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मजबूत पीएम की नेकनीयती और इमोशनल अत्याचार

संसद में जो सवाल उठाए गए, सरकार उनका स्पष्ट जवाब नहीं दे रही है

Updated On: Nov 24, 2016 12:11 PM IST

Krishna Kant

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मजबूत पीएम की नेकनीयती और इमोशनल अत्याचार

नक्सल समस्या या कश्मीर में आतंकवाद की समस्या से निपटने के लिए कोई प्रशासक अगर परमाणु विकल्प का इस्तेमाल करना चाहे तो बेशक यह बहुत साहसिक और कड़ा फैसला है. लेकिन क्या ऐसे विकल्पों की उपादेयता पर विचार नहीं किया जाएगा? क्या इससे होने वाली तबाही पर बात नहीं होगी? क्या हम इस फैसले की सिर्फ इसलिए तारीफ करेंगे कि यह कड़ा फैसला है और आतंकवाद मिटाने की अच्छी नीयत से लिया गया है?

भाजपा संसदीय दल की बैठक में मंगलवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एक बार फिर से भावुक हो गए. उन्होंने अपने फैसले को सही ठहराने के लिए फिर से गरीबों और मजदूरों का हवाला देते हुए कहा कि ये 'अनिवार्य' है. यह समझ से परे है कि प्रधानमंत्री आर्थिक सुधार के सिलसिले में लिए गए एक राजनीतिक फैसले को लेकर बार-बार भावुक क्यों हो जा रहे हैं!

Prime Minister Narendra Modi, Home Minister Rajnath Singh, Union I&B Minister Venkaiah Naidu and senior leader L K Advani during BJP parliamentary party meeting in New Delhi on Tuesday. भाजपा संसदीय दल की बैठक के दौरान वरिष्ठ पार्टी नेताओं के साथ्‍ा प्रधानमंत्री मोदी. (पीटीआई)

अभी तक किसी विपक्षी दल या नेता ने यह नहीं कहा है कि वह कालाधान या भ्रष्टाचार का समर्थन कर रहा है. लेकिन नोटबंदी पर बगैर पुख्ता तैयारी के बरती गई हड़बड़ी और जनता को हो रही परेशानियों को लेकर जितने सवाल संसद में उठाए गए, प्रधानमंत्री उनका स्पष्ट जवाब नहीं दे रहे हैं.

प्रधानमंत्री जो कर रहे हैं, यह वही तो है जो पिछले 70 सालों में होता रहा है और जिसे वे लगातार कोसते हैं. कॉरपोरेट को अभयदान देते जाना और उसे गरीबों को समर्पित करते जाना आम आदमी को गाली देने सरीखा है. इसका सिलसिला इंदिरा गांधी के ही समय से चल रहा है. मोदी जी खुद कह रहे थे कि 'मनमोहन सिंह ने बाजारवाद को ठीक से लागू नहीं किया, हम इसे ठीक से लागू करेंगे.' मनमोहन सिंह ने कॉरपोरेट जगत के लिए सरकारी खजाना खोल दिया था, मोदी जी उसे दोनों हाथों से दलाल स्ट्रीट में लुटा रहे हैं. उसमें बहुसंख्यक गरीबों के लिए कुछ नहीं है, कॉरपोरेट और अमीरों के लिए सबकुछ है.

बैड लोन जैसी समस्या का क्या?

जुलाई 2016 में वित्त मंत्री अरुण जेटली ने बैड लोन की जानकारी देते हुए संसद को बताया था कि सरकार से कर्ज लेकर न लौटाने वाले बकायेदारों की संख्या 8167 है. इन पर 76,685 करोड़ रुपए का बकाया है. ये वह पैसा है जो सरकार पूंजीपतियों को व्यापार के लिए देती है और वह सरकार को वापस नहीं मिलता. विजय माल्या का 7000 करोड़ इसी के तहत है जिसमें से 1201 करोड़ हाल ही में सरकार ने एसबीआई के रिकॉर्ड से हटा दिया है.

सरकार बैंक ऋण और बैंक डिफाल्टरों के पास मौजूद संपत्ति को हासिल करने के लिए क्या प्रयास कर रही है? क्या सरकार इसे कालाधन नहीं मानती? सरकार इन डिफाल्टरों के नाम क्यों नहीं सार्वजनिक करती? विजय माल्या जैसे डिफाल्टरों की संपत्तियां जब्त करके जनता का पैसा क्यों नहीं सरकारी खजाने में वापस लिया गया? अगर प्रधानमंत्री जनता की संपत्ति की लूट के प्रति गंभीर हैं तो नोटबंदी के समय ही 63 कॉरपोरेट डिफाल्टरों के 7016 करोड़ रुपए को भारतीय स्टेट बैंक के रिकॉर्ड से क्यों हटा दिया गया?

इसके पहले सरकार ने 2013 से 2015 के बीच 29 बैंकों से लिए गए 1.14 लाख करोड़ का कर्ज सरकार ने माफ कर दिया था, जिसे बैड लोन मान लिया गया था. हाल ही में इसका खुलासा इंडियन एक्सप्रेस ने किया था. पिछले तीन वित्त बर्ष का आंकड़ा है कि सिर्फ भारतीय स्टेट बैंक 40,084 करोड़ का बैड लोन है. बैंक ने मान लिया है कि अब यह वसूला नहीं जा सकेगा.

क्या कालाधन खत्म हो जाएगा?

प्रधानमंत्री पुरजोर तरीके से यह कह रहे हैं कि विमुद्रीकरण देश में भ्रष्टाचारी तत्वों पर लगाम लगाने के लिए किया गया है. वे जनता से बलिदान मांग रहे हैं. लेकिन इस सवालों का जवाब भी देना चाहिए कि कैश में करीब छह प्रतिशत कालाधन है. बाकी बचे 94 प्रतिशत कालेधन को लेकर सरकार क्या कार्रवाई कर रही है?

जब बड़े नोटों के जरिये काला कारोबार करना ज्यादा आसान है तो पुराने नोटों पर प्रतिबंध के साथ ही नये 2000 रुपये के नोट काले कारोबार में और मददगार कैसे नहीं होंगे? कालाधन जहां पैदा होता है, कालेधन से जितने कारोबार होते हैं, सरकार ने उनके बारे में क्या रणनीति बनाई? बिना काला कारोबार रोके कालेधन पर लगाम कैसे लग सकती है? जनता तक अभी नोट पहुंचे नहीं, जबकि कश्मीर में आतंकवादियों के पास से 2000 के नोट बरामद किए गए. black-money

संसद में सांसद सीताराम येचुरी, शरद यादव, गुलाम नबी आजाद आदि नेताओं ने कुछ प्रासंगिक सवाल उठाए, जिसका अब तक सरकार ने समुचित जवाब नहीं दिया है. जब कालेधन की मात्रा कैश में करीब 6 प्रतिशत अनुमानित है, तब सरकार ने इस छोटे से लक्ष्य के लिए पूरे देश को आर्थिक संकट में क्यों डाला? कालेधन का बड़ा हिस्सा काले कारोबार में लगाया जाता है जिससे और ज्यादा कालाधन पैदा किया जाता है. सरकार उसे लेकर क्या कार्रवाई करने जा रही है?

विदेशों में जो कालाधन है, जिसका जिक्र बार-बार नरेंद्र मोदी अपने चुनाव प्रचार में कर रहे थे, उस पर सरकार क्या कर रही है? सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने अपने भाषण में कहा है कि विदेशों में कालाधन रखने वालों की लिस्ट भारत को किसी सरकार से नहीं मिली है. इसे सार्वजनिक करने में कोई समझौता बाधा नहीं डालता. फिर भी सदन की मांग पर सरकार कालाधन खाताधारकों के नाम सार्वजनिक क्यों नहीं कर रही है?

अव्यवस्था का जिम्मेदार कौन?

तमाम सवाल हैं जिनके जवाब मिलने बाकी हैं. कोई सरकार यह फैसला कैसे ले सकती है कि अचानक देश की 86 प्रतिशत करेंसी को अमान्य घोषित कर दे और पूरा देश मात्र 14 प्रतिशत फुटकर करेंसी के भरोसे छोड़ दिया जाए?

नोटबंदी के फैसले से अगर आंशिक लगाम लगती है तो भी यह साहसिक फैसला था. लेकिन बिना कोई वैकल्पिक व्यवस्था किए यह निर्णय कैसे ले लिया गया? प्रधानमंत्री की घोषणा के 13 दिन बीत जाने के बाद बैंकों के बाहर कतारें लगी हैं और नोटों की कमी बनी हुई है.

रिजर्व बैंक में बैंकों की कतार

कर्नाटक में सोमवार तक 500 रुपए के नोट जारी ही नहीं किए गए. आईएनएस एजेंसी के मुताबिक, 'राज्य में नकदी को लेकर त्राहिमाम मचा है.' आरबीआई के क्षेत्रीय कार्यालय के एक अधिकारी ने कहा, 'राज्य के बैंकों को वितरित करने के लिए हमें मुंबई के केंद्रीय कार्यालय से 500 रुपए के नए नोट अभी तक नहीं मिले हैं. हम इसकी आपूर्ति के बारे में सूचना का इंतजार कर रहे हैं.'

नोटबंदी के बाद बैंकों में नोटों की कमी के बाद ज्यादातर एटीएम बंद रहे. (पीटीआई)

100 रुपए की करेंसी इतनी है ही नहीं कि सबकी जरूरतें पूरी हो सकें. उससे बड़ा नोट 500 का है जो राज्य में अब तक नहीं पहुंचा है. ऑल इंडिया बैंक ऑफिसर्स कंफेडरेशन के महासचिव एएन कृष्णमूर्ति का कहना है, 'हमारे अधिकारी आरबीआई के स्थानीय कार्यालय में 500 रुपए के नोट के लिए बीते 10 दिनों से कतार में खड़े हो रहे हैं. हम हालात से निपटने में खुद को अक्षम महसूस कर रहे हैं, क्योंकि 500 रुपए की मांग 2,000 तथा 100 के नोटों से अधिक है.' इसके अलावा 2000 की नोट खुद एक समस्या के रूप में आया है. इससे खरीदारी मुश्किल काम है क्योंकि फुटकर मिलना असंभव सा है, क्योंकि छोटे नोटों की कमी है. सरकार के लिए क्या इस समस्या का अंदाजा लगाना मुश्किल था?

फायदा और नुकसान कितना होगा

नोटबंदी के ठीक-ठीक फायदे क्या होंगे, कितना नुकसान होगा, सरकार ने इस बारे में क्या आकलन किया है? कितना कालाधन आएगा, या अब तक कितना आया, कितना नष्ट हुआ क्या इस बारे में कोई आंकड़ा उपलब्ध है? क्या सरकार के सामने इस फैसले से जुड़ा कोई सफल उदाहरण मौजूद है कि नोटबंदी के जरिये कालाधन, भ्रष्टाचार, आतंकवाद आदि समस्याओं का हल नोटबंदी के जरिये निकाला जा सकता है?notes

पुराने नोटों से सिनेमा टिकट मिलेगा, लेकिन खाना नहीं मिलेगा, यह फैसला देशहित से कैसे जुड़ा है? असम के चाय बागान कर्मियों को पुराने नोट खर्च करने की छूट दी तो बंगाल और उड़ीसा आदि राज्यों में यही छूट क्यों नहीं दी गई? बंगाल भाजपा के अकाउंट में नोटबंदी की घोषणा के साथ ही एक करोड़ रुपए जमा कराया जाना क्या महज इत्तेफाक था?

पुराने नोट वापस लेकर उन्हें नये 500, 1000 और 2000 मूल्य के नोटों से बदलने की लागत क्या है? क्या यह लागत नष्ट होने वाले अनुमानित कालेधन से अधिक है या उससे कम है? इस कदम से जितने काले धन पर रोक लगेगी, उसका क्या अनुमान है? सरकार ने अब तक की योजना, अनुमानित नफा-नुकसान और तथ्यों से जुड़े आंकड़े सार्वजनिक क्यों नहीं कर रही?

वंचितों के बारे में कौन सोचेगा?

जैसा कि मोदी जी कहते हैं कि वे 125 करोड़ जनता के प्रधानमंत्री हैं. उनका काम है कि वे देश की समूची आबादी के बारे में सोचें. न्याय का सिद्धांत यह है कि '10 अपराधी छूट जाएं, लेकिन एक निर्दोष को सजा नहीं मिलनी चाहिए.'

प्रधानमंत्री जी ने अपना निर्णय लेते समय भारत की करीब दो तिहाई ग्रामीण आबादी के बारे में क्या सोचा था जो बैंकिंग व्यवस्था से बाहर है? इंटरनेट से लेनदेन से वैध करने के फैसले के साथ उस 78 प्रतिशत जनता के बारे में क्या सोचा जिसकी पहुंच इंटरनेट तक नहीं है. क्या प्रधानमंत्री इस तथ्य से अनजान हैं कि देश की मात्र 22 प्रतिशत आबादी इंटरनेट के दायरे में आती है.

पेटीएम जैसी व्यवस्था को प्रमोट करना सुविधाजनक है, लेकिन उनके लिए जो स्मार्टफोन और तेज स्पीड इंटरनेट इस्तेमाल करते हैं. देश की 125 करोड़ की आबादी में कुल 61 करोड़ मोबाइल यूजर हैं. इनमें से बड़ी संख्या साधारण मोबाइल का इस्तेमाल करती है. बड़ी संख्या में लोगों के पास एक से ज्यादा मोबाइल नंबर हैं. आधी से अधिक आबादी जो मोबाइल सुविधा का भी इस्तेमाल नहीं करती, उसके लिए क्या व्यवस्था की गई?

नोटबंदी की घोषणा के समय भारत के 'अभिन्न अंग' कश्मीर घाटी में इंटरनेट पर प्रतिबंध था. उस बारे में सरकार ने क्या वैकल्पिक व्यवस्था की थी? देश में करीब ढाई करोड़ लोग क्रेडिट कार्ड का इस्तेमाल करते हैं. बाकी की पूरी आबादी के बारे में सरकार ने क्यों नहीं सोचा? देश की करीब आधी आबादी अशिक्षित है. जो शिक्षित नहीं हैं, उनके इंटरनेट साक्षर होने की उम्मीद नहीं की जा सकती. जाहिर है कि उनके पास कैशलेस पेमेंट की सुविधाएं नहीं हैं. उनके बारे में सरकार ने क्या योजना बनाई थी?

अच्छी नीयत पैमाना नहीं हो सकती

आपात निर्णय के बाद सरकार को हर दिन अपने निर्णय बदलने पड़े. इससे आम जनता को और भी असुविधा हुई. निर्णय के पहले गोपनीयता का मसला था. उसके बाद में भी निर्णय से जुड़ी अराजकता का समाधान तुरंत क्यों नहीं हुआ? नोटबंदी की वजह से जिन साधारण लोगों को जान गंवानी पड़ी, सरकार ने उन पर मुंह नहीं खोला. कितने लोग मरे हैं यह सिर्फ अनुमान है कि यह संख्या 60-70 के करीब होगी? सरकार ने नोटबंदी से हुई मौतों का आंकड़ा क्यों नहीं जारी किया?

पूरे देश में 70 से 80 प्रतिशत उद्योग-व्यापार प्रभावित हुआ है. देश की अर्थव्यस्था और उद्योग जगत को कितना नुकसान हुआ है, इसका अनुमान क्यों नहीं लगाया गया? क्या नोटबंदी से जितना हासिल होगा, नुकसान उससे कम है या अधिक है? क्या इसका अनुमान लगाने का कोई तंत्र सरकार के पास नहीं है?

नोटबंदी के चलते कारोबार प्रभावित होने के बाद नवी मुंबई में खड़े ट्रक. (पीटीआई)

इन सब सवालों के बावजूद यह कहना होगा कि नोटबंदी का फैसला अच्छी नीयत से लिया गया था और साहसिक था. लेकिन अच्छी नीयत के आधार पर फैसले की असफलता और उससे उपजे संकट की समीक्षा क्यों नहीं होनी चाहिए? प्रधानमंत्री को यह समझना चाहिए कि उन्होंने एक सार्वजनिक हित का निर्णय लिया. उसकी आलोचना भी सार्वजनिक हित से ही जुड़ी है. उन्हें हर मुद्दे को भावुकता का मसला बनाने से बचना चाहिए. कालाधन, भ्रष्ट हो चुकी अर्थव्यस्था, नक्सलवाद और आतंकवाद भावुकता के मसले नहीं हैं. एक मजबूत प्रधानमंत्री को बार-बार भावुकता का सहारा क्यों लेना पड़ता है?

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