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राज्यसभा, ऑड-ईवन, लाभ के पद: आप में चलती रही है 'जंग'

आम आदमी पार्टी जिस आंदोलन से शुरू हुई थी. उससे कहीं दूर और अलग दिशा में जा चुकी है

Updated On: Jan 21, 2018 05:22 PM IST

FP Staff

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राज्यसभा, ऑड-ईवन, लाभ के पद: आप में चलती रही है 'जंग'

आम आदमी पार्टी जब से बनी है, विवादों से इसका पुराना नाता रहा है. कई बार ये विवाद पार्टी के अंदर से पैदा हुए, कभी इनकी दिल्ली के एलजी से 'जंग' चलती रही. साल 2012 अन्ना के भ्रष्टाचार के खिलाफ इंडिया अगेंस्ट करप्शन आंदोलन से पैदा हुई आम आदमी पार्टी. तभी से इसका नाता विवादों से जुड़ गया.

अन्ना के साथ मंच साझा करने वाले केजरीवाल, मनीष सिसौदिया, योगेंद्र यादव, कुमार विश्वास सहित कई लोगों ने भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग लड़ने की बात करते हुए 21 नवंबर 2012 को आम आदमी पार्टी बनाई.

पार्टी ने अपने गठन के साथ ही साल 2013 में दिल्ली विधानसभा चुनावों में लड़ने की घोषणा की. जन लोकपाल बिल पास करवाने के नाम पर लोगों से वोट की अपील की.

आम आदमी पार्टी की राजनीतिक पारी की शुरुआत बेहद खास रही और पार्टी ने पहले ही चुनाव में 70 में से 28 सीटें जीत ली. उसके बाद कांग्रेस के समर्थन से सत्ता में भी काबिज हो गई. और अरविंद केजरीवाल पहली बार मुख्यमंत्री बने.

लोकपाल बिल का नाम लेकर चुनाव लड़ने वाली आम आदमी पार्टी ने जब लोकपाल बिल विधानसभा में रखा तो अन्य पार्टीयों ने इसे समर्थन नहीं दिया. और बिल पास नहीं हो सका.

जिसके बाद केजरीवाल ने वादे के मुताबिक लोकपाल बिल पास न करवा पाने के कारण 49 दिन की सरकार चलाने के बाद इस्तीफा दे दिया. हालांकि विपक्षी पार्टियों ने उन पर भगोड़े होने का आरोप मढ़ दिया. इस बीच केजरीवाल बतौर मुख्यमंत्री धरने करके सुर्खियों में आ चुके थे.

विधानसभा भंग होने के बाद साल 2015 में पार्टी ने  फिर से चुनाव लड़ा और एतिहासिक करिश्मा करते हुए 70 में से 67 सीट जीत ली. इसबार आप के पास ऐतिहासिक जनादेश था.

दिल्ली विधानसभा में जीत से अतिउत्साहित आम आदमी पार्टी ने 2014 लोकसभा चुनावों में उतरने का ऐलान कर दिया. खुद केजरीवाल बनारस से नरेंद्र मोदी के खिलाफ खड़े हुए. दूसरी तरफ कुमार विश्वास ने स्मृति ईरानी और राहुल गांधी को अमेठी में चुनौती दी. दोनों बुरी तरह हारे. हालांकि पार्टी अपने पहले लोकसभा चुनावों में ही 4 सीटें जीतने में कामयाब हो गई.

हरियाणा में आम आदमी पार्टी को चुनावों में करारी हार मिली इसके बाद विवादों का सिलसिला शुरू हो गया. फाउंडिंग टीम के कई नेता पार्टी छोड़कर चले गए. यहीं से योगेंद्र यादव और केजरीवाल के बीच में दरार पड़ी.बाद में यादव और प्रशांत भूषण को पार्टी छोड़नी पड़ी.

इसके बाद कपिल मिश्रा ने नया विवाद शुरू किया. कहा जाता है मिश्रा तख्ता पलट की कोशिश की. कई सारे ड्रामों के बीच कपिल पार्टी की गतिविधियों से अलग कर दिए गए. योगेंद्र यादव ने पार्टी से अलग रहने के बाद भी केजरीवाल के ईमानदार होने की बात मानी.

2017 की सर्दियों में प्रदूषण के समय ऑड-ईवन फिर से लागू करने की कोशिशों को करारा झटका लगा. आप सरकार ने प्रदूषण से निपटने के पर्याप्त इंतजाम नहीं किए थे. अंत समय में टोकन जैसी ऑड-ईवन योजना को एनजीटी ने रोक दिया.

अरविंद केजरीवाल के ऊपर सबसे बड़ा झटका राज्यसभा टिकट वितरण के समय लगा. न सिर्फ उनके सबसे विश्वसनीय कुमार विश्वास उनसे दूर हो गए. योगेंद्र यादव समेत कई लोगों ने केजरीवाल की आलोचना की. पार्टी के कई खास लोगों को छोड़कर बाहर वाले लोगों को टिकट न देना ज्यादातर के गले नहीं उतरा.

इसके अलावा सतेंद्र जैन, एमसीडी चुनाव और ऐसे तमाम दूसरे विवाद आम आदमी पार्टी के साथ आते जाते रहे. दिल्ली के पूर्व लेफ्टिनेंट गवर्नर नजीब जंग के साथ टकराव की खबरें तो हमेशा आती रही. आने वाले समय में लाभ के पद मामले से आप को कितना नुक्सान होगा, अभी देखना बाकी है.

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