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वन रैंक वन पेंशन पर राजनीति क्यों नहीं होनी चाहिए?

किसी मुद्दे को बार-बार उठाने वाली पार्टी कैसे कहती है कि इस मसले पर राजनीति न की जाए?

Updated On: Nov 18, 2016 03:06 PM IST

Krishna Kant

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वन रैंक वन पेंशन पर राजनीति क्यों नहीं होनी चाहिए?

एक पूर्व सैनिक के खुदकुशी कर लेने के बाद भाजपा का कहना है कि इस मुद्दे पर राजनीति नहीं होनी चाहिए.

केंद्र में भाजपा की सरकार बनने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर और वित्त मंत्री अरुण जेटली वन रैंक वन पेंशन लागू करने के बारे में कई बार घोषणाएं कर चुके हैं.

नरेंद्र मोदी अपनी रैलियों में वन रैंक वन पेंशन यानी ओआरओपी पर समय-समय पर बोलते रहे हैं. हाल में उन्होंने कई रैलियों या कार्यक्रमों में सिर्फ सेना पर बात की. वे मई, 2015 में ओआरओपी पर 'मन की बात' भी कर चुके हैं.

किसी मुद्दे को बार-बार सार्वजनिक तौर पर उठाने और चुनाव में भुनाने वाली पार्टी कैसे कहती है कि इस मसले पर राजनीति न की जाए?

जब सैनिकों की मांग का निदान राजनीतिक है, एक पार्टी उसे भुनाएगी भी तो दूसरी को कैसे रोका जा सकता है कि वह राजनीति न करे?

पहली बार जब यूपीए सरकार ने वन रैंक वन पेंशन के लिए बजट का प्रावधान किया था, उसके बाद से ही पार्टियां इसे मुद्दा बनाती रही हैं.

क्योंकि देश में रिटायर्ड सैनिकों की संख्या 30 लाख है और 14 लाख सैनिक और अफसर सेना में तैनात हैं. पार्टियां इस तबके को एक बड़े वोटबैंक के तौर पर देखती हैं.

सर्जिकल स्ट्राइक के बाद उत्तर प्रदेश में सेना के नाम पोस्टर लगाना, चुनावी रैलियों में सेना का गुणगान करना और वन रैंक वन पेंशन को लेकर प्रचार करना भी राजनीति ही है.

इसके अलावा, वन रैंक वन पेंशन घोषणा करके भी उसे पूरी तरह लागू न करना और विकलांग सैनिकों की पेंशन में कटौती कर देना भी एक तरह की राजनीति ही है जिसका कोई राजनीतिक प्रतिपक्ष नहीं है.

चार दशक पुराने इस मसले पर किसी पार्टी ने कम राजनीति नहीं की. अंतत: जब इस स्कीम की घोषणा हुई तो सैनिकों ने कहा कि सरकार ने हमारी मांगों में से सिर्फ एक मांग लागू की है.

रक्षा मंत्री ने पिछले साल वन रैंक वन पेंशन का ऐलान किया था. उनकी घोषणा के बाद जंतर मंतर पर धरने पर बैठे सैनिक पहले तो बहुत खुश हुए लेकिन बाद में उनका आरोप था कि सरकार उन्हें बेवकूफ बना रही है.

उनकी सिर्फ एक ही मांग मानी गई. बाकी को दरकिनार कर दिया. सरकार तब से ही कह रही है कि उसने वन रैंक वन पेंशन का वादा पूरा किया.

सरकार ने उस वक्त कहा था कि वीआरएस लेने वाले सैनिकों को वन रैंक वन पेंशन का फायदा नहीं मिलेगा.

लेकिन सेवा के दौरान विकलांग हुए और स्वास्थ्य वजहों से सेवा छोड़ने वालों को फायदा मिलेगा. पूर्व सैनिकों ने सरकार के फैसले का स्वागत किया लेकिन असंतोष भी जताया था.

उनका कहना था कि हमारी ज्यादातर मांगें नहीं मानी गईं. आंदोलन में शामिल मेजर जनरल सतबीर सिंह ने उस समय बयान दिया था कि 'हमें यह मंजूर नहीं है. पूर्व सैनिकों ने कई बिंदुओं पर आपत्ति जताई थी और आंदोलन जारी रखने की बात कही थी.

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उस समय विकलांग हुए पूर्व सैनिकों को वन रैंक वन पेंशन के तहत फायदा दिया गया था.

लेकिन हाल ही में सर्जिकल स्ट्राइक के बाद सैनिकों की विकलांगता पेंशन में कटौती कर दी गई.

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने एक वीडियो जारी करके आरोप लगाया है कि 'भाजपा के राज में किसान और जवान, दोनों परेशान हैं.'

'सरकार को सर्जिकल स्ट्राइक के बाद सैनिकों का हौसला बढ़ाना चाहिए था, उनको इनाम देना चाहिए था मगर ऐसा करने के बजाय सैनिकों की विकलांगता पेंशन में जबरदस्त कटौती कर दी गई.'

'मोदी सरकार ने सैनिकों के रैंक में भी कटौती कर दी है. मोदी जी सैनिकों के साथ इतना बड़ा धोखा करने बाद भी घूम-घूम कर कहते फिर रहे हैं कि हमने सर्जिकल स्ट्राइक किया, हमें वोट दो. सैनिकों के नाम पर छलावा और वोट बैंक की राजनीति की जा रही है.'

29 अक्टूबर को कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर कहा था कि वन रैंक वन पेंशन को सही तरीके से लागू किया जाए.

राहुल ने लिखा था, ‘हमारे जवान हर रोज अपने देश की रक्षा के लिए अपना जीवन दांव पर लगाते हैं. लिहाजा यह हमारा कर्तव्य है कि उन्हें दिखाया जाए कि हम उनकी और उनके परिवार की चिंता करते हैं. मैं आपका ध्यान मीडिया की उन खबरों की ओर लाना चाहता हूं, जो पिछले कुछ हफ्तों में सरकार द्वारा लिए गए फैसलों के बाद सामने आ रही हैं. मुझे लगता है कि ये सब हमारे जवानों के मनोबल पर प्रतिकूल प्रभाव डालने वाली खबरें हैं.’

इसके जवाब में केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने राहुल गांधी से ‘राजनीतिक फायदे के लिए गंदी राजनीति’ न करने को कहा था.'

'रक्षा मंत्री मनोहर पार्रिकर ने वन रैंक वन पेंशन पर पिछले महीने दावा किया था कि मोदी सरकार ने इस योजना के तहत 20.69 लाख पूर्व सैनिकों को 5500 करोड़ रुपये से अधिक का भुगतान करके अपना वादा पूरा किया है.'

उनका आरोप था कि विपक्षी सरकारों ने 43 वर्षो में कोई काम नहीं किया है. जो इस पर बात कर रहे हैं, वे पिछले 43 वर्षो से बातें ही कर रहे हैं.

यह पिछले वर्ष या उससे पहले वर्ष अथवा पिछले चुनाव की मांग नहीं थी. वन रैंक वन पेंशन का मुद्दा 1970 से उठाया जा रहा था और किसी भी सरकार ने इसे हल करने की कोशिश नहीं की. वन रैंक वन पेंशन का वार्षिक खर्च लगभग 10000 करोड़ रुपए है.

तो क्या है वन रैंक वन पेंशन?

वन रैंक-वन पेंशन का मतलब है कि एक ही रैंक के जो सैनिक अलग-अलग समय पर रिटायर हुए हों, उनकी पेंशन राशि में बड़ा अंतर न रहे.

2006 से पहले रिटायर हुए सैनिकों को कम पेंशन प्राप्त हो रही थी. सैनिकों का कहना था कि कई अफसरों को अपने से कम रैंक वाले अफसर से भी कम पेंशन मिलती है.

यह अंतर इतना ज्यादा था कि पहले रिटायर अफसरों की पेंशन बाद में रिटायर हुए छोटे अफसरों से कम हो गई.

यह मसला 40 साल पुराना है. केंद्र सरकार सैनिकों की इस मांग को लगातार टाल रही थी. 1973 तक सेना में वन रैंक वन पेंशन की व्यवस्था लागू थी.

उन्हें आम लोगों से ज्यादा वेतन मिलता था. 1973 में आए तीसरे वेतन आयोग ने सशस्त्र बलों का वेतन कम करके आम लोगों के बराबर कर दिया.

2008 में सैनिकों ने इंडियन एक्स सर्विसमैन मूवमेंट नाम से एक संगठन बनाया और आंदोलन शुरू कर दिया.

2009 में पूर्व सैनिकों ने क्रमिक भूख हड़ताल करते हुए राष्ट्रपति को हजारों मेडल वापस कर दिए थे. डेढ़ लाख पूर्व फौजियों ने अपने खून से हस्ताक्षर वाला ज्ञापन तत्कालीन राष्ट्रपति प्रतिभा पाटील को सौंपा था.

सितंबर 2009 में सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को वन रैंक वन पेंशन पर आगे बढ़ने का आदेश दिया.

मई 2010 में सेना पर बनी स्थायी समिति ने वन रैंक वन पेंशन लागू करने की सिफारिश की. फरवरी 2014 में यूपीए सरकार ने इसे लागू करने का फैसला किया और 500 करोड़ रुपए का बजट आवंटित किया.

मई, 2014 में यूपीए सरकार सत्ता से बाहर हो गई. इस बीच नरेंद्र मोदी अपनी चुनावी रैलियों में वन रैंक वन पेंशन का वादा कर चुके थे.

जुलाई 2014 में मोदी सरकार ने बजट में इसके लिए 1000 करोड़ रुपए आवंटित किए. फरवरी 2015 में सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को तीन महीने के अंदर वन रैंक वन पेंशन लागू करने को कहा.

मोदी सरकार ने अपने पहले बजट में इसके लिए 1000 करोड़ रुपए का प्रावधान किया.

वन रैंक वन पेंशन पर केंद्र सरकार की घोषणा के बाद भी सैनिकों का आंदोलन खत्म नहीं हुआ था.

पूर्व सैनिकों का आरोप है कि उन्हें उम्मीद थी कि सरकार इसे तय वक्त पर लागू करेगी, लेकिन अब तक कोई सकारात्मक संदेश नहीं मिला है.

सरकार ने विसंगतियां दूर करने के लिए एक सदस्यीय न्यायिक आयोग बनाया है. आयोग ने अभी तक अपनी रिपोर्ट भी नहीं दी है. पूर्व सैनिकों को लगता है कि सरकार न्याय नहीं कर रही है.

तथ्यों से साफ है कि कांग्रेस और भाजपा दोनों ने इस मसले को 40 साल तक लटकाया और आठ साल से दोनों पार्टियां इस पर राजनीति कर रही हैं. सैनिकों के नाम पोस्टर छपवाने वाली भाजपा सत्ता में है.

उसे अपनी राजनीति पर ऐतराज नहीं है तो दूसरे की राजनीति पर ऐतराज क्यों है? मेरे ख्याल से इस मसले पर इस हद तक राजनीति होनी चाहिए कि यह मसला जल्द से जल्द सुलझ जाए.

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