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बिहार: प्रशांत किशोर राजनीति की 'ओवररेटेड' शख्सियत बन गए हैं

प्रशांत किशोर शांत हैं, मीडिया से ज्यादा इंटरैक्ट नहीं करते, गंभीरता ओढ़े रहते हैं. उसी तरह एक बात ये भी कह सकते हैं कि मौजूदा दौर में पीके राजनीति के ओवररेटेड शख्सियत बन गए हैं

Updated On: Sep 18, 2018 07:18 AM IST

Vivek Anand Vivek Anand
सीनियर न्यूज एडिटर, फ़र्स्टपोस्ट हिंदी

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बिहार: प्रशांत किशोर राजनीति की 'ओवररेटेड' शख्सियत बन गए हैं

बिहार में पीके नाम की धूम है. पीके यानी प्रशांत किशोर. मौजूदा दौर के सबसे मशहूर चाणक्य का तमगा हासिल किए प्रशांत किशोर का बिहार की राजनीति में भविष्य कैसा होगा? जेडीयू के दिन बदलने वाले हैं या प्रशांत किशोर के? एक सफल राजनीतिक रणनीतिकार क्या एक कामयाब राजनेता हो सकता है? पीआर एजेंसी के मालिक से पब्लिक फीगर बन जाने का रिस्क कैसा होगा? ऐसे कई सवाल हवा तैर रहे हैं.

एक बात कही जा रही है कि प्रशांत किशोर जेडीयू में नीतीश कुमार के बाद नंबर टू होंगे. उन्हें नीतीश कुमार का उत्तराधिकारी घोषित किया जा रहा है. जबकि जेडीयू के लीडर्स इस बात से इनकार करते हैं. जेडीयू के नेता कहते हैं कि प्रशांत किशोर की पार्टी में भूमिका अभी तय की जानी है. इस बारे में कोई भी फैसला बिहार के सीएम और पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नीतीश कुमार ही लेंगे. अभी तक इस पर फैसला नहीं लिया गया है.

एक और बड़ी बात कही जा रही है कि बीजेपी और जेडीयू के बीच सीटों का बंटवारा करीब-करीब फाइनल है. जेडीयू के सूत्रों के मुताबिक दोनों पार्टियों के बीच दो राउंड की मीटिंग हो चुकी है. और इन दो राउंड की मीटिंग के बाद सीट बंटवारा करीब-करीब तय है. इसलिए जिस वक्त नीतीश कुमार ने अपनी पार्टी में प्रशांत किशोर का स्वागत करते हैं, उसी वक्त पूरे आत्मविश्वास के साथ ये भी कहते हैं कि बीजेपी-जेडीयू के बीच सीट बंटवारे को लेकर बात पक्की हो चुकी है और समय आने पर इसकी जानकारी मीडिया को दी जाएगी.

सीट बंटवारे का मुद्दा पेचीदा है. इसलिए सीएम ने अपने तमाम नेताओं को इस बारे में संभलकर बोलने की ताकीद की है. प्रवक्ताओं को इस बारे में कुछ भी बोलने से परहेज रखने को कहा गया है.

सीट बंटवारा बड़ा मसला है. हालांकि जिस कॉन्फिडेंस से नीतीश कुमार सीट बंटवारे के मसले को सुलझा लिए जाने का दावा कर रहे हैं, उसमें एनडीए की साझीदार पार्टी आरएलएसपी और एलजेपी की हिस्सेदारी पर संकट के बादल घिरे नजर आ रहे हैं. इस आत्मविश्वास से शायद आरएलएसपी के उपेन्द्र कुशवाहा कुछ सोचने पर मजबूर हो जाएं.

उपेन्द्र कुशवाहा पिछले दिनों सीटों को लेकर प्रेशर बनाए हुए थे. आरएलएसपी को जेडीयू से बड़ी पार्टी बताए जाने से लेकर वो 2020 के लिए नीतीश कुमार को सीएम पद की दावेदारी से पीछे हट जाने की सलाह दे चुके हैं. खीर वाले बयान से भी उन्होंने सनसनी फैलाई थी. ऐसा लग रहा है कि उनकी सियासी खीर तो पक गई लेकिन जेडीयू के सामने राजनीति की दाल नहीं गलने वाली है. साथ ही जिस तरह की खामोशी एलजेपी और उसके मुखिया रामविलास पासवान ने ओढ़ रखी है वो किसी राजनीतिक अनहोनी की आशंका भी दे रहे हैं. सवाल है कि इन दो पार्टियों के नाराज होने की स्थिति में एनडीए में बिखराव की स्थिति को क्या पीके रोक पाएंगे?

NITISH-PASWAN

बताया जा रहा है कि बीजेपी-जेडीयू के बीच सीट बंटवारे को लेकर पीके ने बड़ा काम किया है. और आने वाले वक्त में भी वो दोनों पार्टियों के बीच पुल का काम कर सकते हैं. वैसे गौर करने वाली बात है कि पीके को जिन दो बड़े चुनावी जीत के लिए याद किया जाता है. उसमें पहला है- 2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी के लिए कैंपेनिंग और दूसरा है- 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव में महागठबंधन के लिए चुनावी रणनीति बनाने का.

इन दोनों में पीके जिस पार्टी के पक्ष में रहे उसे अपार सफलता मिली. लेकिन क्या 2014 में कांग्रेस के भ्रष्टाचार के खिलाफ और विकास की नई मोदी लहर के पक्ष में बना माहौल और फिर 2015 में बिहार में लालू और नीतीश के एकसाथ आने से बना चुनावी गठजोड़, इन दो बड़ी जीतों का आधार नहीं बना कि इसका क्रेडिट पीके को दे दिया जाए? अगर ऐसी ही रणनीति थी तो यूपी में कांग्रेस को जिंदा क्यों नहीं कर पाए पीके? 2017 के यूपी के विधानसभा चुनाव में पीके कांग्रेस के रणनीतिकार थे. रिजल्ट सबको पता है. प्रशांत किशोर शांत हैं, मीडिया से ज्यादा इंटरैक्ट नहीं करते, गंभीरता ओढ़े रहते हैं. उसी तरह एक बात ये भी कह सकते हैं कि मौजूदा दौर में पीके राजनीति के ओवररेटेड शख्सियत बन गए हैं.

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