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RSS के कार्यक्रम में प्रणब मुखर्जी: क्या संघ से संवाद संभव है?

प्रणब मुखर्जी का आरएसएस मुख्यालय में भाषण के लिए जाना भारतीय लोकतंत्र के लिए एक शुभ संकेत है. लेकिन सवाल यह है कि क्या संघ वाकई विरोधी वैचारिक समूहों के साथ संवाद चाहता है?

Rakesh Kayasth Rakesh Kayasth Updated On: Jun 11, 2018 01:13 PM IST

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RSS के कार्यक्रम में प्रणब मुखर्जी: क्या संघ से संवाद संभव है?

भाषण खत्म टीआरपी हजम. नेशनल मीडिया पर प्रणब मुखर्जी प्रकरण की पूर्णाहुति कुछ वैसी ही हुई जैसी इस तरह के किसी इवेंट की हो सकती है. देश के सबसे बड़े सांवैधानिक पद पर रह चुके मुखर्जी भारत के सबसे ताकतवर संगठन आरएसएस के मुख्यालय गए. हाल के दिनों में दो विपरीत विचारधाराओं के एक मंच पर आने का यह सबसे बड़ा मौका था. कांग्रेस ने इसे गहरे संशय से देखा, बीजेपी ने इसे अपनी जीत माना लेकिन मीडिया के लिए यह एक ऐसी घटना थी, जिसमें रियलिटी शो वाला टेंशन था.

आखिर मुखर्जी क्या बोलेंगे? टेंशन कई दिन तक बिल्ड किया गया. भाषण पूरा होते ही मेनस्ट्रीम मीडिया का काम खत्म हो गया. लेकिन सोशल मीडिया पर हलचल अब भी जारी है. जीत और हार के दावे चल रहे हैं और साथ-साथ ध्वज प्रणाम करते हुए प्रणब मुखर्जी की फोटोशॉप की गई फर्जी तस्वीर भी खूब शेयर की जा रही है.

प्रणब मुखर्जी का संघ के मुख्यालय में भाषण देना अपने आप में एक बहुत बड़ी घटना थी. ऐसा नहीं है कि कांग्रेस या आरएसएस विरोधी पृष्ठभूमि वाले किसी व्यक्ति ने पहली बार संघ के कार्यक्रम में शिरकत की हो. लेकिन मुखर्जी का कार्यक्रम एक ऐसे दौर में हुआ जब लोक जीवन में परस्पर विरोधी विचारधारा वालों के बीच संवाद के पुल लगातार टूट रहे हैं. सार्वजनिक विमर्श का स्तर तेजी से गिर रहा है और मीडिया (मेनस्ट्रीम और सोशल) गंभीर से गंभीर बहस को सिर्फ शोर में बदल रहा है.

ऐसे में एक गरिमामय कार्यक्रम के लिए सरसंघचालक मोहन भागवत और पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी दोनो बधाई के पात्र हैं. सामान्य शिष्टाचार का दोनों पक्षों ने भरपूर ध्यान रखा लेकिन बातें वही कहीं जो उन्हे कहनी थी. मुखर्जी ने संघ के संस्थापक डॉक्टर हेडगेवार को श्रद्धांजलि देते हुए विजिटर बुक में उन्हें भारत माता का सच्चा सपूत बताया लेकिन भाषण में हेडगेवार या आरएसएस का कोई जिक्र नहीं किया. मोहन भागवत ने एक बार हिंदू राष्ट्र शब्द का इस्तेमाल ज़रूर किया लेकिन उन्होंने इस बात का ध्यान रखा कि ऐसी कोई और बात ना कही जाए जिससे पूर्व राष्ट्रपति असहज महसूस करें. इस हिसाब से कार्यक्रम की सराहना की जानी चाहिए. लेकिन अब इससे आगे की बात. क्या इस कार्यक्रम के बाद अब आरएसएस और बाकी विरोधी विचारधाराओं के बीच संवाद का सिलसिला आगे बढ़ पाएगा?

संवाद नहीं वैधता संघ की ज़रूरत

संघ की कांग्रेसी, समाजवादी और साम्यवादी विचारधारा के लोगों से बहुत पुरानी शिकायत रही है कि हमें `अछूत’ समझा जाता है. कांग्रेस के कुछ नेताओं ने जब प्रणब मुखर्जी के कार्यक्रम पर सवाल उठाए तब बीजेपी ने उन्हे लोकतंत्र विरोधी करार देते हुए यह इल्जाम लगाया कि वे संवाद में आस्था नहीं रखते. लेकिन सवाल यह है कि क्या संघ विरोधी विचारधाराओं के साथ सचमुच संवाद चाहता है?

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इसका सीधा जवाब है- नहीं. कारण बहुत स्पष्ट है. संवाद की बुनियाद तर्क है और संघ मूलत: तर्क विरोधी है. वह इतिहास और माइथोलॉजी को एक मानता है. आस्था उसके लिए सर्वोपरि है. उसे तर्कशील लोगों की नहीं बल्कि अनुयायियों की ज़रूरत है, जो प्रचारकों के रात-दिन के श्रम की बदौलत पिछले 90 साल में लगातार बढ़े हैं.

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संघ प्रमुख मोहन भागवत के साथ प्रणब मुखर्जी

लिखित इतिहास के बदले संघ के अनुयायी इसे श्रुतियों के माध्यम से जानते हैं. उसके अपने नेताओं की बातें भी अंतर्विरोधों से भरी हुई है. संघ से जुड़े लोग कभी यह नहीं कहते कि हमें समझने के लिए गुरू गोलवलकर की किताबें पढ़िए. वे कहते हैं कि हमारी शाखाओं में आइए. प्रणब मुखर्जी के कार्यक्रम के दौरान मोहन भागवत ने भी यही कहा. उन्होने सभी लोगो को आने का न्यौता दिया. उन्होंने कहा- आइए हमें देखिये अगर ठीक लगे तो हमारी विचारधारा को अपनाइए.

जाहिर है, संघ के लिए परस्पर विरोधी विचारधाराओं से संवाद का कोई मतलब नहीं है. लेकिन उसे बड़े सामाजिक समूह और खासकर पढ़े-लिखे लोगों के बीच वैधता जरूर चाहिए. अगर ए. पी.जे. अब्दुल कलाम या प्रणब मुखर्जी जैसी शख्सियतें संघ के कार्यक्रम में शामिल होती हैं तो उसके लिए यह कहने का आधार तैयार होता है कि विरोधी लोग भी हमारी बातों से प्रभावित हैं. महात्मा गांधी को लेकर भी संघ कुछ ऐसा ही दावा करता है, यह अलग बात है कि आरएसएस को लेकर गांधी के वास्तविक विचार हमेशा छिपाये जाते हैं.

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सवाल पूछा जा सकता है कि संघ अगर अपने लिये वैधता चाहता है, तो इसमें गलत क्या है? गलत कुछ भी नहीं है. सामाजिक और राजनीतिक उद्देश्यों के लिए काम करने वाला हर संगठन वैधता चाहता है. लेकिन विरोधियों के बीच वैधता हासिल करने का रास्ता इतना आसान नहीं है. इस प्रक्रिया में संघ को उनकी बात भी सुननी पड़ेगी और अपने बारे में उठने वाले सवालों के जवाब भी देने पड़ेंगे. प्रणब मुखर्जी के कार्यक्रम में भी यही हुआ.

प्रणब मुखर्जी के भाषण पर संघ का जवाब?

ऐसा बहुत समय बाद हुआ जब किसी बहुत बड़े फोरम से देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू का नाम लिया गया हो. प्रणब मुखर्जी ने नेहरू का नाम ही नहीं लिया बल्कि उनकी किताब डिस्कवरी ऑफ इंडिया का हवाला देते हुए राष्ट्रवाद पर नेहरू के विचारों को उठाकर ज्यों का त्यों रख दिया. नेहरू के विचारों का महिमामंडन उस संगठन के मंच से हुआ जो इस देश की तमाम समस्याओं के लिए उन्हें जिम्मेदार मानता है. लंबे समय तक संघ के प्रचारक रहे प्रधानमंत्री मोदी भी चुनावी रैलियों में नेहरू की आलोचना करना नहीं भूलते.

सवाल यह है कि नेहरू के राष्ट्रवाद से अपने राष्ट्रवाद को संघ किस तरह अलग मानता है? अगर अलग मानता है तो इसका तार्किक आधार क्या है? इस तरह के बहस में पड़ने के बदले संघ से जुड़े लोग लगातार चरित्रहनन का व्यवस्थित कैंपेन चलाने में यकीन रखते हैं. सवाल यह भी है कि बहुलतावाद को देश की आत्मा बताए जाने वाले प्रणब मुखर्जी के भाषण पर संघ क्या कहेगा? संघ के राष्ट्रवाद की परिभाषा में तो बार-बार एक राष्ट्र और एक पहचान की बात की जाती है. अगर संघ केवल यह कहता है कि मतभेद हो सकता है, लेकिन मनभेद नहीं होना चाहिए तो क्या इसे काफी माना जाएगा? इसका मतलब यही होगा कि संवाद का दावा निर्रथक है और उदेश्य सिर्फ प्रतिष्ठित लोगो को मंच पर बुलाकर वैधता हासिल करना है.

Nagpur: Former president Pranab Mukherjee with Rashtriya Swayamsevak Sangh (RSS) chief Mohan Bhagwat at the birthplace of RSS founder Keshav Baliram Hedgewar, in Nagpur, Maharashtra on Thursday, June 07, 2018. (PTI Photo)(PTI6_7_2018_000237B)

संघ के कार्यक्रम में हिस्सा लेने जाते हुए पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी, साथ में संघ प्रमुख मोहन भागवत

प्रणब मुखर्जी ने समाज में बढ़ती हिंसा पर गहरी चिंता जताई. उनका इशारा बहुत साफ था. पिछले चार साल में गोरक्षा जैसे कार्यक्रमों के नाम पर कुछ खास समुदायों के लोगो पर सुनियोजित हमले बढ़े हैं. गोरक्षा संघ के सबसे पसंदीदा कार्यक्रमों में एक है. गोरक्षा के ज़ोर पकड़ने के बाद बढ़ी हिंसा और ग्रामीण अर्थव्यस्था पर इसके प्रभाव पर संघ का स्टैंड क्या है? संघ कार्यशैली से परिचित लोग जानते हैं कि किसी तरह के स्पष्टीकरण की कोई ज़रूरत है भी नहीं. प्रचारक, समर्थक और अनुयायियों के मन में अपने संगठन की विचारधारा को लेकर किसी तरह का कोई संशय नहीं है.

सवाल यह है कि अनुयायियों और समर्थकों के विशाल समूह के होते हुए संघ को ऐसे लोगो का अनुमोदन क्यों चाहिए जो मूलत: उसके विरोधी माने जाते हैं? वजह बहुत साफ है, आरएसएस कुछ ऐसे ढर्रे पर चलने वाला संगठन है कि उसके साथ पढ़े लिखे लोगों या ओपनियन मेकर्स के बहुत बड़े तबके का जुड़ पाना संभव नहीं है.

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नब्बे के दशक के बाद बीजेपी ने अपनी एक लिबरल छवि पेश करने की कोशिश की और इसका सकारात्मक असर संघ की इमेज पर भी पड़ा. उस दौर में संघ ने बहुत से राजनीतिक मामलों में अपनी जानी-पहचानी लाइन छोड़ दी और राममंदिर जैसे मामलों पर लगभग चुप हो गया. वह गठबंधन की सरकारों का दौर था. लेकिन 2014 में प्रचंड बहुमत से मोदी सरकार के बनने के बाद आरएसएस को लगा कि अपना एजेंडा लागू करवाने का इससे बेहतर मौका उसके पास नहीं है, इसलिए उससे जुड़े अलग-अलग संगठन बहुत से मामलों को लेकर मुखर हो गए.

अब ऐसा माना जा रहा है कि 2019 में बीजेपी को एक बार फिर गठबंधन साझीदारों की ज़रूरत पड़ सकती है. हवा का रुख भांपने में माहिर आरएसएस नई परिस्थितियों के हिसाब से भी उदारवादी चेहरा ओढ़ सकता है. प्रणब मुखर्जी के कार्यक्रम में सरसंघचालक मोहन भागवत के भाषण का एक मतलब यह भी निकाला जा रहा है.

मोहन भागवत के बयान के मायने

अपने भाषण में भागवत ने भारतीय समाज की विविधता की बात की. विविधता संघ की बहुअर्थीय संवाद शैली का एक हिस्सा है, जिसका इस्तेमाल हमेशा नहीं किया जाता है. 'सभी भारतीय हिंदू हैं’ संघ की स्टैंडर्ड लाइन रही है. लेकिन मोहन भागवत ने प्रणब मुखर्जी की मौजूदगी में यह कहा कि भारत में पैदा हुए सभी लोग भारतीय हैं. बीजेपी नेतृत्व वाली किसी भावी सरकार के लिए गठबंधन साझीदारों की स्वीकार्यता हासिल करना ऐसे बयानों का मकसद हो तो इसमें कोई ताज्जुब नहीं.

वैसे संघ के वैचारिक विरोधी चाहे कुछ भी कहें लेकिन इस संगठन से जुड़े लोगों की राजनीतिक दूरंदेशी की हर किसी को दाद देनी पड़ेगी. समाज और राजनीति को लेकर समझ कितनी साफ है, यह मोहन भागवत की उस बात से स्पष्ट हो जाता है, जो उन्होंने प्रणब मुखर्जी के सामने दिए गए अपने भाषण में कहा था. भागवत का कहना था कि बौद्धिक या विचारक लोगों की बातों का समाज पर कोई बहुत ज्यादा असर नहीं पड़ता है. समाज के आम लोग अपने से थोड़ा बेहतर लोगों की तरफ देखते हैं और उन्हीं की बातों का अनुकरण करते हैं. संघ ने बरसों-बरस तक ऐसे ही लोग तैयार किए हैं, जो समाज के निचले तबके के लोगों को प्रभावित कर सकें. वैचारिक और रणनीतिक रूप से कुंद पड़ चुकी कांग्रेस आरएसएस की इस रणनीति से कुछ सीख पाएगी, इस बात में शक है.

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