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किसानों को आंकड़ों में उलझाती मोदी सरकार

प्रधानमंत्री जी बहुत कुछ या तो भूल गए या जनता से छुपा गए.

Updated On: Nov 30, 2016 08:50 AM IST

Saqib Salim

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किसानों को आंकड़ों में उलझाती मोदी सरकार

सच घटे या बढ़े तो सच न रहे झूठ की कोई इन्तेहा ही नहीं

                  -‘कृष्ण बिहारी नूर’

उर्दू भाषा के मशहूर शायर कृष्ण बिहारी नूर ने शायद ये शेर हमारे नेताओं के भाषण सुन कर ही कहा होगा. कुशीनगर में हुई भाजपा की परिवर्तन रैली  में बोलते हुए जो कुछ प्रधानमंत्रीजी देश की आम जनता से बोल गए, वो बोलना केवल हमारे नेताओं के लिए ही संभव है.

प्रधानमंत्री ने वहां सुनने के लिए आए लोगों को ये बताया कि किस प्रकार उन्होंने किसानों का उद्धार किया है. उनके अनुसार उन्होंने गन्ना उगाने वाले किसानों पर खास ध्यान दिया है. उन्होंने कहा कि जब वे सत्ता में आए थे तब किसानों का 22,000 करोड़ रुपया चीनी मिलों के पास बकाया पड़ा हुआ था.

उन्होंने मिल मालिकों की मीटिंग बुलायी और उनको ‘लताड़ा’ कि ऐसे नहीं चलेगा और जल्द से जल्द किसानों का भुगतान कर दें. मिल मालिकों के सरकारी पैकेज मांगने पर उन्होनें साफ कह दिया कि ऐसा पिछली सरकारों में होता आया है लेकिन अब नहीं होगा.

उनके अनुसार उनके इस कदम से किसानों को पैसा मिला और मिल मालिकों को कुछ लाभ नहीं हुआ जो पहले होता आया था.

प्रधानमंत्री जी बहुत कुछ या तो भूल गए या जनता से छुपा गए

इस साल मई में सहारनपुर में सरकार के दो वर्ष पूरे करने के उपलक्ष्य में हुई रैली में उन्होंने खुद पिछली सरकार से मिली बकाया राशि को 14,000 करोड़ बताया था जिसे अब 6 महीने बाद वह 22,000 करोड़ बता रहे हैं. ये आंकड़ों का फर्क उनके अपने भाषणों में कैसे आता है, ये वही जानते हैं.

उनके अनुसार उन्होने कांग्रेस की उस नीति को बदल दिया है जिसमें मिल मालिकों को पैकेज मिला करते थे.

प्रधानमंत्रीजी शायद भूल गए कि उनकी खुद की निगरानी में हुई कैबिनेट की बैठकों में दो बार चीनी मिलों को क्रमशः 4,400 करोड़ और 6,000 करोड़ बिना ब्याज के दिए जा चुके हैं. ये निर्णय कैबिनेट कमिटी फॉर इकनोमिक अफेयर्स (सीसीईए) की बैठक में लिए गये थे जिसकी अध्यक्षता प्रधानमंत्री ही करते हैं.

परेशान किसान

उनका ये दावा की मिलें गन्ना किसानों का भुगतान कर चुकी हैं, भी किसी ठोस सतह पर नहीं नजर आता. सबसे पहले ये समझने की जरूरत है कि गन्ने का एक न्यूनतम मूल्य केंद्र सरकार निर्धारित करती है जो वर्तमान में 230 रुपये प्रति क्विंटल की दर पर है. दूसरा मूल्य प्रदेश सरकार निर्धारित करती है जिस पर चीनी मिलें किसानों से असल में गन्ना खरीदती हैं. ये मूल्य फिलहाल में उत्तर प्रदेश में 305 रुपये प्रति क्विंटल है. यानी कुल 75 रुपए प्रति क्विंटल का फर्क.

अब सरकार के उन आंकड़ों की बात की जाए जो केंद्र सरकार के 230 रुपए वाले मूल्य के हिसाब से इकठ्ठा किये गये हैं तो इस फसल के पहले तक भी 6,000 करोड़ का बकाया चीनी मीलों पर था. अगर ये हिसाब 305 रुपए की दर से लगाया जाए तो ये कहीं अधिक होगा.

भारतीय किसान यूनियन की मानी जाए तो नोटबंदी का भी गन्ना किसानों पर नकारात्मक असर होने वाला है.

प्रधानमंत्रीजी ने किसानों के लिए फसल बीमा योजना के भी कसीदे पढ़े. उनकी मंशा इस योजना के पीछे अच्छी होगी, इससे हमको कोई इनकार नहीं है लेकिन क्या वे खुद या देश का कोई भी जागरूक नागरिक किसानों के कर्ज के कारण आत्महत्या करने को झुठला सकता है.

किस सोच का परिचय दे रहे हैं प्रधानमंत्री जी

इसपर इतना लिखा और कहा जा चुका है कि मैं कोई आंकडे़ पेश करने की जरूरत महसूस भी नहीं करता. इसके बाद प्रधानमंत्री ने झूठ के साथ-साथ भारत की आम जनता की परेशानियों को छोटी-मोटी परेशानी कह कर उनका उपहास भी कर लिया. उनका कहना था कि नोटबंदी के उनके फैसले से जहां बड़े लोगों को बड़ी तकलीफ है, वहीं छोटे-छोटे लोगों को छोटी-छोटी तकलीफ है.

हमारे प्रधानमंत्री किस सोच का परिचय दे रहे हैं? उनके अनुसार इस देश में कुछ छोटे लोग हैं और कुछ बड़े, सब समान नहीं हैं.

छोटे वे जिनकी तिजोरियों में धन कम है और बड़े वे जिनकी तिजोरियां भरी हुई हैं. हम मानते हैं कि समाज में लोग ऐसी ही भाषा का प्रयोग करते हैं लेकिन प्रधानमंत्री का इस धारणा पर मुहर लगाना शोभा नहीं देता है.

और उनकी अपनी परिभाषा के साथ ही उन्होंने ये कैसे मान लिया कि आम लोगों को दिक्कत कम है और धन्ना-सेठों को अधिक? प्रधानमंत्रीजी क्या अखबार भी नहीं पढ़ते? क्या वे जानते हैं कि अब तक बैंकों के 11 कर्मचारी काम की अधिकता से जान दे चुके हैं और बैंक कर्मचारी संघ ने रिजर्व बैंक के गवर्नर से इस्तीफा तक मांगा है.

हो सकता है कि उनको ये सब बड़े लोग लगते हों. अब तक लाइनों में लगने से, पैसे की कमी से 70 से अधिक लोग देशभर में दम तोड़ चुके हैं. उन में से कोई भी धन्ना सेठ न था. कुछ मजदूर परिवार थे, कुछ छोटे रोजगार वाले.

झूठ बोलते हैं नेता 

बड़े लोगों की बड़ी परेशानी ये है कि पूर्व में भाजपा से मंत्री रह चुके और कई घोटालों के आरोपित जनार्दन रेड्डी के घर शादी होती है तो कथित तौर पर 500 करोड़ से ज़्यादा खर्च किया जाता है. जबकि आम जनता बैंक की लाइनों में लगी हुई थी. इस शादी में कर्नाटक भाजपा के मुखिया येदुरप्पा जी भी गये थे. तो क्या प्रधानमंत्री इसको बड़े लोगों की बड़ी परेशानी मानते हैं और गरीब आदमी की मौत को छोटी परेशानी?

वैसे तो भारत के नेता झूठ बोलते आए हैं लेकिन प्रधानमंत्री क्योंकि देश का मुखौटा होता है तो उनसे हम उम्मीद करते हैं कि वे सिर्फ उत्तर प्रदेश चुनाव के लिए यूं जनता से झूठ न बोलें और देश को बेहतर नेतृत्व दें.

(लेखक जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय में इतिहास के शोधकर्ता हैं)

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