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जब पोस्टर में मायावती भारी फिर कैसे होगी विपक्षी नेताओं की यारी

विपक्षी नेताओं की विडंबना है कि एक-दूसरे के नेतृत्व को वो जल्दी स्वीकार नहीं करते

Amitesh Amitesh Updated On: Aug 21, 2017 03:14 PM IST

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जब पोस्टर में मायावती भारी फिर कैसे होगी विपक्षी नेताओं की यारी

मोदी के रथ को रोकने के लिए विपक्षी कुनबे में छटपटाहट है. बेचैनी का आलम इस कदर है कि बिना किसी तैयारी के ही सही विपक्षी कुनबा एक होने की बात कर रहा है. ना कोई सिद्धांत और ना ही कोई मुद्दा बस विपक्ष को एकजुट कर 2019 की लड़ाई में मोदी को रोकना है.

विपक्ष की इसी घेराबंदी पर नीतीश कुमार ने सवाल खड़ा किया था. हालांकि, बाद में नीतीश कुमार ने विपक्ष से अलग होकर एनडीए का दामन थाम लिया. लेकिन, उस वक्त विपक्ष की दिशाहीन रणनीति पर नीतीश कुमार का सवाल अभी भी उतना ही प्रासंगिक है.

क्योंकि ना ही लक्ष्य निर्धारित है और ना ही विपक्ष के बीच आपसी तालमेल दिख रहा है. बस एकता के नाम पर एक साथ खड़े होने की कोशिश है.

विपक्षी एकता के लूपहोल की कलई बीएसपी के ताजा पोस्टर के सामने आने के बाद खुल गई है. बीएसपी के ऑफिसियल ट्विटर हैंडल से एक ऐसे ही पोस्टर को ट्विट किया गया है जिसमें विपक्षी एकता को दिखाने की कोशिश की गई है. इस पोस्टर में कहा गया है कि सामाजिक न्याय के समर्थन में विपक्ष एक हो.

पोस्टर में विरोधाभास

पोस्टर में बीएसपी अध्यक्ष मायावती के अलावा, एसपी अध्यक्ष अखिलेश यादव, आरजेडी अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव और उनके बेटे तेजस्वी यादव, नीतीश से नाराज चल रहे जेडीयू नेता शरद यादव, बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को दिखाया गया है.

इस पोस्टर में विपक्षी एकता की दुहाई दी जा रही है, लेकिन, पोस्टर में विपक्षी कुनबे का विरोधाभास साफ नजर आ रहा है. बीएसपी की तरफ से जारी इस पोस्टर में अपनी अध्यक्ष मायावती को सबसे बड़ी नेता के तौर पर दिखाया गया है. बाकी नेताओं की तुलना में मायावती की तस्वीर काफी बड़ी है जो कद्दावर नेता के तौर पर दिख रही हैं. जबकि बाकी सभी नेताओं को बेहद कम महत्व दिया गया है. अखिलेश यादव से लेकर सोनिया गांधी तक सभी की तस्वीर बेहद छोटी है.

इस पोस्टर में बीएसपी की सोच झलक रही है जिसमें विपक्षी कुनबे में अभी भी मायावती को सबसे बड़ी नेता के तौर पर दिखाया जा रहा है. हालांकि, खबर है कि बीएसपी के प्रदेश अध्यक्ष रामअचल राजभर ने बीएसपी के वेरिफाइड ट्विटर हैंडल को आधिकारिक मानने से इनकार किया है.

Mayawati

पार्टी सिमट रही है और पोस्टर में कद बढ़ रहा है

उत्तर प्रदेश में इसी साल हुए विधानसभा चुनाव में मायावती का करिश्मा फेल हो गया. 403 सीटों में से महज 19 सीटें ही बीएसपी जीत सकी. बीएसपी यूपी के भीतर एसपी के बाद तीसरे नंबर की पार्टी बनकर रह गई. इसके पहले लोकसभा चुनाव में मायावती की पार्टी का खाता तक नहीं खुल पाया.

इतने बुरे हाल के बाद मायावती के सामने अपने-आप को फिर से स्थापित करने की सबसे बड़ी चुनौती है. यहां तक कि राज्यसभा से इस्तीफा देने के बाद मायावती के लिए अपने बल-बूते फिर से राज्यसभा पहुंच पाना मुश्किल है. ऐसे में उन्हें दूसरों की वैशाखी का सहारा लेना पड़ सकता है. ऑफर लालू यादव की तरफ से भी है. लेकिन, ऑफर देने वाले लालू यादव को भी इस पोस्टर में बेहद कम महत्व दिया गया है.

लालू यादव समेत कई विपक्षी नेताओं की कोशिश है कि यूपी में एक महागठबंधन बनाया जाए जिसमें अखिलेश यादव और मायावती दोनों एक साथ एक मंच पर आ जाएं. कांग्रेस और आरएलडी के इसमें शामिल होने के बाद ये महागठबंधन बीजेपी को कड़ी चुनौती दे सकता है.

इस बाबत बात चल भी रही है. इस तरह के संकेत अखिलेश यादव की तरफ से भी दिए गए हैं. लेकिन, बीएसपी की तरफ से मायावती के कद को सबसे बड़ा दिखाने की मुहिम सारे प्लान पर पलीता लगा सकती है.

पोस्टर से राहुल गायब

केवल अखिलेश यादव को ही कम महत्व नहीं दिया गया है. बल्कि, कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की भी एक छोटी तस्वीर लगाई गई है. इस वक्त कांग्रेस मुख्य विपक्षी दल की भूमिका में है. लोकसभा से लेकर राज्यसभा तक कांग्रेस ही सरकार को घेरने में बड़ा रोल निभा रही है. लेकिन, विपक्षी एकता की दुहाई देने वाले इस पोस्टर में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को कम महत्व देना संभावित महागठबंधन की गांठ को सामने ला रहा है.

opposition parties'

इससे भी बड़ी बात है कि कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी इस पोस्टर से नदारद हैं. एक तरफ कांग्रेस 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले राहुल गांधी की अध्यक्ष पद पर ताजपोशी की तैयारी कर रही है तो दूसरी तरफ विपक्षी एकता को दिखाने वाले पोस्टर से राहुल गायब हैं.

ऐसे में क्या कांग्रेस अपने युवराज की उपेक्षा को बर्दाश्त कर पाएगी. क्या कांग्रेस किसी भी कीमत पर राहुल को किनारे कर किसी महागठबंधन में बंधने की कोशिश करेगी. ये चंद सवाल हैं जो विपक्षी दलों की एकता की कलई खोल रहे हैं.

हालांकि लगता है मायावती लालू यादव के ऑफर से खुश हैं, तभी तो लालू के साथ-साथ उनके बेटे तेजस्वी की भी तस्वीर इस पोस्टर में लगा है. राज्यसभा पहुंचने के लिए लालू ने जो दांव खेला उसका असर इस पोस्टर से तो दिख रहा है. लेकिन, यूपी में अखिलेश को बराबरी का मौका दिए बगैर मायावती की विपक्षी एकता की कोशिश महज दिखावा भर ही रह जाएगी.

कहीं हमेशा बनकर बिखरने वाले विपक्षी कुनबे की कहानी इस बार भी ना दोहरायी जाए. क्योंकि विपक्षी नेताओं की विडंबना है कि एक-दूसरे के नेतृत्व को वो जल्दी स्वीकार नहीं करते. इसकी एक बानगी बीएसपी के पोस्टर में दिख भी गई है.

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