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पीएनबी-मोदी स्कैम: रिज़र्व बैंक से भी हुई है लापरवाही?

अगर आरबीआई घोटाले पर तुरंत कोई कदम उठाने में नाकाम रहती है तो फिर हमें किसी एकीकृत फायनेन्शियल एजेंसी के विकल्प पर सोचना होगा

Updated On: Feb 24, 2018 04:58 PM IST

Rudra Sensarma, Pankaj Singh

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पीएनबी-मोदी स्कैम: रिज़र्व बैंक से भी हुई है लापरवाही?

पंजाब नेशनल बैंक(पीएनबी) में हुए फर्जीवाड़े पर टिप्पणी करने वाले ज्यादातर विद्वानों को अचरज इस बात का है कि आखिर कुछ ठगेरे कर्मचारियों ने 11,400 करोड़ रुपये की निकासी का लेटर ऑफ अंडरस्टैंडिंग(एलओयू) जारी करने का कारनामा कैसे अंजाम दिया. फिलहाल यही मानकर चला जा रहा है कि स्विफ्ट सिस्टम(जिसके जरिए एलओयू का सत्यापन किया जाता है) और बैंक के अपने आईटी सिस्टम(कोर बैंकिंग सिस्टम) के बीच किसी किस्म का तालमेल नहीं था और मामले में इसी कमी का फायदा उठाया गया.

लेकिन हैरत इस बात की है कि इतनी बड़ी कमी और इस कमी की वजह से हुआ फर्जीवाड़ा ऑडिटर्स की आंखों से कैसे ओझल रह गया. रिजर्व बैंक(आरबीआई) तक को सात सालों तक इसकी भनक ना लगी हालांकि आरबीआई का दावा है कि उसने 2016 के अगस्त से बैकों को इसके बारे में गुपचुप आगाह किया था. बैंकों की भाषा में कहें तो यह एक ऑपरेशनल रिस्क(संचालन से संबंधित जोखिम) था और जिन लोगों को इसकी पहचान तथा समाधान का जिम्मा सौंपा गया था उनसे यह दायित्व संभाले ना संभला. जोखिम के संभाल से जुड़े इंतजामात की जिम्मेवारी आखिरकार बैंक के बोर्ड और देश में बैंकिंग की निगरानी करने वाली संस्था की बनती है लेकिन ये दोनों ही संस्थाएं अपने दायित्व के निर्वाह में नाकाम कैसे हुईं?

NEW DELHI, INDIA MAY 3: View of RBI buidling on May 3, 2013 in New Delhi, India. (Photo by Ramesh Pathania/Mint via Getty Images)

बैकिंग व्यवस्था की निगरानी की संस्था के रुप में आरबीआई से कई गलतियां हुईं और वह इन गलतियों का दोषी है. आरबीआई को यह सुनिश्चित करना चाहिए था कि बैंक बैजल समिति के दिशानिर्देशों के अनुरुप रिस्क मैनेजमेंट का खाका तैयार करें और उसके दायरे में रहकर काम करें. भारत में बैंक बिजनेस रिस्क(मिसाल के लिए कर्ज देने से जुड़े जोखिम) पर तो बहुत ज्यादा जोर देते हैं लेकिन ऑपरेशनल रिस्क की बड़ी अनदेखी होती है.

मिसाल के लिए, बैंकों ने अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी तथा सुरक्षा संबंधी इंतजामात के अमल में कोताही बरती है लेकिन आरबीआई ने इसकी अनदेखी की. बैंक की तरफ से ऑपरेशनल रिस्क मैनेजमेंट अगर ठीक तरह से होता तो आईटी सिस्टम के दोषों के बारे में पहले से आगाह किया जाता और इसकी चेतावनी देने की जिम्मेदारी आरबीआई की बनती है. उसे बैंक से कहना चाहिए था कि आईटी सिस्टम के दोष को समय रहते दुरुस्त कर लिया जाय वर्ना बैंक के खिलाफ कार्रवाई की जायेगी.

जानबूझकर करते हैं कोताही

बैंक अपने तय स्विफ्ट सिस्टम और सीबीएस के बीच तालमेल बैठाने में कोताही कर सकते हैं क्योंकि इससे उन्हें एक्सपोर्ट-इम्पोर्ट अकाउंट में रकम का प्रवाह लगातार जारी रखने में सहूलियत होती है और उन्हें लग सकता है कि अंदरुनी तौर पर आजमायी जा रही यह तरकीब किसी के पकड़ में नहीं आयेगी. आरबीआई ने बेशक अपनी फायनेंशियल स्टेबिलिटी रिपोर्ट में इस मुद्दे को उठाया था लेकिन उसने असहयोगी रुख अपनाने वाले बैंकों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की.

स्विफ्ट सिस्टम में किसी लेन-देन को पूरा होने में कई चरणों से गुजरना पड़ता है. इसमें शुरुआती अवस्था संदेश को दर्ज करने की होती है, फिर संदेश का सत्यापन किया जाता है और आखिर में लेने-देन के पूरा होने का साक्ष्य दर्ज करना होता है. लग यही रहा है कि पीएनबी के किसी ठगेरे कर्मचारी ने स्विफ्ट सिस्टम के हर चरण का काम या तो खुद से अंजाम दिया या फिर वह अन्य कर्मचारियों से मिला हुआ था. इसी वजह से वह लेन-देन के सत्यापन से संबंधित जवाबी संदेश को मिटाने में कामयाब रहा और इस क्रम में जो कागजी साक्ष्य(पेपर ट्रेल्स) पैदा हुए उनसे भी निजात पा ली. आरबीआई को यह सुनिश्चित करना चाहिए था कि रकम के लेन-देन में स्विफ्ट सिस्टम के हर मुकाम पर ‘एक्सेस’(पहुंच) नियंत्रित हो और ऐसी हर गतिविधि की पर्याप्त निगरानी हो.

बैंकों अपने बचाव में एक तर्क यह पेश करते हैं कि हमारे ऊपर काम का बोझ ज्यादा है और ऐसे में कई लोगों की जगह कोई एक आदमी लेन-देन संबधी सारी गतिविधियों को अंजाम दे सहूलियत होती है. बेशक काम का बोझ बढ़ता है लेकिन काम को कई चरणों में बांटकर पूरा करना जरुरी है क्योंकि नाकाम रहने की सूरत में(यहां तक कि स्विफ्ट सिस्टम में अगर कोई इंट्री गलत दर्ज हो तब भी) कीमत बहुत ज्यादा चुकानी पड़ सकती है. एक बात यह भी है कि किसी एक दिन में ऐसे एलओयू बहुत ज्यादा नहीं निपटाने होते.

अपने बचाव में बैंकों का दूसरा तर्क है कि हमारे पास विशेषज्ञ कर्मचारियों की कमी है. इस तर्क की आड़ लेकर अहम जिम्मेवारी के काम लगातार सात सालों से पुराने कर्मचारियों से ही करवाये जाते रहे. आईटी सिस्टम को सुरक्षित बनाना तो जरुरी था ही, इसके साथ ही साथ कर्मचारी से जुड़े जोखिम को ‘नो युअर एम्पलाई’ गाइडलाइन्स के तहत परखा जाना चाहिए था. एक शाखा से दूसरी शाखा में या एक पद से दूसरे पद पर कर्मचारियों को नियुक्त करने की पूरी प्रक्रिया पर निगरानी रखी जानी चाहिए थी. चाहे आरबीआई जोर डाले या नहीं लेकिन हर बैंक को अंदरुनी तौर पर ऑपरेशनल रिस्क मैनेजमेंट का फ्रेमवर्क तैयार करना जरुरी है.

आरबीआई बैंक की शाखाओं के दौरे के वक्त ऑन-साइट मॉनिटरिंग के लिए CAMELS फ्रेमवर्क का इस्तेमाल करता है( यह कैपिटल(पूंजी), असेट(संपदा), मैनेजमेंट(प्रबंधन) अर्निंग्स(कमाई), लिक्विटिटी(मौद्रिक तरलता) का संक्षिप्त रुप है). होना ये चाहिए था कि ऑन-साइट निगरानी के वक्त बैंक जिन मामलों में सुरक्षा के लिहाज से अंदरुनी तौर पर कमजोर दिखा उसे लेकर आगाह किया जाता. आरबीआई को इस बात पर जोर देना चाहिए था कि अगर एलओयू जैसे नॉन-फंड बेस्ड गारंटियों में भी निर्धारित सीमा से ज्यादा की रकम दर्ज होती है तो इसके बारे में ऑटोमेटिक एलर्ट जारी होने चाहिए.

आरबीआई के पर्यवेक्षकों को यह भी कहना चाहिए था कि रकम के लेन-देन की शुरुआत करने वाली बैंक की शाखा और रकम के लेन-देन के पूरा होने को दर्ज करने वाली शाखा में इस प्रक्रिया से जुड़े हिफाजती इंतजाम एक-दूसरे से अलग-अलग होने चाहिए. अभी तक यह बात स्पष्ट नहीं हुई है कि बैंक की जो शाखाएं निगरानी से जुड़े हिफाजती इंतजाम का पालन नहीं कर रही थी वहां आरबीआई के पर्यवेक्षकों ने बीते सात सालों में दौरा किया या नहीं.

आरबीआई निगरानी और अंकुश से संबंधित अपने दिशानिर्देश बेशक जारी करते रह सकती है लेकिन इसकी ऑन-साइट मॉनिटरिंग में कमजोरी हो तो फिर बैंकों को दिशानिर्देशों के पालन के लिए कैसे मजबूर किया जा सकता है?

ऑडिट की नाकामी

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यहां एक बात यह भी दिखती है कि ऑडिट मैकेनिज्म(लेखा-परीक्षण) अपने दायित्व के निर्वाह में नाकाम रहा. बैंक के अपने ऑडिटर्स को स्विफ्ट सिस्टम के पेपर ट्रेल्स का मिलान करके देखना चाहिए था, खोजना चाहिए था कि ब्यौरे में कहीं कोई गड़बड़ी तो नहीं है, कोई कड़ी ब्यौरे से गायब तो नहीं दिख रही. जो ऑडिटर्स पिछली ऑडिट के सही होने की परीक्षा करते हैं और जो ऑडिटर्स बाहर से भेजे जाते हैं, दोनों को स्विफ्ट सिस्टम के मार्फत हुए बड़े मोल के जो लेन-देन पर गौर करना चाहिए था.

ऑडिटर्स अपनी भूमिका का ठीक से निर्वाह नहीं कर सके और यह ऑडिट कमिटी ऑफ द बोर्ड यानि एसीबी की नाकामी का एक संकेत है क्योंकि एसीबी का काम अंदरुनी और बाहरी तौर पर होने वाले ऑडिट पर नजर रखना है. एक दिलचस्प तथ्य यह है कि पीएनबी की एसीबी में पांच सदस्य हैं जिसमें दो आरबीआई और सरकार ने मनोनीत किए हैं.

ऑपरेशनल रिस्क मैनेजमेंट के साज-संभाल का जिम्मा बोर्ड या कह लें बोर्ड की रिस्क मैनेजमेंट कमिटी(आरएमसी) का भी है. बैंकों के पर्यवेक्षण के मसले पर बनी बैजल कमिटी ने बैंकों के कारपोरेट गवर्नेंस के मसले पर जो बात कही है, उसपर यहां गौर किया जाना चाहिए. बैजल समिति के मुताबिक बोर्ड की रिस्क कमिटी का एक अध्यक्ष होना चाहिए.

यह अध्यक्ष एक स्वतंत्र निर्देशक के रुप में काम करेगा और बैंक के बोर्ड के अध्यक्ष से अलग होगा. समिति ने यह भी कहा कि रिस्क मैनेजमेंट कमिटी के ज्यादातर सदस्य स्वतंत्र निर्देशक के रुप में होने चाहिए. लेकिन पीएनबी के मामले में हम देखते हैं कि आरएमसी का जिसे अध्यक्ष बनाया गया है वही व्यक्ति बोर्ड के चेयरमैन का पद संभाल रहा है और कमिटी में सात सदस्य हैं जिसमें एक ही स्वतंत्र निर्देशक है और वही एसीबी का भी अध्यक्ष है!

हाल में हुए फर्जीवाड़े के कारण हम यहां उदाहरण के रुप में पीएनबी का जिक्र भले कर रहे हैं लेकिन सरकारी क्षेत्र के ज्यादातर बैंकों में ऑडिट और रिस्क गवर्नेंस स्ट्रक्चर में ऐसी कमियां मौजूद हैं. दरअसल बैजल समिति ने तो कहा यह था कि कारपोरेट गवर्नेंस के सिद्धांत सरकारी बैंकों पर भी समान रुप से लागू होते हं और यह जिम्मेवारी अंकुश और निगरानी रखने वाली संस्था की बनती है कि वह इस सिद्धांतों के अनुपालन को सुनिश्चित करे. लेकिन आरबीआई ने बैंकों को इन सिद्धांतों का उल्लंघन करने दिया और पीएनबी के मामले में तो हम यह देखते हैं कि बोर्ड के सदस्य ने बतौर ह्वीस्लब्लोअर आगाह करते हुए चिट्ठी लिखी थी लेकिन उस चिट्ठी की अनदेखी की गई!

सिस्टम की नाकामी

पीएनबी घोटाला रिस्क गवर्नेंस तथा रिस्क सुपरविजन(बोर्ड और आरबीआई के) की नाकामी का संकेत है, बताता है कि जोखिम से जुड़े प्रबंधन तथा निगरानी का तंत्र कारगर साबित नहीं हुआ. दोषियों की जांच और कानूनी सुनवाई में अभी वक्त लगेगा सो फौरी जरुरत तो यही है कि बैंकिंग व्यवस्था पर लोगों का भरोसा बहाल किया जाय. बोर्ड और सुपरवाइजर की जवाबदेही तय करने के लिए शीर्ष स्तर पर विशेष कदम उठाये जाने चाहिए.

सरकार को सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के प्रशासनिक कामकाज में सुधार के लिए ठोस कदम उठाने चाहिए. चूंकि निजीकरण का विकल्प मौजूद नहीं सो किसी वित्तीय सेवा विभाग की तुलना बैंक होल्डिंग कंपनी बैंकों के गवर्नेंस का काम कहीं ज्यादा बेहतर तरीके से कर सकती है. आरबीआई को चाहिए कि रिस्क-बेस्ड सुपरविजन के जो तरीके बरसों से ठंढ़े बस्ते में पड़े हैं उन्हें वह अमल में लाये और जिन बैंकों और उनकी शाखाओं पर जोखिम ज्यादा है वहां निगरानी का काम गहन और व्यवस्थित तरीके से हो.

अगर आरबीआई घोटाले पर तुरंत कोई कदम उठाने में नाकाम रहती है तो फिर हमें किसी एकीकृत फायनेन्शियल एजेंसी के विकल्प पर सोचना होगा जो वित्तीय बाजार के विभिन्न हिस्सों के बीच रिस्क मैनेजमेंट के एतबार से तालमेल कायम कर पाये. वित्तीय क्षेत्र के लिए बने लेजिस्लेटिव रिफार्म कमीशन की एक सिफारिश यह भी थी लेकिन आरबीआई ने इसका खुलकर विरोध किया था.

मिसाल के लिए मौजूदा मामले पर गौर करें जिसमें सेबी(SEBI) स्टॉक प्राइस में हेर-फेर के लिए गीतांजलि जेम्स के खिलाफ कदम उठाने में नाकाम रहा और आरबीआई पीएनबी में चल रहे फर्जीवाड़े को ना जान सका लेकिन निगरानी रखने वाली इन दोनों संस्थाओं में बेहतर तालमेल मददगार साबित हो सकता था(क्योंकि फर्जीवाड़े से जारी एलओयू का फायदा गीतांजलि जेम्स को भी पहुंचा है). अभी आरबीआई पर बहुत सारे दायित्वों के निर्वाह का भारी बोझ है. उसका ज्यादा ध्यान मौद्रिक नीति तैयार करने और ‘डेट’ तथा ‘फॉरेक्स’ के प्रबंधन पर लगा रहता है. ऐसे में सोचना होगा कि यह केंद्रीय बैंक भारत के बैंकों के नियमन और पर्यवेक्षण की जिम्मेवारी ठीक से निभा सकता है या नहीं ? अच्छा होगा कि पूरे वित्तीय क्षेत्र के लिए एक सुपर-रेग्युलेटर (अधि नियामक) बनाया जाय.

(लेखक द्वय इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट, कोझिकोड(आईआईएम-के) में फैकल्टी मेंबर हैं और दोनों ने बीते वक्त में सेंट्रल बैंकिंग तथा कमर्शियल बैंकिंग के लिए काम किया है)

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