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राष्ट्रपति चुनाव 2017: जब रामनाथ कोविंद ने कहा था, ‘बाहरी हैं मुस्लिम और ईसाई’

रामनाथ कोविंद ने कहा था कि मुस्लिम और ईसाई समुदाय के दलितों को अनुसूचित जाति में शामिल करना असंवैधानिक है

FP Staff Updated On: Jun 20, 2017 04:18 PM IST

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राष्ट्रपति चुनाव 2017: जब रामनाथ कोविंद ने कहा था, ‘बाहरी हैं मुस्लिम और ईसाई’

सोमवार को बीजेपी की संसदीय दल की बैठक से पहले किसी को अनुमान नहीं था कि अमित शाह और नरेंद्र मोदी रामनाथ कोविंद को राष्ट्रपति का उम्मीदवार घोषित कर सकते हैं. रामनाथ कोविंद के नाम की घोषणा के बाद यह कहा जा रहा है कि बीजेपी ने एक दलित का नाम आगे करके सभी पार्टियों को चारो खाने चित कर दिया है.

रामनाथ कोविंद बिहार के राज्यपाल बनने से पहले बीजेपी के वरिष्ठ नेता और प्रवक्ता भी रह चुके हैं. 2009 में यूपीए सरकार गठित रंगनाथ मिश्रा कमीशन ने सरकारी नौकरियों में मुसलमानों को 10 फीसदी और अन्य धार्मिक अल्पसंख्यकों को 5 फीसदी आरक्षण देने की सिफारिश की थी.

इस समिति ने यह सिफारिश की थी मुसलमान और ईसाई बन गए दलितों को भी अनुसूचित जाति में शामिल किया जाना चाहिए. फिलहाल हिंदू, बौद्ध और सिख धर्म के दलितों को ही अनुसूचित जाति के आरक्षण का लाभ मिलता है. इस समिति की अध्यक्षता कर रहे रंगनाथ मिश्रा सुप्रीम कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायधीश थे.

क्या था कोविंद का तर्क?

बीजेपी अल्पसंख्यकों को धार्मिक आधार पर आरक्षण देने के हमेशा खिलाफ रही है. इस वजह से 2010 में वन इंडिया में छपी खबर के मुताबिक बतौर प्रवक्ता रामनाथ कोविंद ने रंगनाथ मिश्रा की सारी सिफारिशों को खारिज करने की मांग की थी. इसके लिए उन्होंने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में यह तर्क दिया था कि ईसाई और मुसलमान इस देश के लिए बाहरी हैं.

यह प्रेस कॉन्फ्रेंस मार्च 2010 में हुई थी. इसमें उन्होंने कहा कि ‘इस्लाम और क्रिश्चियनिटी भारत के लिए बाहरी धर्म हैं’ इस वजह से बीजेपी को यह लगता है कि इन अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों की सामाजिक-आर्थिक हालात काफी खराब होने के बावजूद नौकरियों, शिक्षा और चुनावों में आरक्षण नहीं दिया जाना चाहिए.

जब रामनाथ कोविंद से यह सवाल पूछा गया कि क्या धर्म परिवर्तन करके जो दलित मुस्लिम या ईसाई बन गए हैं क्या उन्हें अनुसूचित जाति के तहत शामिल करके आरक्षण नहीं दिया जा चाहिए?

मुसलमान और ईसाई दलितों के आरक्षण का भी किया था विरोध 

इस सवाल के जवाब ने कोविंद ने कहा कि ‘यह संभव नहीं है.’ उन्होंने यह भी कहा कि ‘मुस्लिम और ईसाई समुदाय के दलितों को अनुसूचित जाति में शामिल करना असंवैधानिक है.’ जब उनसे यह पूछा गया कि सिख दलितों को तो अनुसूचित जाति के तहत तो आरक्षण का लाभ मिलता है, तो इसके जवाब में उन्होंने कहा कि ‘ईसाई और मुसलमान बाहरी हैं.’

उन्होंने यह भी कहा कि जो भी दलित धर्म बदल करके ईसाई या मुसलमान बने हैं, ‘उन्हें बेहतर शिक्षा मिल रही है और वे कान्वेंट स्कूलों में पढ़ रहे हैं.’

उन्होंने यह भी कहा कि क्योंकि जो दलित मुसलमान या ईसाई बन गए हैं और उन्हें बेहतर शिक्षा मिल रही है. इस वजह से अनुसूचित जाति में शामिल करने से आरक्षण का अधिकतर लाभ ये दलित ही उठा लेंगे. इस वजह से धर्म परिवर्तन भी बढ़ेगा जो भारत के सामाजिक ताने-बाने के लिए नुकसानदेह होगा.’

अब चूंकि रामनाथ कोविंद को एक दलित चेहरे के बतौर पेश किया जा रहा है. यह बहुत ही संभव है कि देश के अगले राष्ट्रपति वे ही बने. अब देखना यह है कि क्या राष्ट्रपति जैसे संवैधानिक पद पर चुने जाने के बाद धार्मिक अल्पसंख्यकों के बारे में उनकी क्या राय होती है. खासकर ईसाई और मुस्लिम दलितों के बारे में उनके नजरिए में कोपी बदलाव होता है या नहीं.

देश के राष्ट्रपति से यह उम्मीद की जाती है कि वे धर्मनिरपेक्ष तरीके से सभी समुदायों के लिए काम करें. ऐसी स्थिति में यह देखना दिलचस्प होगा कि अब वे अपने इन पुराने बयानों के बारे में क्या सोचते हैं.

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