस आदमी की तरह हैं जो लगातार राज करने वालों से टक्कर ले रहा है. कभी जिन्हें पूजा जाता था, जिनसे डरा जाता था, उन बादलों को भगवंत मान ने हंसी का पात्र बना दिया है. भगवंत मान यथा स्थिति के ख़िलाफ पंजाब के दलितों और युवाओं के ग़ुस्से का प्रतीक बन गए हैं.

अब वो स्टैंड अप कॉमेडियन नहीं रहे. क्रांति के अगुवा बन गए हैें.

जलालाबाद में एक युवा का कहना है, 'अपने जैसा बंदा है जी, मस्त है.'

भीड़ में मौजूद भगवंत का एक उत्साही समर्थक दावा करता है कि मान भारी मतों से जीतेंगे और उनके सामने चुनाव लड़ रहे 'सुखा' - पंजाब के उपमुख्यमंत्री सुखबीर सिंह बादल की जमानत जब्त हो जाएगी.

भगवंत के रोड की एक झलकी के लिए बेताब है पंजाब की जनता

सट्टेबाजों में भी वो पंजाब चुनाव की सबसे बड़ी लड़ाई जीतने की पहली पंसद हैं. फिर जब उनके खिलाफ लड़ रहे दल के लोग भी जलालाबाद से बहुत दूर अमृतसर में नवजोत सिंह सिद्धू की रैली में किकली गाते हैं तो एहसास होता है कि मान चुटकुलों, जुमलों और हंसी की लड़ाई पहले ही जीत चुके हैं.

मान की रैलियां और रोड शो जबरदस्त लोकप्रिय हैं, किसी फिल्म की तरह जिसे हर कोई बार-बार देखना चाहता है.

इसलिए मान का पूरा खाना, पीना (उम्मीद तो यही है) और जिंदगी चुनाव ही हो गई है.

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सूरज उगने के ठीक बाद वो प्रचार के लिए उतर जाते हैं और शाम ढलने तक घूमते हैं. अपनी ट्रेडमार्क पीली पगड़ी, सफेद कुर्ता-पायजामा और जूते पहन कर, वो लगातार एक ही काम करते रहते हैं: अपनी गाड़ी के ऊपर चढ़कर चुटकुले सुनाना, किकली गाना और जब भीड़ मांग करे तो, 'झाड़ू वाला आ गया, झाड़ू वाला छा गया' की धुन पर नाचना.

कई लोगों के लिए मान का चुनाव प्रचार दवा की तरह है. वो उनके अंदर उबलते गुस्से को सोख लेते हैं, उनकी दबी भावनाओं को आवाज देते हैं और फिर अपने मजाक से हंसी में उड़ा देते हैं. उनकी रैलियों में दबे-कुचले पंजाबी अपने अंदर धधक रही आग को बाहर निकाल कर राहत पाते हैं.

कुछ लोग अलग-अलग जगहों पर गुरु ग्रंथ साहिब की बेअदबी से नाराज हैं, कुछ नशे से डर रहे हैं और कुछ अकाली दल और कांग्रेस के बारी-बारी के राज से उकता गए हैं.

मान का अपना इलाका मालवा, सतलज के बाईं ओर का इलाका, हमेशा से सत्ता के खिलाफ खड़े होने वाले लोगों के लिए मशहूर रहा है. कभी इस जमीन पर मजबूत वामपंथी आंदोलन उपजा था, यहां ऐसे नेता हुए जो दलितों और किसानों के अधिकारों के लिए लड़े.

मान को इलाके के इतिहास और उम्मीदों, दोनों से, फायदा मिल रहा है.

एक आदमी से इतनी उम्मीदें लगाने पर कभी-कभी डर लगता है. यह डर और बढ़ जाता है जब एक खामोश क्रांति की अगुवाई कर रहा आदमी ऐसा हो जो सार्वजनिक जीवन में थोड़ा सा गैर जिम्मेदार और लापरवाह होने के लिए जाना जाता हो.

जब आप मान को अपनी एसयूवी पर संभलने की कोशिश करते देखते हैं तो लगता है कि बस वो अपने समर्थकों की उम्मीदें गिरकर चकनाचूर करने से एक कदम दूर हैं.

लेकिन अभी तक वो ठीकठाक हैं. शाम हो रही है और उनके हाथ-पैर सधे हुए हैं. सिर्फ एक लाइन गाकर वो क्रांति की अगुवाई कर रहे हैं: किकली कलीर दी

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