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प्रियंका की मैराथन बैठकें और यूपी के कांग्रेसियों की उबासियां, उलझनें, उम्मीदें...

बीते तीन दशक से यूपी की सत्ता से बाहर कांग्रेस में इस दौरान नेतागिरी ज्यादा हुई और काम कम. प्रियंका गांधी काम को पटरी पर लाने में जुटी हैं.

Updated On: Feb 13, 2019 09:36 PM IST

Ranjib

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प्रियंका की मैराथन बैठकें और यूपी के कांग्रेसियों की उबासियां, उलझनें, उम्मीदें...

लखनऊ में उत्तर प्रदेश कांग्रेस के मुख्यालय पर उबासी, उलझन और उम्मीद का माहौल है. प्रियंका गांधी के कांग्रेस में शामिल होने और लखनऊ पहुंचकर बैठकों का सिलसिला शुरू कर देने से कांग्रेसियों के मौजूदा उत्साही दौर में यह माहौल विरोधाभासी लग सकता है. लेकिन ऐसा ही हो रहा है. दिलचस्प बात यह है कि इसकी वजह भी खुद प्रियंका ही हैं. बीते चौबीस घंटों में उनकी मैराथन बैठकों और लोकसभा क्षेत्रवार नेताओं से सधे सवालों ने इसकी आहट दे दी है कि यूपी कांग्रेस अब नेताओं के कलफ लगे कड़क कुर्तों, मीडिया में बयानबाजी और सूरज चढ़ने पर दिनचर्या शुरू करने वाले पुराने अंदाज में नहीं चलेगी.

बीते तीन दशक से यूपी की सत्ता से बाहर कांग्रेस में इस दौरान नेतागिरी ज्यादा हुई और काम कम. प्रियंका गांधी काम को पटरी पर लाने में जुटी हैं. यही वजह है कि पहले ही दिन उनकी बैठकें दोपहर से शुरू होकर अगले दिन तड़के तक करीब सोलह घंटे चलीं. दूसरे दिन यानी 13 फरवरी को भी बैठकों का ऐसा ही लंबा सिलसिला जारी रहा. इन बैठकों के बीच ही उन्होंने पिछड़ी जाति की राजनीति करने वाली पार्टी महान दल के नेता केशव देव मौर्य के साथ मुलाकात कर लोकसभा चुनाव के लिए उनके साथ गठबंधन के फैसले को अंतिम रूप भी दिया.

न तो यूपी कांग्रेस मुख्यालय ने पिछले तीस साल में ऐसा तौर-तरीका देखा और न कांग्रेसियों को ऐसे रतजगे की आदत रही है. लेकिन मामला कांग्रेस के प्रथम परिवार से ताल्लुक रखने वाली प्रियंका गांधी का है, लिहाजा जिन लोकसभा क्षेत्रों के नेता पहले दिन की बैठकों में बुलाए गए, वे सभी उबासियां लेते हुए भी अपनी बारी का इंतजार करते रहे. इस उम्मीद में कि मुलाकात ठीक से हो और प्रियंका गांधी को बातों से प्रभावित किया जा सके. लेकिन यूपी के कांग्रेसियों के लिए उबासियों और उम्मीदों के बीच उलझन भी मजबूत कड़ी बन रही.

इसलिए क्योंकि बैठकों में प्रियंका के पास सवालों की लंबी फेहरिस्त है और लंबे समय से जमीन से कटे रहे यूपी के कांग्रेसियों के लिए इन सवालों का जवाब दे पाना आसान नहीं हो रहा. वह भी तब जबकि प्रियंका संगठन के लिहाज से निहायत बुनियादी सवाल पूछ रही हैं, मसलन किसी सीट से जो नेता टिकट पाने की दावेदारी कर रहे हैं, उनसे पूछा जा रहा है कि उनके गृह बूथ पर कितने वोटर हैं, वहां पिछले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को कितने वोट मिले थे, आखिरी बार उस लोकसभा क्षेत्र में कांग्रेस ने किस मुद्दे पर कोई प्रदर्शन किया था, क्षेत्र में जाते भी हैं या लखनऊ में ही ज्यादा रहते हुए मीडिया में बयानबाजी करे हैं?

Lucknow: A hoarding with the picture of Congress General Secretary Priyanka Gandhi Vadra along with her grandmother, former prime minister Indira Gandhi during her roadshow in Lucknow, Monday, Feb. 11, 2019. (PTI Photo/Atul Yadav)  (PTI2_11_2019_000229B) *** Local Caption ***

प्रियंका गांधी का कैंपेन

प्रियंका सहज भाव से कर रही हैं जवाब-तलब

बताया जा रहा है कि प्रियंका ये सवाल किसी अफसरी मिजाज से नहीं बल्कि अपने स्वाभाविक सहज शैली में पूछ रही हैं ताकि पार्टी के नेता भी सहज हो सकें. अलबत्ता यह दीगर बात है कि इन बुनियादी सवालों का जवाब भी कई नेता नहीं दे पा रहे हैं. प्रियंका हर क्षेत्र के नेताओं को गुटबाजी से भी बाज आने को कह रही हैं. उल्लेखनीय है कि कांग्रेस यूपी में तीन दशक से सत्ता से बाहर भले ही है लेकिन गुटबाजी में कोई कमी नहीं है.

दरअसल प्रियंका की बड़ी चुनौती ही यह है कि यूपी में कांग्रेस की कार्यप्रणाली को व्यवस्थित करें. यही वजह है कि वे क्षेत्रवार बैठकों में उनके सवालों के मिल रहे जवाबों के जरूरी पॉइंट एक डायरी में नोट करती चल रही हैं. हर क्षेत्र में पार्टी के नेताओं की विस्तृत जानकारी वाला डाटा बेस बनवाना भी इसी रणनीति का हिस्सा है. इसके लिए नेताओं से एक फार्म भरवाया जा रहा है, जिसमें नाम, पता, गांव, क्षेत्र, जाति के साथ सोशल मीडिया पर उनकी उपस्थिति का ब्योरा भी मांगा जा रहा है. यूपी की सियासत में यह कोई नई बात नहीं क्योंकि संगठन के मोर्चे पर कांग्रेस की तुलना में कहीं ज्यादा मजबूत बीजेपी, एसपी और बीएसपी में यह तरीका पहले से रहा है. कांग्रेस में पहली बार इसे गंभीरता से किया जा रहा है. दिल्ली से आए नेताओं के यूं प्रदेश कांग्रेस मुख्यालय पर आकर जमकर बैठने से पार्टी मुख्यालय नेहरू भवन में लगातार चहल-पहल का माहौल भी है.

मुख्यालय के दफ्तरी काम-काज से जुड़े कर्मचारी इस बदलाव को महसूस भी कर रहे हैं. इनका कहना है कि 'माहौल चेंज होने लगा है. जब नेता खुद इतना लंबा बैठने लगेगा तो शार्टकट वाले नेता खुद ही बाहर हो जाएंगे और जो खांटी होंगे वे रहेंगे.' प्रियंका की लंबी बैठकों का सिलसिला अभी एक-दो दिन और जारी रहेगा. उनके साथ पश्चिमी यूपी के प्रभारी बनाए गए ज्योतिरादित्य सिंधिया भी बैठकें कर रहे हैं. उसके बाद वे उन्हें आवंटित लोकसभा क्षेत्रों का दौरा करेंगे. यूपी की 80 सीटों में 41 सीटों का प्रभार प्रियंका के पास है, जबकि 39 की जिम्मेदारी सिंधिया को सौंपी गई है.

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