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पीएम के 'न्यू इंडिया' वाले भाषण में नए 'नरेंद्र मोदी' भी नजर आए

भाषण नए भारत के निर्माण की बात कर रहा था, साथ ही साथ उसमें एक नए मोदी के उभार की भी बात थी

Nilanjan Mukhopadhyay Updated On: Mar 15, 2017 10:03 AM IST

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पीएम के 'न्यू इंडिया' वाले भाषण में नए 'नरेंद्र मोदी' भी नजर आए

मौका चुनावी जीत का था और जगह पार्टी मुख्यालय. रविवार के रोज प्रधानमंत्री ने भाषण दिया तो उसकी खबरों में इस बात की तरफ ध्यान खींचा गया कि प्रधानमंत्री का सपना 2022 तक नया भारत बनाकर दिखा देने का है. लेकिन भाषण में एक बात और भी थी. भाषण नए भारत के निर्माण की बात कर रहा था, साथ ही साथ उसमें एक नये मोदी के उभार के भी संकेत थे.

अपने राजनीतिक जीवन में मोदी ने कभी मुख्यमंत्री तो कभी प्रधानमंत्री के रूप में चुनावी जीत की कई रैलियों और बैठकों में भाषण दिया है. लेकिन उनका रविवार के दिन का भाषण रंग और मिजाज में बाकी सारे ही भाषणों से अलग था.

इस भाषण में जोर खुद की शख्सियत पर न था. वो पहले वाली बात ना थी जब प्रधानमंत्री की बातें ‘मैं, मेरा और मुझसे’ के इर्द-गिर्द घूमती थीं. प्रधानमंत्री के भाव नरम थे और अपने बारे में जिक्र वे ‘हम, हमारा, हमसे और हमको’ वाली शब्दावली में कर रहे थे. भाषण में जहां भी सरकार का जिक्र आया तकरीबन हर जगह वह भाजपा सरकार की ही बात थी, मोदी सरकार की नहीं.

नई दौर में नई कहानी

बात सिर्फ भाषण के शब्दों के चयन तक ही सीमित नहीं. भाषण एक और मायने में भी जीत के अवसर पर दिए गए पिछले तमाम भाषणों से अलग था. इसमें 2014 की चुनावी जीत के बाद दिया गया बड़ौदा का भाषण भी शामिल है.

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उस वक्त जैसे ही यह साफ हुआ कि बीजेपी को बहुमत मिल गया है, मोदी ने पार्टी कार्यकर्ताओं को संबोधित करना शुरु कर दिया जबकि पार्टी कार्यकर्ता अभी जीत की तरंग से पूरी तरह उबरे भी नहीं थे. लेकिन मोदी ने इस बार पहले वाली हड़बड़ी नहीं दिखायी. जीत की तरंग को पूरी तरह शांत होने दिया. ऐसे में जब उन्होंने अपना भाषण दिया तो ऐसा नहीं लग रहा था कि वह कोई विजयनाद हो. इसके उलट प्रधानमंत्री अपनी धीर-गंभीर आवाज में बता रहे थे कि अवसर होली का है और तीज-त्यौहार का मौका अपनी कमियों की तरफ देखने का होता है, इन कमियों को दूर करने की कोशिश करनी चाहिए.

दरअसल, उत्तरप्रदेश और उत्तराखंड के जनादेश के बाद उन्हें अपने भीतर झांकने और सोचने की जरुरत है जिन्होंने बीजेपी को वोट नहीं किया या जो चुनाव नतीजों के आने की घड़ी तक मोदी के घनघोर आलोचक बने रहे.

प्रधानमंत्री ने कहा कि विनम्र बनिए और चुनावी जीत को सिर्फ पार्टी की विचारधारा और कार्यक्रम के प्रचार-प्रसार के अवसर के रुप में मत देखिए बल्कि इसे लोगों की सेवा के मौके के रुप में देखिए.

पार्टी के लिए संदेश

अब के समय में राजनीतिक ताकत को निजी उन्नति के एक जरिए के रुप में देखा जाता है लेकिन प्रधानमंत्री ने मानो इसी सोच पर चोट करते हुए पार्टी-कार्यकर्ताओं को साफ-साफ संदेश दिया कि कर्तव्य करना है और फल की चिन्ता नहीं करनी है.

मोदी ने पार्टी की तुलना एक फलदार पेड़ से की और बड़े मार्मिक ढंग से कहा कि जब पेड़ बड़ा होता है, फलों से लद जाता है तो उसकी डालियां झुक जाती हैं. उन्होंने कहा कि जनसंघ के अपने पुराने अवतार और बीते दशकों में नेताओं की कठिन मेहनत के बाद पार्टी अब उस अवस्था में आ चुकी है जब उसमें फल लगने शुरु हुए हैं.

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राजनीतिक ताकत की इस घड़ी में किसी बात पर अड़ियल रुख ना अपनाते हुए नरमी से काम लेना है, सत्ता अपने साथ जिम्मेदारी लाती है और इस जिम्मेदारी को महसूस करते हुए कार्यकर्ताओं को सादगी और विनम्रता का बरताव करना चाहिए. इन मामलों में प्रधानमंत्री को खुद ही अपने आचरण से एक अनुकरणीय उदाहरण पेश करना होगा.

राजनीतिक रुप से सबसे अहम बात प्रधानमंत्री ने यह कही कि सरकार चुनाव के जरिए बहुमत हासिल करने पर बनती है लेकिन एक बार यह मकसद सध जाय तो फिर सरकार सर्वमत से चलायी जानी चाहिए.

मोदी ने बड़े साफ शब्दों में कहा कि बीजेपी की सरकार सिर्फ उन्हीं की नहीं जिन्होंने उसे वोट डाला है बल्कि यह सरकार समान रुप से उन लोगों की भी है जिन्होंने बीजेपी को अपना वोट नहीं दिया. मोदी ने कहा कि 'यह सरकार उन लोगों की भी है जो हमारे साथ चले और उन लोगों की भी जो हमारे विरोध में खड़े थे.'

‘मैं, मेरा और मुझसे’ के सिद्धांत में यकीन करने वाले एक नेता के मुंह से ऐसी बात का निकलना अपने आप में गहरी विनम्रता की सूचना है. लेकिन यह बात फिर कहनी होगी कि इस मोर्चे पर भी मिसाल पेश करने का जिम्मा एक बार फिर से प्रधानमंत्री पर ही है.

आत्मविश्वास से बदला नजरिया

कई मायनों में देखें तो प्रधानमंत्री के इस बदले हुए लहजे के पीछे यह आत्मविश्वास झांक रहा है कि जो बात बिल्कुल दिन के उजाले की तरह साफ है उसे कहने की कोई जरुरत नहीं. पी चिदंबरम से लेकर उमर अब्दुल्लाह तक, विपक्ष के तमाम नेताओं ने अब मोदी के वर्चस्व की बात को मान लिया है.

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वे कह रहे हैं कि फिलहाल मोदी को चुनौती देने वाला दूर-दूर तक नजर नहीं आता. विश्लेषकों और विद्वानों में भी बहुतों को अब यह बात मंजूर है. हालांकि उनमें कुछ अब भी मोदी के वर्चस्व की बात से सहमत नहीं हैं. जनादेश को लेकर अगर कुछ विद्वानों और विश्लेषकों के पेट में मरोड़ उठ रही है तो इसे जायज साबित करने के लिए वे मोदी के अतीत का हवाला देंगे. चूंकि मोदी के शब्दों को जनता अब बिल्कुल ब्रह्मवाक्य समझने लगी है सो यह अच्छा है कि जो लोग बातों की जांच-परख और आलोचना के काम में लगे हैं वे मोदी के कहे में कुछ अगर-मगर जोड़ें.

फिर भी, एक बात तय है. मोदी ने एक तरह से अपने बारे में एक लकीर खींच दी है. इतिहास उनके बारे में फैसला विभेद पैदा करने वाले कदमों से नहीं बल्कि बदलाव की दिशा में उठाये उनके कदमों के आधार पर करेगा. मोदी ने कई दफे कहा है और नोटबंदी के बाद के दिनों में तो बार-बार दोहराया है कि उनकी सरकार गरीबों की दशा सुधारना चाहती है लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि लोगों में मुफ्त की रेवड़ियां बांटी जाएं.

मोदी का विजन

मोदी की इच्छा है कि लोग उन्हें एक ऐसे नेता के रुप में याद करें जो लोगों को ताकत देता है, जिसके पास नयी राहों को खोलने की सलाहियत है. वे बार-बार कहते हैं कि 'आप मेहनत कीजिए, आपके लिए अवसर हम जुटाएंगे.' ठीक इसी तरह, मोदी ने अपने भाषण में मध्यवर्ग की चिन्ताओं पर बात की. उनकी बातें मध्यवर्गीय लोगों को बड़ी मीठी लगेंगी. मोदी ने माना कि मध्यवर्ग को अनुचित ही बोझा उठाना पड़ता है, टैक्स की पूरी प्रणाली मध्यवर्ग के हित के विपरीत खड़ी है.

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मोदी के हिमायतियों में जो लोग बहुसंख्यकवाद के पक्षधर हैं वे मान सकते हैं कि यूपी और उत्तराखंड के जनादेश के बाद उनके लिए बेहद्दी मैदान में मनमानी चौकड़ी भरने की राह खुल गई है. ऐसे चंद लोगों ने तो अभी से कहना शुरु कर दिया है कि यूपी का जनादेश राममंदिर बनाने के लिए मिला है.

मोदी को पिछले अनुभव से सीख लेनी होगी कि इस बार 2014-15 की ‘घर वापसी’ और दादरी की घटना के तुरन्त बाद के समय में उभरे उन्माद की पुनरावृत्ति ना हो क्योंकि इनकी वजह से सरकार का अजेंडा उस वक्त एकदम पटरी से उतरा जान पड़ रहा था. पुराने मोदी ने नये मोदी के लिए मौका जुटाया है कि वे अपने उद्देश्यों को पूरा करें. अब जिम्मा मोदी का बनता है कि वे अपने अजेंडे को पार्टी के चंद अति-उत्साही हिमायतियों के हाथो पटरी से उतरने से बचाए रखें.

(लेखक दिल्ली स्थित पत्रकार और नरेन्द्र मोदी: द मैन तथा सिख: द अनटोल्ड अगोनी ऑफ 1984 के रचनाकार हैं. ट्वीटर हैंडल: @NilanjanUdwin)

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