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राजनीतिक हत्याओं से हर दौर में 'लाल' रही है बंगाल की धरती, TMC इसी परंपरा को आगे बढ़ा रही है

1977 में वामपंथियों के हाथों कांग्रेस की पराजय होने से पहले 1971 से 1977 के दौरान कांग्रेस ने यहां जिस तरह राज किया, उसे ‘गुंडई के साल’ के नाम से याद किया जाता है

Raghav Pandey Updated On: Jun 04, 2018 12:18 PM IST

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राजनीतिक हत्याओं से हर दौर में 'लाल' रही है बंगाल की धरती, TMC इसी परंपरा को आगे बढ़ा रही है

भारत में अगर आपको किसी राज्य में राजनीतिक रंजिश में हत्या हो जाने पर अचंभा नहीं होना चाहिए तो वह राज्य है, पश्चिम बंगाल. हाल में दो बीजेपी कार्यकर्ताओं की मौत से फिर उसी तथ्य की पुष्टि होती है कि पश्चिम बंगाल प्रशासन हमेशा से राजनीतिक हिंसाओं को बढ़ावा देता रहा है.

कम से कम आजादी के बाद से तो यह देश का सबसे ज्यादा राजनीतिक हिंसा वाला राज्य ही है. 1977 में वामपंथियों के हाथों कांग्रेस की पराजय होने से पहले 1971 से 1977 के दौरान कांग्रेस ने यहां जिस तरह राज किया, उसे ‘गुंडई के साल’ के नाम से याद किया जाता है. वह दौर युवा कांग्रेस और छात्र परिषद द्वारा नक्सलियों और राजनीतिक विरोधियों की संगठित राजनीतिक हत्याएं करने का था. उस समय नक्सलियों के निशाने पर कांग्रेस और सीपीएम थे, सीपीएम के निशाने पर कांग्रेस और नक्सल थे, और सरकारी मशीनरी की मदद से लैस कांग्रेस के निशाने पर सीपीएम और नक्सल थे.

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इस हद दर्जे के उत्पीड़न और हिंसा के खिलाफ पश्चिम बंगाल के लोगों ने कांग्रेस को हराकर वाम दलों को जनादेश दिया था. लेकिन वामपंथियों का शासन भी इससे कम हिंसक नहीं था, बल्कि सच कहें तो राज्य में अब तक की राजनीतिक हिंसा और उत्पीड़न के सभी स्तरों को पार कर गया. कम्युनिस्ट शासन ने सभी उद्योगों को राज्य से भगा दिया. किसान और गरीब हो गए और आखिर में जब इन्हें सत्ता से बेदखल किया गया तो पश्चिम बंगाल में जितने लोग भूख से मर रहे थे, उतने भारत में किसी और राज्य में नहीं थे. इसके साथ ही अपनी विचारधारा के प्रति समर्पित वामपंथियों को लोकतांत्रित व्यवस्था की अनदेखी किए जाने से परहेज नहीं था, जिसके नतीजे में इनके दौर में बडे़ पैमाने पर चुनाव में बेईमानी आम बात हो गई.

इनके शासन के पुरातन तरीकों से तंग आकर यहां के लोगों ने ममता बनर्जी को सत्ता सौंपी. हालांकि ऐसा माना जाता है कि इसके बाद सारे हुड़दंगी वाम कार्यकर्ता तृणमूल कांग्रेस में शामिल हो गए. इसलिए आश्चर्य नहीं कि वह उसी तरीके से काम करते रहे, जिसके वो आदी थे. इसका मतलब है कि राज्य में बेलगाम राजनीतिक हिंसा जारी रही. नीचे दिया गया चार्ट वर्ष 2001 से 2016 के दौरान राजनीतिक हत्याएं दर्शाता है. ये आंकड़े बताते हैं कि इस अवधि में राज्य में कम से कम राजनीतिक हत्याओं में निरंतरता बनी रही.

राजनीतिक कारणों से हत्याएं

राजनीतिक कारणों से हत्याएं

अगले चार्ट में राज्यवार राजनीतिक हत्याओं को दर्शाया गया है. इसमें सिर्फ उन्हीं राज्यों को शामिल किया गया है, जहां पांच से अधिक राजनीतिक हत्याएं हुईं. यह सभी आंकड़े देश में होने वाले अपराध को लेकर नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (एनसीआरबी) द्वारा प्रकाशित रिपोर्ट से लिए गए हैं.

 

वर्ष 2007राजनीतिक कारणों से हत्याएं

वर्ष 2007राजनीतिक कारणों से हत्याएं

वर्ष 2008 राजनीतिक कारणों से हत्याएं

वर्ष 2008 राजनीतिक कारणों से हत्याएं

वर्ष 2009 राजनीतिक कारणों से हत्याएं

वर्ष 2009 राजनीतिक कारणों से हत्याएं

वर्ष 2010 राजनीतिक कारणों से हत्याएं

वर्ष 2010 राजनीतिक कारणों से हत्याएं

वर्ष 2011 राजनीतिक कारणों से हत्याएं

वर्ष 2011 राजनीतिक कारणों से हत्याएं

वर्ष 2012 राजनीतिक कारणों से हत्याएं

वर्ष 2012 राजनीतिक कारणों से हत्याएं

वर्ष 2013 राजनीतिक कारणों से हत्याएं

वर्ष 2013 राजनीतिक कारणों से हत्याएं

वर्ष 2014 राजनीतिक कारणों से हत्याएं

वर्ष 2014 राजनीतिक कारणों से हत्याएं

जैसा कि साफ दिख रहा है कि वर्ष 2007, 2010, 2011 और 2013 में पश्चिम बंगाल में सबसे ज्यादा राजनीतिक हत्याएं हुईं. अन्य वर्षों में भी यह ऐसी सबसे ज्यादा राजनीतिक हत्याओं वाले राज्यों में शुमार रहा है.

हालांकि 2015 और 2016 में आंकड़े बताते हैं कि इन दोनों वर्षों में सिर्फ एक-एक राजनीतिक हत्या हुई. यह आंकड़ों में अंतरर्विरोध को दर्शाता है, क्योंकि ऐसी ही दो हत्याएं बीते पांच दिनों के भीतर हो चुकी हैं. साल 2016 में पश्चिम बंगाल के आंकड़ों में सबसे ज्यादा नक्सलवाद से जुड़ी 79 हत्याएं दर्ज की गईं. यह छत्तीसगढ़ से भी ज्यादा है. इस आंकड़े का कोई मतलब नहीं है क्योंकि पश्चिम बंगाल में सिर्फ एक जिला है, जहां नक्सलवाद का असर है. इससे सवाल खड़ा होता है कि क्या राज्य सरकार अब सारी राजनीतिक हत्याओं को नक्सल से जुड़ी हत्याओं के रूप में पेश कर रही है?

इसका हल क्या है?

राजनीतिक हत्याएं मौलिक रूप से लोकतंत्र और कानून के शासन के खिलाफ मनमानी का हथियार हैं. यह संवैधानिक सेटअप के मूल आधार पर चोट करती है और इस लिए जरूरी है इस समस्या से निपटने के लिए बड़े कदम उठाए जाएं. राजनीतिक हिंसा की ऐसी संस्थागत समस्या का समाधान राज्य के शासन के ढांचे में संपूर्ण बदलाव से ही मुमकिन है. केंद्र सरकार को ऐसे में मामले में अपनी दक्षता दिखानी होगी. पश्चिम बंगाल संवैधानिक मशीनरी के नाकारा हो जाने का एक आदर्श उदाहरण है. खासकर जब हम इन हत्याओं को अभी पिछले ही महीने संपन्न हुए पंचायत चुनाव के दौरान बड़े पैमाने पर हुई जबरदस्त हिंसा के साथ जोड़कर देखते हैं. आजाद भारत के हमारे पूरे इतिहास में ऐसा कभी नहीं हुआ था.

मोदी सरकार के पास संविधान के अनुच्छेद 356 के तहत अपनी शक्तियों का इस्तेमाल करने के सारे कारण मौजूद हैं, और ऐसे में ममता बनर्जी सरकार को फौरन बर्खास्त करके नए चुनाव का आदेश देना चाहिए. अगर ऐसा नहीं होता तो केंद्र सरकार को इन दोनों हत्याओं की सीबीआई जांच और चुनाव के दौरान हुई हिंसा की न्यायिक जांच कराने का आदेश देना चाहिए. निष्पक्ष जांच के लिए इसकी सुनवाई राज्य के बाहर होनी चाहिए. अंतिम रूप से यह केंद्र सरकार की ही जिम्मेदारी है कि कानून का शासन बना रहे और संघीय सरकार की कोई भी इकाई एक निरंकुश मुख्यमंत्री की अगुवाई में इस दर्जे की अव्यवस्था ना फैला सके.

(लेखक आईआईटी बांबे, मुंबई में डिपार्टमेंट ऑफ ह्यूमैनटीज एंड सोशल साइंसेज में सीनियर फेलो हैं.)

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