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संघ के मंच पर प्रणब मुखर्जी: राजनीतिक करियर की चिंता में बेहतरीन मौका गंवा गए पूर्व राष्ट्रपति

प्रणब मुखर्जी ने जिस तरह से इस अवसर पर खुद को अति सावधान और चौकन्ना दिखाया वो हमें सिर्फ़ एक ‘करियर-पॉलिटीशियन’ के लक्षणों की याद दिलाता है

Ajay Singh Ajay Singh Updated On: Jun 09, 2018 01:03 PM IST

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संघ के मंच पर प्रणब मुखर्जी: राजनीतिक करियर की चिंता में बेहतरीन मौका गंवा गए पूर्व राष्ट्रपति

भारत के पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी जब गुरुवार 7 जून को राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के मुख्यालय में आयोजित कार्यक्रम में शामिल होने के लिए मंच पर पहुंचे तब मुझे इस बात की पूरी उम्मीद थी कि वे ब्रिटिश इतिहासकार एजीपी टेलर के उस कथन को सच साबित कर देंगें जिसमें टेलर ने कहा था, ‘एक राजनेता मंच के ऊपर या मंच पर जाकर प्रदर्शन करता है, लेकिन एक इतिहासकार मंच के सजे दृश्यों के भुलावे में नहीं आता है और उसमें छिपे गहन अर्थों को समझने की कोशिश करता है.’

चूंकि, ऐसा नहीं होना था तो नहीं हुआ. मुखर्जी जो कि अपने शुरुआती दिनों में एक स्कूल टीचर रह चुके हैं, अगर चाहते तो बड़ी ही आसानी से इस मौके पर एक राजनीतिज्ञ के साथ-साथ, इतिहासकार की भूमिका भी अच्छे तरीके से निभा सकते थे.

प्रणब मुखर्जी के पास था ऐतिहासिक मौका

एक राजनेता के तौर पर प्रणब मुखर्जी की एक बेहद विशिष्ट पहचान बनी हुई है, जो उनके बेहद उम्दा राजनीतिक जीवन की सफलताओं के कारण ही उन्हें हासिल है, अपने राजनीतिक करियर में प्रणब मुखर्जी सफलता के शिखर तक पहुंचे हैं, अगर वे चाहते तो इस ऐतिसाहिक मौके पर न सिर्फ मंच पर छा जाते बल्कि एक यादगार संबोधन भी देते, जो उनके लिए ज़रा भी मुश्किल नहीं था.

प्रणब मुखर्जी के पास पांच दशक से भी ज्यादा का राजनीतिक अनुभव है और इन 50 सालों में देश की राजनीतिक और सामाजिक पेचीदगियों को जिस तरह से उन्होंने जाना-समझा है, उनकी जो सोच विकसित हुई है....उसको ध्यान में रखते हुए हम ये पूरे विश्वास के साथ कह सकते हैं कि अगर डॉ. मुखर्जी चाहते तो आरएसएस के इस सघन तीन साल के कार्यकम (जिसे ऑफिसर्स ट्रेनिंग कैंप-ओटीसी) का पासिंग आउट परेड भी कहा जाता है और जिसके प्रतिबद्ध सैनिकों के आगे चलकर आरएसएस के कर्तव्यनिष्ठ सदस्य बनने की पूरी उम्मीद है, वहां प्रणब मुखर्जी के भाषण का एक बिल्कुल ही अलग मतलब निकलकर सामने आना चाहिए था.

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ठीक उसी तरह से समकालीन राजनीति और इतिहास को लेकर उनकी जो अध्ययनशील और विद्वतापूर्ण समझदारी है, वो राजनीति के माहिर उन खिलाड़ियों को जरूर चौकन्ना करने का काम करता जो अपना मतलब साधने के लिए देश को तोड़ने और और बांटने वाली राजनीति कर रहे हैं.

सावधान और चौकन्ने नजर आए पूर्व राष्ट्रपति

लेकिन हमें ये अफसोस के साथ कहना पड़ रहा है कि मुखर्जी दोनों ही भूमिका में बुरी तरह से फेल हुए हैं. एक राजनेता के तौर पर वे न सिर्फ बहुत ही ज्यादा सावधान नज़र आए बल्कि अपने आसपास के माहौल के कारण चौकन्ने भी. उन्होंने जो कुछ भी वहां कहा..बस वही कहा. यानी उनकी बातों में कुछ भी ऐसा नहीं था जिसपर बाद में विचार-विमर्श किया जा सके या किसी तरह का चिंतन.

हमें उनके राजनीतिक करियर के रिकॉर्ड पर भी एक नज़र डालना चाहिए, जिसे देखकर हम ये आसानी से समझ सकते हैं कि संघ के इस कार्यक्रम में उनका भाषण या यूं कहे कि प्रदर्शन अस्पष्ट क्यों था. क्यों उनका भाषण संघ प्रमुख मोहन भागवत के भाषण का दोहराव या पुनरावृत्ति भर बन के रह गया, जिसमें भारत के सम्मलित स्वभाव और सबको साथ लेकर चलने की सोच के बारे में कहा गया. कांग्रेस पार्टी के नेता के रूप में मुखर्जी हमेशा से बीजेपी-आरएसएस पर हमला करने वाले सबसे मुखर नेताओं के रूप में जाने जाते रहे हैं, उन्होंने ऐसे कई प्रस्तावों का गठन किया था जिनमें हिंदुत्ववादी ताकतों को भारत की अखंडता का विरोधी बताया गया.

 

राजनीतिक तौर पर नपा-तुला था उनका संबोधन

हालांकि, इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता है कि अपने पांच साल के राष्ट्रपति के कार्यकाल के दौरान जब उनकी आरएसएस और बीजेपी के नेताओं के साथ नज़दीकियां बढ़ी होंगी और उनमें बेहतर संवाद हुआ हो तब उनके मन के पूर्वाग्रह खत्म या कम हुए हों. इन सालों में उनकी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ भी एक नज़दीकी का रिश्ता बना है, ये जानते हुए भी कि मोदी की पहचान एक आरएसएस प्रचारक के तौर पर कितनी असरदार है. अगर मुखर्जी का हृदयपरिवर्तन हो चुका है तो उन्हें अपनी मन की इस बात को यहां मंच से न सिर्फ़ स्वीकार करना चाहिए बल्कि इसके कारण भी बताने चाहिए थे. लेकिन इसके विपरीत उनका भाषण न सिर्फ निरर्थक था बल्कि राजनीतिक तौर पर नपा-तुला था ताकि न वे किसी को नाराज़ करें न किसी के गुस्से का शिकार हों, जिस कारण उनके भाषण की कोई गुणवत्ता ही नहीं रह गई.

मुख़र्जी उन चंद नेताओं में से एक हैं जिन्होंने इस देश में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विकास के साथ-साथ भारतीय जनसंघ का जन्म और बाद में उसी से बीजेपी के निर्माण के गवाह रहे हैं. उन्होंने देखा है कि कैसे एक छोटे से राजनीतिक-सांस्कृतिक दल से बीजेपी आज इस देश की सबसे बड़ी राजनीतिक ताक़त बनकर खड़ी हुई है. ऐसे में उनसे ये स्वाभाविक उम्मीद थी कि वे बीजेपी-संघ की इस देशव्यापी राजनीतिक यात्रा और उसकी भारतीय संविधान के साथ जो अनुकूलता है उस पर अपने विचार रखते.

खुद को आलोचना से बचा गए प्रणब दा

प्रणब मुखर्जी ने एक नेता के तौर पर इस देश में वो सब कुछ हासिल कर लिया है जो किसी भी राजनेता को जीते-जी आज तक हासिल नहीं हुआ है. उनका राजनीतिक जीवन किसी कल्पना की उड़ान से कम नहीं है. इस देश में आज कोई भी नेता ऐसा नहीं है जो प्रणब मुखर्जी की तरह समर्थ हो और उनके कद की किसी भी मायने में बराबरी कर सके. अपनी इस योग्यता का इस्तेमाल अगर पूर्व राष्ट्रपति चाहते तो संघ के नेतृत्व और काडर के सामने एक राष्ट्र के तौर पर भारत की व्याख्या करने में लगा सकते थे, जो उनके हिसाब से एक राष्ट्र के तौर पर स्थापित और स्वीकृत व्याख्या से अलग है. लेकिन मुखर्जी ने इस मौके का इस्तेमाल बहुत ही सावधानी-पूर्वक कदम बढ़ाने के लिए किया और किसी भी तरह का विवादित बयान देने से बचते रहे, ताकि वे खुद को किसी भी तरह की आलोचना का शिकार होने से बचा लें.

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इतना ही नहीं एक इतिहासकार के तौर पर भी उनका प्रदर्शन बेहद निराशाजनक रहा, क्योंकि जिस तरह से उन्होंने बड़े ही लापरवाह तरीके से इतिहास की चर्चा की और उन सैद्धातिंक बिंदुओं को बिल्कुल ही छोड़ गए जिनपर उत्तेजना या विवाद हो सकता था. उदाहरण के तौर पर जब वे आज़ादी के बाद के समय की बात कर रहे थे, तब जिस तरह से उन्होंने महात्मा गांधी की हत्या का ज़िक्र तक नहीं किया वो साफ़-साफ़ नज़र आ रहा था. जबकि, मौजूदा कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी बार-बार इस महात्मा गांधी की हत्या का दोष संघ पर देते आए हैं. मुखर्जी अगर चाहते तो एक अनुभवी विद्वान नेता के तौर पर इस मुद्दे पर एक बहस शुरू कर सकते थे. वे चाहते तो एक ऐसे विचार के अस्तित्व पर बात कर सकते थे, जिसका कोई धार्मिक आधार नहीं है और वो सिर्फ़ हिंसा और नफ़रत को बढ़ावा देता है.

क्या-क्या कह सकते थे?

इसी के साथ वे इमरजेंसी की कमियों की भी चर्चा कर सकते थे ताकि मौजूदा नेतृत्व को सत्तावाद और तानाशाही के खतरों से अवगत करा सकते. एक वयोवृद्ध राजनीतिज्ञ के तौर पर वे चाहते तो ये बता सकते थे कि कैसे धार्मिक कट्टरता, राजनीतिक लामबंदी का सबसे निकृष्ट हथियार है, जिसकी वजह से बाबरी मस्जिद का विध्वंस हुआ और देशभर में दंगे हुए. संघ मुख्यालय का वो मंच पूर्व राष्ट्रपति मुखर्जी को मिला हुआ वो सबसे बेहतरीन अवसर था जहां से वे उन बातों को बिना लाग-लपेट के पूरे देश तक पहुंचा सकते थे, जिसके लिए वे जाने जाते हैं और हिंदूत्वादी विचारधारा को लेकर उनके अपने मन में शंकाएं हैं उसे भी.

अगर प्रणब मुखर्जी इस मौके पर सरदार पटेल और आरएसएस के दूसरे सरसंघचालक एमएस गोलवालकर के बीच हुए पत्राचार को याद कर पाते, या फिर जवाहरलाल नेहरु और भारतीय जनसंघ के संस्थापक श्यामा प्रसाद मुखर्जी के बीच हुए पत्र-व्यवहार को याद कर पाते, तो वे इस बात को भी समझ पाते कि कड़वी से कड़वी मतभिन्नता के बावजूद दो पक्ष कैसे एक दूसरे के साथ संयमित और शिष्ट विचार-विमर्श कर सकते हैं...किसी की भी भावनाओं को आहत किए बग़ैर.

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मुखर्जी चाहते तो वे सरदार पटेल की नेहरु को लिखी चिट्ठी के उस पन्ने को दोबारा पढ़ सकते थे जिसमें पटेल ने आरएसएस को लेकर अपने विचार नेहरु के सामने रखे हैं. पटेल ने तब अपनी चिट्ठी में नेहरु के सामने संघ द्वारा राष्ट्र निर्माण के लिए किए जा रहे संघ के कामकाज और कोशिशों की तारीफ़ की थी, लेकिन साथ ही उनके विध्वंसकारी नीतियों और प्रवृत्ति की आलोचना भी की थी.

राजनीतिक संवाद को समृद्ध कर सकते थे प्रणब मुखर्जी

मुखर्जी जैसे बड़े और दृढ़ राजनेता जिन्होंने अपना पूरा जीवन, विभिन्न पदों पर रहकर देश की सेवा में लगा दिया, अगर वे इस समय पर अपने मन की बात को खुलकर कहते तो देश में चल रहे राजनीतिक संवाद को और समृद्ध करते तो कोई भी ऐसा शख़्स या संस्था नहीं होती जो उनकी आलोचना करती. लेकिन, उन्होंने तय तौर पर खुद को मिले इस मौके को गंवा दिया.

इसके विपरीत, मुखर्जी के ही समकालीन रहे लालकृष्ण आडवाणी, जिनकी ट्रेनिंग आरएसएस की थी, वे ऐसे मुद्दों पर ज़्यादा मुखर रहे. आडवाणी ने पाकिस्तान को जिन्ना की धर्मनिरपेक्ष सोच और दृष्टि की न सिर्फ उन्हें उनके ही देश में जाकर याद दिलाई बल्कि इसके लिए उन्हें एक बड़ी कीमत भी चुकानी पड़ी. उनकी राजनीतिक निडरता के कारण उन्हें संघ की विचारधारा के खिलाफ़ मान लिया गया और उन्हें राजनीतिक तौर पर हिंदुत्वादी राजनीति के मंच से बेदखल कर हाशिए पर डाल दिया गया.

लेकिन मुखर्जी के सामने ऐसा भी कोई संकट नहीं था, वे एक तरह से अपनी राजनीतिक पारी खेल चुके हैं और रिटायरमेंट की तरफ बढ़ रहे हैं. उनके सामने भविष्य की चिंता नहीं है, लेकिन इसके बावजूद उन्होंने जिस तरह से इस अवसर पर खुद को अति सावधान और चौकन्ना दिखाया वो हमें सिर्फ़ एक ‘करियर-पॉलिटीशियन’ के लक्षणों की याद दिलाता है, एक ऐसा नेता जिसकी प्राथमिकता हर किसी को खुश करने में हैं ताकि उसे किसी न किसी राजनीतिक पद को हासिल करने में परेशानी का सामना न करना पड़े.

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