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पंजाब चुनाव 2017: कांग्रेस जीती तो मुख्यमंत्री की गद्दी कैप्टन अमरिंदर सिंह को

अमरिंदर सिंह कह चुके हैं कि यह उनका आखिरी चुनाव है.

Updated On: Mar 11, 2017 08:21 AM IST

Debobrat Ghose Debobrat Ghose
चीफ रिपोर्टर, फ़र्स्टपोस्ट

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पंजाब चुनाव 2017: कांग्रेस जीती तो मुख्यमंत्री की गद्दी कैप्टन अमरिंदर सिंह को

पंजाब में चुनाव-प्रचार के जोर पकड़ने के साथ एक नारा कुछ इस कदर परवान चढ़ा कि खुद में एक ब्रांड बन गया. इस नारे ने वोटर और कांग्रेस को एक साथ जोड़ दिया. यह नारा था, ‘कैप्टन इज कांग्रेस एंड कांग्रेस इज कैप्टन.’

कैप्टन अमरिंदर सिंह पंजाब में कांग्रेस पार्टी की ओर से मुख्यमंत्री पद के प्रत्याशी हैं और उनका नाम सूबे में खुद कांग्रेस पार्टी का प्रतीक बन चला है. सूबे का यह पूर्व मुख्यमंत्री पंजाब कांग्रेस का इकलौता भरोसेमंद चेहरा बनकर उभरा है.

कैप्टन अमरिंदर सिंह को पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने 1980 में लोकसभा चुनाव लड़ने के लिए चुना था, दोनों दून स्कूल के साथी थे. कैप्टन अमरिंदर ने वह चुनाव भारी अंतर से जीता था.

और, अब कांग्रेस कैप्टन से उम्मीद लगाये हुए है कि वे उसके लिए पंजाब के चुनाव जीतकर दिखायें. सवाल यह है कि क्या कैप्टन यह चुनाव जीतेंगे या जीतने से चूक जाएंगे?

अगर पंजाब में कांग्रेस जीतती है तो कैप्टन अमरिंदर सिंह का मुख्यमंत्री बनना तय है. पार्टी में उनका कद भी कई गुणा ज्यादा बढ़ जाएगा. लेकिन पार्टी अगर पंजाब में चुनाव हार गई तो क्या होगा?

लेकिन चुनाव के नतीजों के बारे में कयास लगाने से बेहतर है, हम यह देखें कि आखिर कैप्टन अमरिंदर सिंह पंजाब में कांग्रेस के लिए इतने जरूरी कैसे बन गए, क्या वजह रही कि वे पार्टी के लिए सूबे में सबसे भरोसेमंद चेहरा बनकर उभरे हैं.

Photo. PTI

कांग्रेस पार्टी कैप्टन अमरिंदर सिंह की पंजाबी छवि को भुनाने की कोशिश में है

पाकिस्तान के साथ जंग

भारत और पाकिस्तान के बीच हुई 1965 की जंग लड़ चुके कैप्टन अमरिंदर सिंह की शिक्षा नेशनल डिफेंस अकैडमी और इंडियन मिलिट्री अकेडमी में हुई है.

1984 में जब ऑपरेशन ब्लू स्टार हुआ तो उसके विरोध में वे शिरोमणि अकाली दल में चले गए थे. साल 2008 में वे कांग्रेस में लौटे.

कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व पर अक्सर आरोप लगते हैं कि वह हाथी-दांत के मीनारों में बैठकर सोचा करती है. लेकिन अंत में इस नेतृत्व को अक्ल आई और उसने कम से कम पंजाब में चुनाव-प्रचार से पहले जमीनी स्तर के कार्यकर्ताओं से रिश्ता बनाने की होशमंदी दिखाई.

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पार्टी ने वोटर को लुभाने की अपनी नई रणनीति के तहत जमीनी कार्यकर्ताओं से रिश्ता कायम करने का जिम्मा पटियाला के पूर्व रियासत के महाराजा को दिया.

पिछले लोकसभा चुनाव में पंजाब में कांग्रेस के धराशायी होने के बीच इकलौती जीत हासिल करने वाले कैप्टन अमरिंदर सिंह हीं थे.

‘कैप्टन’ के ब्रांड को और ज्यादा मजबूत बनाने के ख्याल से कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने जनवरी के आखिरी हफ्ते में एेलान किया कि अमरिंदर सिंह पार्टी की तरफ से पंजाब में मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार हैं.

राहुल गांधी ने कहा कि, ‘अमरिंदर सिंह ने पंजाब के लिए अपना खून-पसीना बहाया है. उन्होंने पंजाब के विकास के लिए दिन-रात मेहनत की है.'

राहुल के अनुसार, 'अमरिंदर ने हमेशा पंजाबी और सरदार समुदाय के लोगों के लिए काम किया है. वे ही हमारे मुख्यमंत्री बनेंगे.’ शायद राहुल गांधी अमरिंदर सिंह के मन में उत्साह भरना चाहते थे.

अमरिंदर सिंह

कांग्रेस नेता कैप्टन अमरिंदर सिंह पटियाला में वोट डालते हुए

जनता से दूरी

कैप्टन अमरिंदर सिंह 2014 के लोकसभा चुनाव में अमृतसर से भले ही अरुण जेटली के खिलाफ चुनाव जीत गए हों लेकिन उनके बारे में एक नकारात्मक धारणा बनी चली आ रही थी कि वे किसी से मिलना-जुलना पसंद नहीं करते.

कैप्टन अमरिंदर सिंह के बारे में चली आ रही इसी धारणा को तोड़ने के लिए चुनावी रणनीति के माहिर प्रशांत किशोर बुलाए गए. राहुल गांधी पंजाब के अपने चुनाव-प्रचार को पेशेवराना चमक देना चाहते थे.

प्रशांत किशोर इस वक्त तक 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव में नीतीश की जीत के मददगार के रुप में नाम कमा चुके थे.

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प्रशांत किशोर और उनकी आईपीएसी की टीम ने कांग्रेस के साथ मिलकर कैप्टन अमरिंदर सिंह की छवि चमकाने की रणनीति तैयार की और कैप्टन को 2017 के पंजाब विधानसभा चुनावों का चेहरा बनाकर पेश किया.

उम्र के सत्तर वसंत पार कर चुके अमरिंदर सिंह ‘कॉफी विद् कैप्टन’, ‘हल्के विच कैप्टन’  और ‘पंजाब दा कैप्टन’ जैसी अपनी नई चुनावी पहल के साथ मुहिम पर डट गए.

सोशल मीडिया का कारगर इस्तेमाल हुआ. शहर और गांव के नौजवान तथा लोगों से तार जोड़ने की जी-तोड़ कोशिश हुई ताकि इस धारणा को खत्म किया जा सके कि कैप्टन को लोगों से मिलना-जुलना पसंद नहीं.

अगर कांग्रेस जीतती है तो कैप्टन अमरिंदर सिंह का मुख्यमंत्री बनना तय है लेकिन अगर कांग्रेस हार गई तो क्या होगा?

अमरिंदर सिंह कह चुके हैं कि यह उनका आखिरी चुनाव है. निश्चित ही वे नहीं चाहेंगे कि जिंदगी की इस ढलती हुई वेला में उनकी राजनीतिक पारी हार के साथ खत्म हो. उनकी हार के साथ पंजाब में कांग्रेस का भी खात्मा हो जाएगा.

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