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राजनीतिक रण में 'अपनों' पर तलवार चलाने के महारथी हैं केजरीवाल

अन्ना हजारे से शुरू हुए सिलसिले का हालिया पड़ाव कुमार विश्वास और आशुतोष हैं

Updated On: Jan 05, 2018 09:25 AM IST

Arun Tiwari Arun Tiwari
सीनियर वेब प्रॉड्यूसर, फ़र्स्टपोस्ट हिंदी

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राजनीतिक रण में 'अपनों' पर तलवार चलाने के महारथी हैं केजरीवाल

आरटीआई एक्टिविस्ट के तौर पर खुद को स्थापित करने और रैमन मैग्सेसे पुरस्कार पाने के बाद अन्ना आंदोलन से मिली लोकप्रियता में जितने लोग अरविंद केजरीवाल के साथ दिखते थे वो धीरे-धीरे कम होते चले गए हैं. अन्ना आंदोलन की याद जिनके भी दिमाग में तारी है उन्हें आमरण अनशन के दौरान अन्ना के बगल में बैठे अरविंद केजरीवाल उस वक्त भी प्रभावी लगते थे. आंदोलन का चेहरा भले ही अन्ना हों लेकिन पर्दे के पीछे पूरा काम खुद अरविंद केजरीवाल के इशारों पर ही होता था. उस मूवमेंट के दौरान कभी भी राजनीति में आने की बातें नहीं होती थीं.

खुद अन्ना अरविंद केजरीवाल के राजनीति में आने के कदम के पक्षधर नहीं थे. लेकिन आंदोलन के दौरान ही एक दिन अरविंद केजरीवाल ने कहा अगर केंद्र में बैठी यूपीए सरकार चाहती है कि हम चुनाव के मैदान में आएं तो, हम तैयार हैं. और यहीं से केजरीवाल की जिंदगी में 'अपनों' को किनारे करने पहला काम शुरू हुआ. अन्ना से मनमुटाव की शुरुआत वहीं से होती है. अपने अकेले के नाम पर यूपीए की भ्रष्टाचारी सरकार के खिलाफ पूरे देश के युवाओं को साथ बटोर लेने वाले अन्ना इतने बदनसीब निकले कि उन्हें पार्टी के 'मार्गदर्शक मंडल' में भी जगह नहीं मिली.

2013 के आखिरी महीनों में हुए दिल्ली विधानसभा चुनावों में जब अरविंद केजरीवाल को बहुमत नहीं मिला तो उन्होंने जनता से राय लेकर उसी कांग्रेस के साथ मिलकर सरकार बना ली जिसके खिलाफ वो पूरा आंदोलन किया था. अन्ना आंदोलन के सिद्धांतों की तिलांजलि तो उसी दिन हो गई थी.

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फिर अन्ना हाशिए पर चले गए और अरविंद केजरीवाल उसी शख्स को भूल गए जिसकी बदौलत उन्हें इतनी कामयाबी मिली थी. क्या कोई कल्पना भी कर सकता है कि अन्ना आंदोलन के बगैर अरविंद केजरीवाल का राजनीतिक वजूद इतना बड़ा हो सकता था? फर्ज कीजिए अरविंद केजरीवाल बिना अन्ना आंदोलन के दिल्ली के चुनावी दंगल में उतर गए होते तो क्या पहले ही चुनाव में उनकी 28 सीटें आ पाई होतीं! शायद नहीं.

28 दिसंबर 2011 की तस्वीर. तब मुंबई के बांद्र कुर्ला कॉम्प्लेक्स ग्राउंड में अन्ना हजारे ने जन लोकपाल बिल के लिए अनशन किया हुआ था. तत्कालीन यूपीए सरकार ने लोकसभा में भ्रष्टाचार विरोधी बिल पास कर लोकपाल बनाने की दिशा में एक कदम बढ़ाया था. इसके बाद अन्ना ने अपना अनशन तोड़ा था. उनके साथ मंच पर मौजूद अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया. (रायटर इमेज)

28 दिसंबर 2011 की तस्वीर. तब मुंबई के बांद्रा कुर्ला कॉम्प्लेक्स ग्राउंड में अन्ना हजारे ने जन लोकपाल बिल के लिए अनशन किया हुआ था. तत्कालीन यूपीए सरकार ने लोकसभा में भ्रष्टाचार विरोधी बिल पास कर लोकपाल बनाने की दिशा में एक कदम बढ़ाया था. इसके बाद अन्ना ने अपना अनशन तोड़ा था. उनके साथ मंच पर मौजूद अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया. (रायटर इमेज)

योगेंद्र यादव, प्रो आनंद कुमार बने दूसरा शिकार 

49 दिनों की सरकार और 'आदर्श पुरुष' को किनारे करने के बाद केजरीवाल की तंद्रा टूटी और उन्होंने बिना जनता से पूछे इस्तीफा दे दिया. मतलब उस जनता को भी किनारे कर दिया जिससे पूछकर सत्ता हासिल की थी. बाद में लगा कि गलती हो गई तो करीब साल भर बाद हुए विधानसभा चुनावों में जनता से जाकर माफी मांगी. लोगों से कहा मुझसे गलती हो गई. दूसरी बार प्रचंड बहुमत की सरकार आई तो अब उन्हें किनारे किए जाने की बारी थी जिन्होंने बौद्धिक हलकों में अरविंद केजरीवाल को जगह दिलाई थी.

इनमें पार्टी के फाउंडर मेंबर और वरिष्ठ नेता योगेंद्र यादव, आनंद कुमार और प्रशांत भूषण शामिल थे. इन नेताओं को सिर्फ पार्टी से बाहर नहीं किया गया बल्कि मीडिया में चले एक कथित ऑडियो टेप के मुताबिक अरविंद केजरीवाल ने इनके लिए अपशब्द तक कहे थे. जिन लोगों ने अन्ना आंदोलन के समय से पार्टी को खड़ा करने और अरविंद केजरीवाल को एक चेहरे के तौर पर पेश करने में पूरी मदद की थी वो मुंह ताकते रह गए.

कुछ दिनों के भीतर इन नेताओं की हैसियत पार्टी के वरिष्ठ नेता से निष्कासित नेता की हो गई. राजनीति में अपनों को किनारे लगाने का ये अरविंद केजरीवाल का दूसरा बड़ा निर्णय था. इस निर्णय के बाद अरविंद केजरीवाल की बौद्धिक हल्कों में काफी भर्त्सना भी की गई. ये बात उस समय की है जब अरविंद को राजनीति में आए कुल जमा डेढ़ साल भी नही गुजरे थे.

जनलोकपाल बिल तैयार करनेवाले प्रशांत भूषण को किया दरकिनार 

प्रशांत भूषण तो वो व्यक्ति थे जिन्होंने अरविंद के साथ वो जनलोकपाल बिल भी तैयार किया था जिसके बूते पूरा अन्ना आंदोलन खड़ा हुआ. यही नहीं प्रशांत भूषण के पिता और पूर्व कानून मंत्री शांति भूषण ने तो पार्टी की स्थापना के साथ 1 करोड़ रुपए की पहली मदद की थी. लेकिन राजनीतिक मतभेदों की वजह से सारे संबंध ताक पर रख दिए.

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2015 के दिल्ली विधानसभा चुनाव में प्रचंड जीत ने अरविंद केजरीवाल के भीतर राष्ट्रीय नेता बनने की चाहत कुलांचे मारने लगी. करीब एक साल के भीतर ही आम चुनाव सिर पर आ गए थे और अरविंद केजरीवाल फिर एक बार उस जनता को किनारे करके जिसने उन्हें सीएम बनाया था लोकसभा की लड़ाई लड़ने निकल पड़े. लोकसभा के चुनाव में देशभर की करीब चार सौ से ज्यादा सीटों पर आम आदमी पार्टी ने अपने उम्मीदवार खड़े किए. अरविंद केजरीवाल खुद वाराणसी से चुनाव लड़ने बीजेपी उम्मीदवार नरेंद्र मोदी के सामने खड़े हो गए.

इसी चुनाव में अमेठी से सीट से राहुल गांधी के सामने कुमार विश्वास लड़ रहे थे. चुनाव प्रचार पर निकलने से पहले कुमार विश्वास ने मीडिया से कहा था कि हम चुनाव लड़ने जा रहे हैं और देश से वंशवाद की आखिरी बेल को समाप्त करके लौटेंगे. हालांकि राहुल गांधी के खिलाफ वो चुनाव हार गए लेकिन एक खटास मन में बैठ गई. उनकी मदद के लिए पार्टी को कोई भी बड़ा नेता नहीं पहुंचा. दूसरी तरफ लोकसभा चुनाव में देशभर में खड़े प्रत्याशियों की जमानत जब्त होने के मामले में 'आप' ने रिकॉर्ड बनाया.

2014 के लोकसभा चुनाव में वाराणसी में चुनाव प्रचार के दौरान अरविंद केजरीवाल. (रायटर इमेज)

2014 के लोकसभा चुनाव में वाराणसी में चुनाव प्रचार के दौरान अरविंद केजरीवाल. (रायटर इमेज)

उसके बाद कई बार कुमार विश्वास के गुस्से का दौर चला. फिर हर कुछ समय बाद कुमार के नाराज होने और पार्टी के भीतर अन-बन की बात सामने आती रहीं. बीच में कुमार विश्वास को लेकर हाई-वोल्टेज ड्रामा हुआ तो उन्हें राजस्थान का प्रभारी बनाकर डैमेज कंट्रोल करने की कोशिश की गई लेकिन राज्यसभा सीट को लेकर विवाद बढ़ा तो अबकी बार नंबर था कुमार विश्वास को किनारे किनारे किए जाने का.

अब आशुतोष किसे कहें अपना दर्द 

मीडिया में अच्छे ओहदे का काम छोड़कर पार्टी से जुड़ने वाले आशुतोष भी राज्यसभा के लिए जगह नहीं बना सके. उनकी स्थिति और भी बुरी है. कुमार विश्वास के पास राजनीति से इतर भी अपना बड़ा फैन समूह है जो उनके समर्थन में है लेकिन आशुतोष तो खुलकर बगावत कर सकने की स्थिति में भी नहीं दिखते. वो अपनी कहानी किसे सुनाएं! कुमार विश्वास के पास तो कम से कम कविताएं ट्वीट करने और उसके हजारों रीट्वीट होने का सहारा है.

ऐसा नहीं कि बीच में ये कहानी थम गई थी. कपिल मिश्रा से लेकर सुच्चा सिंह छोटेपुर तक की पंजाब में कहानी चली. सब किनारे होते चले गए. अन्ना आंदोलन से निकले नेताओं में अब केजरीवाल के पास गिने-चुने लोग ही साथ रह गए हैं. मालूम नहीं कि अगली बार कौन सा नजदीकी जरा सी बात बुलंद करे और बिल्कुल अंतिम छोर पर नजर आए.

जनलोकपाल आंदोलन का मूल सिद्धांत 'शक्ति का विकेंद्रीकरण' अब धूल-धुसरित हो चुका है. अब पार्टी में सत्ता का एक ही केंद्र है. उसी के पास बैट है, उसी के पास बॉल और वही फील्डर भी. नजदीकियों के पास अब हर शॉट पर  'फिक्स्ड अंपायर' की भांति सिक्सर का इशारा दिखाने के अलावा शायद ही कुछ बचा है.

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