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पंजाब चुनाव: किसका झंडा होगा बुलंद?

क्या इस हवा की शहसवारी करके ‘आप’ शासन के सिंहासन तक पहुंचेगी?

Updated On: Feb 03, 2017 03:27 PM IST

Sandipan Sharma Sandipan Sharma

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पंजाब चुनाव: किसका झंडा होगा बुलंद?

लुधियाना का भीड़-भाड़ वाला आरती चौक! चौक पर तकरीबन दर्जनों कांग्रेस कार्यकर्ता कंधे से कंधा मिलाकर खड़े हैं, उनके हाथ में दल का झंडा फहर रहा है.

कांग्रेसी कार्यकर्ताओं की इस भीड़ के एक तरफ बीजेपी का अकेला स्वयंसेवक खड़ा है. वह पार्टी का झंडा लहराये रखना चाहता है. लेकिन लुधियाना के इस भीड़-भाड़ वाले चौक पर वसंत-पंचमी के आसमान में सबसे हावी है उजले रंग वह झंडा जिसपर झाड़ू की छाप है.

एक युवती ने अपने एक हाथ में आम आदमी पार्टी का झंडा थाम रखा है, दूसरे हाथ से उसनें अपनी पांच साल की बिटिया की अंगुलिया थाम रखी हैं. बिटिया उसके साथ चौक तक चली आई है और मां-बेटी दोनों गाड़ियों के रेलमपेल के थमने के इंतजार में है ताकि सड़क पार कर सकें.

ठंढ़ी हवा की हरकत में ‘आप’ का झंडा डोल रहा है और डोलता हुआ यह झंडा पैदल आने-जाने वालों को हौले से छू देता है, गुदगुदा देता है. इस सीन से चुनावी मौसम का कुछ अंदाजा होता है.

मालवा में 'आप' की हवा 

AAP

पंजाब के मालवा इलाके में ‘आप’ की हवा तेज बह रही है और इस हवा में उत्तर भारत की सियासत को बदल देने का जोश है. अकालियों के पैर उखड़ रहे हैं.

बीजेपी मूक दर्शक बनी बैठी है. सिर्फ कांग्रेस खड़ी दिखाई देती है, वह आप की लहर को रोकने की कोशिश में है ताकि उसकी सियासत गुमनामी के गढ्ढे में समाने से बची रहे.

लहर पहले भीतर-भीतर चल रही थी लेकिन अब उसने एक आंदोलन का रुप ले लिया है और पंजाब की सियासत को सिरे से बदल देना चाहती है. मालवा के इलाके में पंजाब विधान-सभा की 69 सीटें हैं सो सत्ता की चाबी इसी इलाके के पास है.

सतलज की छाड़न कहलाने वाली सरजमीं है मालवा और इसकी हर गली और नुक्कड़ पर बदलाव की आवाज सरगर्म है.

4 फरवरी को वोट किसे पड़ने जा रहे हैं इसे बताने का पंजाबियों का अपना अनोखा अंदाज है, 'इना ने साढ़ी 60 साल लित्ती है!. ऐ तोह माद्दा कि होएगा. पांच साल इना नू भी मौका दे देना है.'

इन शब्दों का सीधा अर्थ क्या निकलता है इसे थोड़ी देर के लिए भूल जाइए, बस भावनाओं को समझिए. मालवा का वोटर कह रहा है कि साठ साल तक अकालियों और कांग्रेस ने हेर-फेर के साथ उन्हें बर्बाद किया है, इससे बुरा और क्या हो सकता है, सो इस बार के चुनाव में किसी और को मौका क्यों ना दें ? और सोच के ठीक इसी मुकाम पर आप ने दस्तक दिया है.

बदलाव की अंगड़ाई 

AAP Nri

दलित-बहुल मालवा का इलाका बदलाव की अंगड़ाई ले रहा है, यह बात 2014 के चुनाव में जाहिर हो चुकी थी. लोकसभा के चुनाव में चली मोदी की सुनामी को थाम, इस इलाके ने आम आदमी पार्टी के उम्मीदवारों को चार संसदीय सीटों पर जीत दिलायी.

मालवा में बहने वाली बदलाव की उस बयार ने अब अंधड़ का रुप ले लिया है. चुनाव को लेकर वोटर के मन में क्या चल रहा है इसका एक इशारा तो यह है कि वह अपनी बात खुलकर बताने लगा है. बिना किसी हिचकिचाहट या डर के वोटर बता रहा है कि अबकी बार वह किसे वोट देने जा रहा है.

मालवा के 14 जिलों में किसी भी वोटर से बात कीजिए, बातचीत कुछ इस ढर्रे पर चलेगी:

अकालियों ने पंजाब को बर्बाद कर दिया...... इसके बाद एक गाली.. साठ सालों में कांग्रेस ने हमारे लिए क्या किया... इसके बाद कुछ ज्यादा तीखी गालियां. हम तो पहले से ही बर्बाद हैं. ‘आप’ हमें और ज्यादा क्या बर्बाद करेगी ?

इस उबलते हुए गुस्से को आप ने अपने पाले में किया है, इसका श्रेय ‘आप’ को देना पड़ेगा. तकरीबन एक साल से हर सीट पर आम आदमी पार्टी ने जबर्दस्त अभियान चलाया है.

नवरीत ग्रेवाल के पति लुधियाना (पश्चिम) से आम आदमी पार्टी के उम्मीदवार हैं. वे ब्रिटेन में जमी-जमाई अपनी नौकरी छोड़कर चुनाव लड़ने पंजाब चले आए. नवरीत कहती हैं कि हमारी टीम ने पिछले छह माह में हर वोटर का दरवाजा कम से कम तीन दफे तो खटखटाया ही है.

नवरीत के पति अहबाब सिंह ग्रेवाल का चुनावी मुकाबला कांग्रेस के भारत भूषण (आशु) से हैं. भारत भूषण की बड़ी पहचान एक जमीनी कार्यकर्ता के रुप में है. 2012 में इस सीट पर उन्होंने 35000 वोटों से जीत दर्ज की, सो फिलहाल वे इस सीट से विधायक भी हैं.

पूरे मालवा में यही सीट चुनावी मुकाबले के लिहाज से ‘आप’ के लिए मुश्किल जान पड़ती है. लेकिन ग्रेवाल और आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ता डटे हुए हैं, उन्हें पक्का यकीन है कि ‘आप’ की चलती लहर में जीत उन्हीं की होनी है.

आप के उभार की वजह बड़ी सीधी-सादी है. धर्म के पक्के सिख अकालियों से नाराज हैं क्योंकि ‘गुरु ग्रंथसाहिब’ को जलाने की सिलसिलेवार घटनाएं हुईं. लेकिन, वे कांग्रेस पर भी यकीन नहीं कर सकते. सो, ले-देकर एक ही विकल्प बचता है- ‘आप ‘.

मालवा में होगा असली चुनावी गदर

Punjab 

इलाके में 31 फीसद दलित वोटर हैं यानी पूरे हिन्दुस्तान में और कहीं से भी ज्यादा. ये वोटर कांग्रेस और बीएसपी को लेकर दुविधा में हैं कि किधर वोट करें. और जो लोग भ्रष्टाचार के आरोप और नशे के चलन को लेकर अकालियों से नाराज हैं, वे किसी ऐसे विकल्प की तलाश में हैं जो इस चलन पर चोट करे. कांग्रेस इस मामले में उन्हें रंगा सियार जान पड़ती है- एक ही सिक्के का दूसरा पहलू.

इन सारी बातों से मालवा इलाके में हवा ‘आप’ की बन रही है.

क्या इस हवा की शहसवारी करके ‘आप’ शासन के सिंहासन तक पहुंचेगी?

आप के साथ एक दिक्कत यह है कि वह माझा यानी अमृतसर के आस-पास के इलाके में एकदम से गायब है. और दोआबा के इलाके में वह कांग्रेस को फिलहाल टक्कर देती दिख रही है. इन दो इलाकों में कुल 48 सीटें हैं.

सो, मालवा में अगर ‘आप’ तकरीबन झाड़ू लगाने के अंदाज में 45 सीटें नहीं बटोर पाती तो बहुमत के लिए जरुरी 59 सीटों से कुछ पीछे रह सकती है.

बीते दो दिनों से अरविन्द केजरीवाल माझा में चुनाव-अभियान पर डटे हैं. जिन सीटों पर उनकी पार्टी को कुछ आशा दिख रही है उन्हें अपनी झोली में बटोरने की कोशिश कर रहे हैं. दोआबा में यह खबर फैल चुकी है कि मालवा चुनावी गदर के लिए उठ खड़ा हुआ है.

आखिर के कुछ घंटे फैसला करेंगे कि कि लुधियाना के आरती चौक और मालवा में बहती हवा में किस पार्टी का झंडा बुलंद होगा.

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