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जन्मदिन विशेष: कांग्रेस की 'लाइफलाइन' ही नहीं 'संजीवनी' भी हैं प्रियंका

राहुल के नए अवतार को लांच करवाने में प्रियंका का बड़ा किरदार है

Kinshuk Praval Kinshuk Praval Updated On: Jan 12, 2017 12:05 PM IST

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जन्मदिन विशेष: कांग्रेस की 'लाइफलाइन' ही नहीं 'संजीवनी' भी हैं प्रियंका

देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी के सबसे बड़े सियासी परिवार का एक चेहरा आखिर क्यों नेपथ्य में रहने के बावजूद करिश्माई नजर आता है?

आखिर क्या वजह है कि गाहे-बगाहे इस चेहरे को एक मुकम्मल जिम्मेदारी देने की बात जोर-शोर से उठती है? कांग्रेस के इस करिश्माई चेहरे का नाम प्रियंका गांधी है.

जब कभी कांग्रेस की अपने ही गढ़ में सांस टूटने लगती है तो प्रियंका किसी संजीवनी सी नजर आने लगती हैं.

दादी की झलक

प्रियंका में कई लोगों को दादी इंदिरा दिखाई देती हैं. प्रियंका अपनी सहज मुस्कुराहट और आत्मीयता से लोगों को अपनी तरफ खींचती है. अपनी स्वाभाविक संवाद शैली की वजह से वह अपनों के बीच इंदिरा की मानिंद नजर आती हैं.

पहले कहा जाता था ‘इंदिरा लाओ देश बचाओ’ लेकिन अब बदले हालात के बीच ये सुगबुगाहट है कि ‘प्रियंका लाओ कांग्रेस बचाओ’.

लेकिन प्रियंका हमेशा राजनीति में खुलकर आने से इनकार कर जाती है. इसके पीछे की वजह उनकी राजनीतिक अपरिपक्वता की जगह उनकी पारिवारिक भावना ज्यादा लगती है.

Rahul Gandhi Priyanka Gandhi

चुनाव प्रचार के दौरान राहुल और प्रियंका गांधी

प्रियंका के राजनीतिक कौशल को ‘चुनावी गुरू’ कहे जाने वाले अरुण नेहरू से बेहतर कौन जान सकता था.

जाति की गणित के जानकार अरुण नेहरु भी प्रियंका गांधी के सिर्फ एक बयान से अपना राजनीतिक करियर को खत्म होने से रोक नहीं सके.

प्रियंका गांधी ने अपनी भाषण शैली से पस्त किया था अरुण नेहरू को

साल 1999 का लोकसभा चुनाव था. रायबरेली से सतीश शर्मा के खिलाफ अरुण नेहरू खड़े हुए थे.

कभी राजीव गांधी के जोड़ीदार रहे अरुण नेहरु रिश्ते में राजीव गांधी के ममेरे भाई भी थे. लेकिन राजनीति के चलते रिश्तों में खटास पड़ने के बाद राजीव को छोड़कर वह पहले विश्वनाथ प्रताप सिंह के साथ हुए और बाद में बीजेपी के साथ.

उसी बीच रायबबरेली की पारंपरिक सीट से गांधी परिवार का वर्चस्व खत्म करने के लिए उन्होंने पर्चा भरा. अरुण नेहरू ने जमकर प्रचार भी किया लेकिन प्रियंका गांधी का सिर्फ एक भावनात्मक बयान ही उनके सारे चुनावी गणित पर भारी पड़ गया.

प्रियंका ने रायबरेली की जनता से शिकायती लहजे में पूछा कि उनके पिता राजीव गांधी को धोखा देने वाले अरुण नेहरू को उन्होंने रायबरेली में घुसने कैसे दिया.

‘मुझे आपसे एक शिकायत है. मेरे पिता के साथ जिसने गद्दारी की…पीठ में छुरा भोंका… जवाब दीजिए… ऐसे आदमी को आपने यहां घुसने कैसे दिया? उनकी यहां आने की हिम्मत कैसे हुई?’

प्रियंका ने आगे कहा कि ‘यहां आने से पहले मैंने अपनी मां से बात की थी… मां ने कहा किसी की बुराई मत करना, लेकिन मैं आप से भी अगर दिल से बात न कहूं तो फिर किससे कहूं.’

प्रियंका की भावुक शिकायत लोगों के दिलों में इस कदर उतरी कि पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का रायबरेली दौरा भी अरुण नेहरू को जिता नहीं सका.

Sonia Gandhi Priyanka Gandhi

मां के साथ बेल्लारी में चुनाव प्रचार करतीं प्रियंका

प्रियंका गांधी के सम्मोहन की दूसरी तस्वीर कर्नाटक के बेल्लारी के लोकसभा चुनाव के वक्त दिखी. बेल्लारी से सोनिया गांधी लोकसभा चुनाव में उतरीं तो उनके सामने बीजेपी की तरफ से सुषमा स्वराज खड़ी हुई थीं.

स्वराज बीजेपी की धुरंधर वक्ता हैं. उनकी अद्भुत भाषण शैली, भारतीय नारी की छवि और विदेशी मूल के मुद्दे सोनिया पर भारी पड़ रहे थे.

ऐन मौके पर प्रियंका ने सोनिया गांधी के प्रचार की कमान थाम कर चुनाव का पासा ही पलट दिया. प्रियंका के रोड-शो में हजारों की भीड़ उमड़ी और जनता के साथ प्रियंका का आत्मीय अंदाज वोटों में बदलने के काम आया.

बेल्लारी में सोनिया के लिये सियासत की संजीवनी साबित हुई प्रियंका ने इसके बाद भी कभी कांग्रेस में खुलकर बड़ी जिम्मेदारी नहीं ली.

मुश्किल घड़ी में राहुल के साथ रहती हैं प्रियंका

साल 2004 में राहुल गांधी की कांग्रेस में आधिकारिक एंट्री हुई लेकिन प्रियंका अपने भाई के पीछे दीवार की तरह खड़ी रहीं. वही मजबूत दीवार आज भी राहुल के पीछे का सबसे बड़ा सपोर्ट है.

भले ही राहुल कांग्रेस के उपाध्यक्ष के बाद अब अध्यक्ष बनने से कुछ कदम दूर हैं लेकिन सबसे बड़े सियासी परिवार की ये जोड़ी अब तक की सबसे अलग जोड़ी है.

प्रियंका ने बिना राजनीति में आए ही राहुल के लिए राजनीति की बुनियाद तैयार की है.

साल 2004 में जब राहुल ने अमेठी से लोकसभा का नामांकन भरा, तब साथ में प्रियंका ही थीं और अब जब राहुल कांग्रेस के अध्यक्ष बनने वाले हैं तब भी प्रियंका साथ हैं.

गांधी परिवार के राजनीतिक इतिहास को देखें तो परिवार की एक जोड़ी हमेशा साथ चलती रही.

नेहरू के वक्त इंदिरा उनसे राजनीति के दांव-पेंच सीखकर आगे बढ़ीं. इंदिरा के समय संजय गांधी उनके साथ बराबर रहे.

संजय के न रहने के बाद वही जगह राजीव ने भरी. अब सोनिया गांधी के साथ राहुल गांधी मौजूद हैं.

सियासत के भविष्यवक्ता साल 2019 के चुनावों की तारीख दे रहे हैं. उनका मानना है कि कांग्रेस के अध्यक्ष पद को आधिकारिक तौर पर राहुल जब संभालेंगे तब उनके पास 2019 के लोकसभा चुनाव की तैयारी के लिए 2 साल का वक्त होगा.

उस मौके पर प्रियंका खुल कर राहुल के साथ कांग्रेस की कमान संभालेंगीं. लेकिन ये कयास और आकलन अपनी जगह हैं.

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हर महत्वपूर्ण मौके पर राहुल के साथ नजर आती हैं प्रियंका

प्रियंका ने खुद को जिस तरह से ढाला है और अब-तक राजनीति से दूर रखा है उसकी सबसे बड़ी वजह खुद उनके भाई राहुल ही हैं.

राजनीति में न आने की सबसे बड़ी वजह प्रियंका का अपने भाई के लिए रास्ता छोड़ना ही है. प्रियंका ये बखूबी जानती हैं कि जिस दिन भी वह आधिकारिक तौर पर कांग्रेस में आ जाएंगी तो सत्ता के दो ध्रुव राहुल के लिए मुश्किल हालात बना सकते हैं.

हालांकि कांग्रेस के लिए ये बेहतर मौका हो सकता है. भाई-बहन की जोड़ी कांग्रेस की सौ साल पुरानी राजनीति को युवा बना सकती है. उसमें जोश भर सकती है.

लेकिन प्रियंका ये कभी नहीं चाहतीं कि उनके आने के बाद पार्टी के भीतर सत्ता के दो केंद्र हों. दरअसल प्रियंका खुद उस टीम का हिस्सा हैं जो राहुल के लिए सियासी मैनेजमेंट देख रही है.

राहुल की आज की टीम सत्तर और अस्सी के दशक में इंदिरा गांधी की टीम की याद दिलाती है.

इंदिरा गांधी के भरोसेमंद सलाहकारों की अपनी अलग टीम थी जिसमें आर के धवन, यशपाल कपूर, सिद्धार्थ शंकर रे, पी एन हक्सर, माखनलाल फोतेदार, नटवर सिंह जैसे लोग हुआ करते थे.

राजीव गांधी के भरोसेमंद लोगों में अरुण नेहरू, अरुण सिंह, सतीश शर्मा जैसे लोग थे.

सोनिया के समय अहमद पटेल, ऑस्कर फर्नांडिस, जनार्दन द्विवेदी जैसे लोग भरोसेमंद और करीबी माने गए.

तो राहुल के समय दिग्गज कांग्रेसी नेताओं के अलावा कनिष्क सिंह उनका सियासी मैनेजमेंट देख रहे हैं.

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अमेठी में स्थानीय महिलाओं के साथ बातें करतीं प्रियंका गांधी

प्रियंका का स्टाइल अपना रहे हैं राहुल

प्रियंका अपने रोल को बेहतर जानती हैं जिसे वो पिछले 16 साल से निभा रही हैं. पर्दे के पीछे रहकर ही वो राहुल के लिये चुनावी गणित तैयार करने में जुटी हुई हैं. प्रियंका राहुल के सियासी मेकओवर को करीब से देख रही हैं.

कहा ये भी जाता है कि हाल ही में दिल्ली में हुए कांग्रेस के राष्ट्रीय अधिवेशन में राहुल के भाषण में प्रियंका का बड़ा हाथ था.

राहुल का अपनी बात कहने का अंदाज बदला है. राहुल धीरे-धीरे अपने भाषण का एक स्टाइल डिवेलप कर रहे हैं. राहुल की बदलती स्टाइल के पीछे प्रियंका की पाठशाला मानी जा रही है.

प्रियंका में वाकपटुता है तो वो आत्मविश्वास से लबरेज भी. प्रियंका में हर वो तेवर और अंदाज है जो सियासत के लिए जरुरी है. इसके बावजूद वो राजनीति को ना कह कर राहुल के शो के सुपरहिट होने का इंतजार कर रही हैं और उसकी पटकथा और निर्देशन पर काम कर रही हैं.

अमेठी और रायबरेली तक सीमित रहने वाली प्रियंका अब कांग्रेस के दिग्गज नेताओं के साथ राहुल की हर बैठक में मौजूद होती हैं

अब राहुल की ताजपोशी की औपचारिक घोषणा का इंतजार है और राहुल के नए अवतार को लांच करवाने में प्रियंका का बड़ा किरदार है.

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