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राष्ट्रपति चुनाव: इन कारणों से टूटेगा विपक्षी कुनबा, जीतेंगे कोविंद!

विपक्ष मोर्चे के उम्मीदवार के सामने कई तरह की चुनौतियां होंगी, जिनमें आपसी सहमति कायम कर पाना सबसे कठिन है

Arun Tiwari Arun Tiwari Updated On: Jun 19, 2017 05:13 PM IST

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राष्ट्रपति चुनाव: इन कारणों से टूटेगा विपक्षी कुनबा, जीतेंगे कोविंद!

राम नाथ कोविंद को राष्ट्रपति उम्मीदवार घोषित करके बीजेपी ने एक तीर से कई निशाने साधे हैं. साथ ही पीएम मोदी ने अपने निर्णयों के साथ बने रहने वाले संशय को भी कायम रखा है. आइए जानते हैं बीजेपी के इस निर्णय के बाद विपक्षी दलों के स्थिति क्या होगी...

कांग्रेस

sonia gandhi

पिछली बार सत्ताधारी पार्टी के रूप में प्रणब मुखर्जी को राष्ट्रपति उम्मीदवार बना सकने में सफल रहने वाली कांग्रेस पार्टी इस बार भी पूरी ताकत दिखाने की कोशिश कर रही है. लेकिन 17 पार्टियों वाली उसकी नाव में कई छेद अभी से दिखाई देने लगे हैं. बीते महीने सोनिया गांधी की लंच पार्टी में 17 पार्टियों ने शिरकत की थी. लेकिन कई तरह के मतभेद खुलकर सामने दिख रहे थे.

बिहार से लालू मौजूद थे लेकिन नीतीश कुमार नदारद दिखाई दिए. हालांकि उनकी जगह उनकी पार्टी से शरद यादव और केसी त्यागी की प्रतीकात्मक मौजूदगी थी. लेकिन जेडीयू की राजनीति को जानने वाले ये अच्छी तरह से जानते हैं कि नीतीश की नामौजूदगी के मायने क्या हैं?

वहीं यूपी से समाजवादी पार्टी के अखिलेश यादव तो मौजूद थे लेकिन मुलायम सिंह यादव ने अपने पत्ते बाद में खोले. जो पार्टी की स्थिति साफ बताते हैं. ऐसे में कांग्रेस की उस ग्रैंड पार्टी के सहयोगी उसका साथ कितना देंगे, ये देखना दिलचस्प होगा.

समाजवादी पार्टी

Mulayam Akhilesh

बीती 25 मई को राष्ट्रपति चुनाव के मद्देनजर रखी गई सोनिया गांधी की लंच पार्टी में समाजवादी पार्टी की तरफ से पूर्व सीएम अखिलेश यादव मौजूद थे. इस पार्टी में अखिलेश यादव की मौजूदगी से ये लगा था कि सपा का समर्थन साझे विपक्षी उम्मीदवार की तरफ जाएगा.

लेकिन 18 जून को समाजवादी के पार्टी सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव ने यूपी चुनाव की याद ताजा करते हुए एक बार फिर अखिलेश यादव के विरुद्ध स्टैंड ले लिया. मुलायम सिंह यादव ने सीधा ऐलान कर दिया है कि वो इस चुनाव में एनडीए के उम्मीदवार को समर्थन देंगे.

ये भी कहा जा रहा है कि अखिलेश यादव किसी भी सूरत में एनडीए उम्मीदवार के साथ नहीं जाएंगे. ऐसी स्थिति में राष्ट्रपति चुनाव में पार्टी में दो फाड़ होता साफ दिख रहा है.

ये भी बहुत हद तक संभव है कि यूपी चुनावी की करारी हार के बाद शायद पार्टी के ज्यादातर विधायक मुलायम सिंह यादव की ही बात मानें.

बहुजन समाज पार्टी

Mayawati

सोनिया गांधी की ग्रैंड पार्टी में बसपा सुप्रीमो मायावती भी मौजूद थीं. ऐसा कहा जा रहा है कि लोकसभा और यूपी चुनाव में बुरी हार के बाद वो पूरी लामबंदी करने की कोशिश में हैं कि बीजेपी का उम्मीदवार चुनाव जीतने न पाए. लेकिन रामनाथ कोविंद को चुनने का बीजेपी का फैसला शायद बीएसपी के लिए सबसे ज्यादा भारी पड़ने वाला है.

बहुजन समाज पार्टी की राजनीति अभी तक दलित राजनीति के इर्द-गिर्द ही घूमती रही है. ऐसे में यूपी से एक दलित समाज के ही एक नेता को राष्ट्रपति उम्मीदवार के लिए खड़ा करने के कदम के बाद ये उनके लिए एक और झटका साबित होने वाला है. क्योंकि अगर मायावती एक दलित उम्मीदवार के राष्ट्रपति न बनाने का राजनीतिक स्टैंड लेती हैं तो ये उनकी कोर पॉलिटिक्स के भी खिलाफ होगा.

राजद और जेडीयू

lalu nitish

बिहार के इन सत्ताधारी दलों की जैसी राजनीति राज्य में दिख रही है कुछ वैसा ही राष्ट्रपति चुनावों में भी देखने को मिल रहा है. अभी तक बीजेपी के मूव और नीतीश कुमार के कई मुद्दों पर पीएम के समर्थन को देखते हुए ये कहा जा सकता है कि उनका समर्थन एनडीए उम्मीदवार को मिल सकता है.

राम नाथ कोविंद अभी बिहार के राज्यपाल हैं. नीतीश कुमार उनके साथ काम भी कर रहे हैं. ऐसे में ये नजदीकी भी एक वजह हो सकती है जिसकी वजह से जेडीयू का समर्थन एनडीए की ओर हो सकता है. रामनाथ कोविंद की उम्मीदवारी के तुरंत बाद उन्हें फोन कर नीतीश कुमार ने समर्थन के संकेत भी दिए हैं.राज्य में दोनों पार्टियों के बीच तनातनी का माहौल भी एक वजह तो जरूर बनेगा.

वहीं राजद की ओर से लालू भले ही सोनिया की रैली में दिखाई दिए हों लेकिन अभी तक उन्होंने अपने पत्ते भी पूरी तरह से खोले नहीं हैं. लालू की अभी तक की राजनीति बीजेपी विरोध पर रही है. संभव है राष्ट्रपति का यह चुनाव दोनों दलों के बीच खाई को और चौड़ा कर दे.

तृणमूल कांग्रेस और बीजद

mamta

रामनाथ कोविंद के नाम की घोषणा से ठीक 24 घंटे पहले वित्त मंत्री अरुण जेटली ने ममता बनर्जी और बीजद से बात कर अपने उम्मीदवार को समर्थन देने पर बातचीत की थी. ओडिशा और पश्चिम बंगाल दोनों ही ऐसे राज्य हैं जहां बीजेपी तेजी के साथ उभार पर है. ये बात इन दोनों राज्यों के मुख्यमंत्री समझते हैं.

ममता बनर्जी विपक्ष के साझा उम्मीदवार के मजबूत समर्थन में हैं. वहीं ओडिशा के स्थानीय चुनाव में भारतीय जनता पार्टी का जिस तरह का प्रदर्शन रहा है, उससे नवीन पटनायक सहम चुके हैं. ये दोनों ही नेता पहले एनडीए का हिस्सा भी रह चुके हैं. लेकिन नवीन पटनायक के बारे में ये माना जाता है कि वो मुद्दों को लेकर समर्थन देते हैं ऐसे में संभव है कि बीजेपी उनका समर्थन जुटा ले. अरुण जेटली ने मुलाकात कर इन नेताओं को भरोसे में लेने की कोशिश भी की है.

वाम दल, एनसीपी, नेशनल कांफ्रेंस और द्रमुक और अन्नाद्रमुक

विपक्षी एकता का जुटान करने में वाम दल के नेता काफी सक्रियता से लगे हुए हैं. सोनिया की पार्टी में भी सीताराम येचुरी मौजूद थे. लेकिन कोविंद का दलित कार्ड खेलकर बीजेपी ने विपक्षी पार्टियों की एकता में छेद करने काम तो कर ही दिया है.

शरद पवार ने खुद की उम्मीदवारी को हाल ही में नकारा था. ऐसे में बीजेपी उनका साथ भी अपनी तरफ ला सकती है. वहीं कश्मीर में विपक्षी दल के रूप में मौजूद उमर अब्दुल्ला ने यूपी चुनाव के बाद पीएम मोदी की तारीफ कर कई तरह के संकेत दिए थे. बीजेपी जरूर उससे आस लगाए बैठी होगी.

तमिलनाडु की राजनीति में बीजेपी को सत्ताधारी अन्नाद्रमुक की तरफ से समर्थन मिलने की उम्मीद है. वहीं द्रमुक की ओर इस मुद्दे पर कोई स्पष्ट राय अभी तक नहीं रखी गई है.

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