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राष्ट्रपति चुनाव 2017: नीतीश का रामनाथ कोविंद को समर्थन, चौंकाने वाला फैसला नहीं है!

नीतीश के बगैर विपक्ष की लड़ाई महज खानापूर्ति बनकर रह जाएगी

Amitesh Amitesh Updated On: Jun 21, 2017 06:21 PM IST

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राष्ट्रपति चुनाव 2017: नीतीश का रामनाथ कोविंद को समर्थन, चौंकाने वाला फैसला नहीं है!

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने राष्ट्रपति उम्मीदवार के तौर पर बिहार के राज्यपाल रहे रामनाथ कोविंद को समर्थन करने का ऐलान कर दिया है. जेडीयू की बैठक के बाद पार्टी के प्रधान महासचिव केसी त्यागी ने इस बात की जानकारी दी. इससे पहले बुधवार सुबह जेडीयू के विधायक रत्नेश सदा ने भी इस बात का दावा किया था. जेडीयू गुरुवार को होने वाली विपक्ष की बैठक में शामिल नहीं होगी.

नीतीश के बाद बीजेपी को घेरने की विपक्षी कुनबे का पूरा प्लान पंचर हो गया है. कांग्रेस और लेफ्ट समेत विपक्षी नेताओं की 22 जून को बैठक होने वाली थी जिसमें विपक्ष के साझे उम्मीदवार के नाम का ऐलान होना था. लेकिन, उसके ठीक एक दिन पहले ही जेडीयू अध्यक्ष नीतीश कुमार ने पटना में पार्टी नेताओं की बैठक में विपक्ष की राय से अलग हटकर बीजेपी के उम्मीदवार का समर्थन कर दिया.

हालांकि नीतीश का कदम चौंकाने वाला नहीं लग रहा क्योंकि, उन्होंने पहले भी इस बात के संकेत दे दिए थे. बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने जैसे ही रामनाथ कोविंद के नाम का ऐलान किया था उसके तुरंत बाद नीतीश कुमार ने अपनी पहली प्रतिक्रिया में रामनाथ कोविंद की तारीफ की थी.

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नीतीश ने राजभवन जाकर रामनाथ कोविंद से मुलाकात के बाद कहा था ‘मेरे लिए यह व्यक्तिगत तौर पर प्रसन्नता की बात है कि बिहार के राज्यपाल राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार घोषित हुए हैं. उन्होंने आगे कहा था कि इस बाबत उनकी लालू जी और सोनिया जी से भी बात हुई है और उन्होंने अपनी भावना से उन्हें अवगत भी करा दिया है.’

नीतीश की तरफ से कोविंद की तारीफ में कहे गए इन चंद शब्दों के बाद से ही कोई शंका नहीं रह गई थी कि नीतीश कुमार का कदम क्या होगा. आखिरकार विपक्ष की बैठक के ठीक एक दिन पहले उनके ऐलान ने संदेह से पर्दा उठा दिया.

नीतीश के इस कदम के मायने क्या हैं?

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सवाल यही उठता है कि नीतीश कुमार के इस कदम के मायने क्या हैं. क्या नीतीश का झुकाव विपक्ष के साथ ना होकर बीजेपी के साथ हो रहा है. क्या इसे बीजेपी के साथ उनकी बढ़ती नजदीकी के तौर पर देखा जाए या फिर एक मंझे हुए राजनेता का सही राजनीतिक कदम माना जाए.

उनके पिछले कुछ महीनों के सियासी फैसलों पर गौर करें तो साफ लग रहा है कि नीतीश केवल विरोध के नाम पर विरोध करने की राजनीति को तरजीह नहीं देते. विरोधी होते हुए भी सरकार के फैसले के साथ खड़ा होना उनके राजनीतिक कद और विश्वसनीयता को और मजबूत बनाता है.

पिछले साल के आखिर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब नोटबंदी का बड़ा फैसला किया तो उस वक्त पूरा विपक्ष मोदी के इस फैसले को लेकर विरोध में खड़ा हो गया. संसद से लेकर सड़क तक इस पर हंगामा भी खूब हुआ. लेकिन, उस वक्त भी नीतीश कुमार ने नोटबंदी पर प्रधानमंत्री मोदी के कदम की तारीफ की थी.

जेडीयू नेता शरद यादव लगातार नोटबंदी के खिलाफ बोल रहे थे, लेकिन, नीतीश कुमार इसे भ्रष्टाचार रोकने की दिशा में एक बेहतर कदम बताते नहीं थक रहे थे.

और भी कई मौकों पर नीतीश कुमार का कदम इस बात की पुष्टि करता है कि वो एक रचनात्मक विरोधी की भूमिका निभा कर बीजेपी और मोदी सरकार के फैसले का विरोध करते हैं, ना कि हर मौके पर केवल विरोध करने के लिए ही अपनी राजनीति चमका रहे हैं.

विपक्ष की तरफ से लगातार महागठबंधन बनाने की बात की जा रही है. 2019 की लड़ाई से दो साल पहले राष्ट्रपति चुनाव के वक्त सभी बीजेपी विरोधी दलों को एक साथ एक मंच पर लाने की कोशिश की जा रही थी. बीच-बीच में इस बात पर भी चर्चा हो रही थी कि शायद नीतीश कुमार विरोधी दलों की सियासत के केंद्र में बड़े नायक के रूप में उभर कर सामने आ जाएं.

इस बात में तनिक भी संदेह नहीं है कि विपक्षी दलों में इस वक्त नीतीश कुमार के अलावा दूसरा कोई भरोसेमंद चेहरा नहीं है. बावजूद उसके उन्होंने कुछ दिन पहले ही अपने-आप को प्रधानमंत्री पद की दौड़ से अलग कर लिया था. उनका बयान उस हकीकत और उनकी प्रैक्टिकल सोच को बयां करने वाला था जिसकी अपेक्षा एक मंझे हुए राजनेता से ही की जा सकती है.

विपक्ष की बढ़ी परेशानी

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अब जबकि विपक्ष रामनाथ कोविंद के विरोध में एकजुट होने की कोशिश कर रहा है. तब उनकी तरफ से राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार के तौर पर कोविंद के साथ खड़े होने के फैसले ने विपक्षी नेताओं को परेशान कर दिया है.

सबसे बड़ी परेशानी बिहार में नीतीश के साथ सरकार चला रहे आरजेडी अध्यक्ष लालू यादव की है. लालू रामनाथ कोविंद के पक्ष में नहीं दिख रहे हैं. उधर, कांग्रेस को भी लग रहा है कि बीजेपी और संघ की पृष्ठभूमि के रामनाथ कोविंद के नाम का समर्थन करना उसके लिए मुश्किल होगा. लेफ्ट और ममता ने पहले ही विरोध का फैसला कर लिया है.

ऐसे में नीतीश के बगैर विपक्ष की लड़ाई महज खानापूर्ति बनकर ही रह जाएगी. मजबूत उम्मीदवार के तौर पर किसी को सामने लाने के बजाए महज विरोध के नाम पर ही विपक्ष की राजनीति लड़खड़ाती नजर आ रही है. नीतीश की गुगली ने लगता है विपक्ष को ‘गोल पोस्ट’ से ही भटका दिया है.

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