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नीतीश कुमार का 'कहीं पे निगाहें-कहीं पे निशाना', लेकिन इस बार दाल नहीं गलेगी

आम सोच यही है कि लोहा गरम देखकर नीतीश कुमार ने हथौड़ा मारा है लेकिन नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में चल रही सरकार अभी उतनी भी अलोकप्रिय नहीं हुई कि हर किसी के सामने घुटने टेकने लगे

Kanhaiya Bhelari Kanhaiya Bhelari Updated On: Jun 04, 2018 03:46 PM IST

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नीतीश कुमार का 'कहीं पे निगाहें-कहीं पे निशाना', लेकिन इस बार दाल नहीं गलेगी

कर्नाटक में सरकार का न बनना और हाल के दिनों में उपचुनावों में भारी शिकस्त ने जहां बीजपी को 'परेशान' कर रखा है, वहीं इन दो मोर्चे पर हुई विफलताओं ने इसके सियासी दोस्त और बिहार के सीएम नीतीश कुमार को ‘फिशिंग इन ट्रबल्ड वाटर’ का सुनहरा मौका दे दिया है.

बिना समय गंवाए नीतीश कुमार ने बीते कल के तालाब में महाजाल फेंक भी दिया है. जेडीयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष की हैसियत से नीतीश कुमार ने पार्टी की कोर कमिटी की इमरजेंसी मीटिंग की जिसमें मुख्य रूप से दो फैसले लिए गए. पहला, चुनाव लोकसभा का हो या विधानसभा का, बिहार में नीतीश कुमार ही चेहरा होंगे. जेडीयू का यह फैसला केवल लोगों को बताने वाला फैसला है, हाथी के दिखाने वाले दांत की तरह.

रूठे पवन वर्मा को मनाया

चर्चा का मुख्य मुद्दा था कि किस रणनीति से जेडीयू को फिर से बड़े भाई की अवतार में लाकर 2019 लोकसभा चुनाव में 25 सीटें झटक ली जाएं. बैठक सीएम के सरकारी निवास में हुई जिसमें पार्टी के सिर्फ चार ही नेता मौजूद थे. नीतीश कुमार, केसी त्यागी, पवन कुमार वर्मा और चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर. बैठक का मुद्दा कितना अहम था, इसी बात से तय हो जाता है कि 10 महीने से रूठे पवन कुमार वर्मा को भी बुला लिया गया था.

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सही वक्त पर सही हथियार के प्रयोग में माहिर नीतीश कुमार ने मन बना लिया है कि बीजेपी से सीट के सवाल पर अंतिम फैसला कर ही लेना है. ठीक उसी मोड में जैसे बिहार में शादी से कई माह पहले लड़का और लड़की की छेंकाई (रोका) कर दी जाती है. नीतीश कुमार को कहीं ने कहीं से लगने लगा है कि बीजपी जान बूझकर सीट बंटवारे का मामला उलझाना चाहती है.

Nitish Kumar

बीजेपी-एनडीए में दरार?

बिहार में लोकसभा की कुल 40 सीटें हैं. 2014 के आम सभा चुनाव में बीजेपी 30 पर लड़ी थी जिसमें 22 जीती. सहयोगी राम विलास पासवान की पार्टी एलजेपी ने 7 सीट पर उम्मीदवार खड़े किए जिसमें 6 विजयी रहे. उसी तरह उपेंद्र प्रसाद कुशवाहा के सभी 3 कैंडिडेट जीत हासिल किए थे. जुलाई 2017 में बिहार में आए राजनीतिक भूकंप ने महागठबंधन के मकान में भयंकर दरार पैदा कर दिया.

एनडीए का अंग बनकर नीतीश कुमार ने जल्दबाजी में ही सही सरकार बनाने में कामयाबी तो हासिल कर ली लेकिन प्रॉपर बातचीत के अभाव में कई मुद्दे अनसुलझे रह गए. बिहार सीएम उनसे इस मुद्दे पर बात नहीं कर सके क्योंकि राजनीतिक हैसियत के तराजू पर पीएम नरेंद्र मोदी का पलड़ा नीतीश कुमार से काफी भारी था.

नीतीश का बीजेपी को स्षष्ट संदेश

पीएम नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में बीजपी का विस्तार दिन दूना रात चौगुना के हिसाब से बढ़ रहा था. इधर बिहार में नीतीश कुमार बेसब्री से मौके का इंतजार कर रहे थे. एक परिपक्व सियासी लड़ाके की तरह नजर लगाए थे कि कब ऊंट पहाड़ के नीचे आए. महाभारत में महर्षि वेदव्यास ने सही लिखा की है कि 'हर दिन होत न एक समाना.' और वही हुआ.

राजनीतिक विश्लेषक के मुताबिक, ये बिल्कुल स्पष्ट है कि नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता 2014 वाली नहीं है. क्षत्रप दोस्त भी एक एक कर बाय बाय कर रहे हैं. राजनीतिक पंचांग पर गुणा भाग करके नीतीश कुमार ने फैसला किया कि अभी महाजाल फेंकने पर एनडीए रूपी तालाब से पर्याप्त मछलियां मिल जाएंगी. एक खांटी नीतीश समर्थक ने बताया कि ‘साहब ने बीजेपी आलाकमान को साफ मैसेज दे दिया है कि 25 सीट से एक भी कम सीट पर नहीं मानेंगे.'nitish kumar

बीजेपी के एक बड़े नेता ने बताया, ‘मैं तो यह खबर -'जेडीयू चाहता है एनडीए बिहार में नीतीश कुमार के नेतृत्व में लड़े लोकसभा का चुनाव' पढ़कर ही समझ गया कि कहीं पे निगाहें, कहीं पे निशाना’ वाली बात है. वो आगे बताते हैं कि बतौर सीएम नीतीश कुमार ही बिहार चुनाव में एनडीए का फेस थे, हैं और रहेंगे. इसमें कोई नई बात नहीं है.

उतने भी अलोकप्रिय नहीं हुए मोदी

नाम नहीं छापने की शर्त पर उस बीजेपी नेता ने कहा कि ‘साल 2000 में जब वो सात दिन के सीएम थे, तब हम संख्या में उनसे ज्यादा थे फिर भी बड़ा भाई माने. उसके बाद चुनाव हुआ तो नारा दिया गया- नया बिहार, नीतीश कुमार. 2010 में स्लोगन बना 'फिर एक बार, नीतीश कुमार.'

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आम सोच भी यही है कि लोहा गरम देखकर नीतीश कुमार ने हथौड़ा मारा है लेकिन नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में चल रही सरकार अभी उतनी भी अलोकप्रिय नहीं हुई है कि हर किसी के सामने घुटने टेकने लगे. 2014 चुनाव बिहार में तीन अलग-अलग धुरी थी तभी वोट का विभाजन हुआ और एनडीए को 31 सीटें मिलीं. साल 2000 से अबतक गंगा नदी में बहुत पानी बह चुका है. किसी भी सूरत में नीतीश कुमार को 25 लोकसभा सीटें नहीं मिलेंगी.

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