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नोटबंदी पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का इमोशनल अत्याचार

गोवा के अपने भाषण में प्रधानमंत्री मोदी भावुक हो गए, गला भर आया. आंखें छलछला आईं.

Updated On: Nov 20, 2016 02:15 PM IST

Vivek Anand Vivek Anand
सीनियर न्यूज एडिटर, फ़र्स्टपोस्ट हिंदी

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नोटबंदी पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का इमोशनल अत्याचार

गोवा के अपने भाषण में प्रधानमंत्री मोदी भावुक हो गए, गला भर आया. आंखें छलछला आईं. उन्हें पता था कि पूरा देश उनका यह भाषण सुन रहा है. जापान से लौटते ही उन्हें उन लाखों-करोड़ों लोगों को हौसला देना था, जिन्हें लाइन में लगाकर वह जापान निकल गए थे. ये लोग पिछले चार दिनों से बैंक की कतार में लग रहे हैं. भूखे-प्यासे, नौकरी-धंधा छोड़कर, घर परिवार से टाइम निकालकर, जरूरी कामों को मुल्तवी कर.

जापान में बसे भारतीयों को प्रधानमंत्री नोटबंदी के फैसले के पीछे की वाजिब वजह समझा चुके थे. इस फैसले की परिणाम में होने वाली मुश्किलों को झेलने के लिए जनता का आभार भी जता चुके थे.

नोटबंदी पर इमोशनल अत्याचार

इतना करने के बाद भी उनका बेहद भावुक मगर पूरे उद्वेग, आवेग और आवेश के साथ यह कहना कि “ मैं जानता हूं कि मैंने कैसी-कैसी ताकतों से लड़ाई मोल ली है. वे लोग मुझे जिंदा नहीं छोड़ेंगे. मुझे बर्बाद कर देंगे. क्योंकि उनकी 70 साल की लूट खतरे में है. मैं तैयार हूं.” सवाल यह है कि क्या यह कतार में लगे देश को बिदकने से बचाने की कोशिश नहीं है?

पिछले तीन दिनों से बैंकों में लगी कतार कम नहीं हुई है. दो दिन पहले एटीएम के काम करने के बाद लगा था कि भीड़ छंटेगी. लेकिन खराब एटीएम या बेतहाशा भीड़ के सामने सौ-सौ के नोट उगलकर खाली हो चुके एटीएम ने सौ-पचास के लिए तरस रहे लोगों की मुश्किलें कम नहीं की. अहले सुबह से लेकर देर रात जागकर लोग रुपए के जुगाड़ में लगे हैं. मुश्किलों का कोई छोर नहीं है और उम्मीद जगाने के लिए सिर्फ एक हौसला- सब काले धन के कुबेरों को काबू में करने के लिए किया जा रहा है. लेकिन इस हौसले को लोग कब तक थाम कर रहेंगे. प्रधानमंत्री का ये कहना कि ‘भाइयों मुझे सिर्फ 50 दिन दे दीजिए.’ लोगों के खत्म होते हौसले में उर्जा भरने की कोशिश है. जिसके लिए उन्होंने अपना पूरा जोर लगा दिया.

जोश भरने की कोशिश

भाषण के अंत-अंत तक प्रधानमंत्री मोदी ने अपनी बात का वजन बनाए रखा. भावनाओं के स्तर पर वो कमजोर दिखे या दिखाने की कोशिश की लेकिन हौसले और जज्बे में मजबूती दिखाकर ये संदेश देने की कोशिश की, कि भ्रष्टाचार और काले धन से निपटने में जो मुश्किलें पेश आ रही हैं उसका संभावित या काल्पनिक खतरा उनके ऊपर भी है.

नोटबंदी के बाद का पहली दिन यानि 9 तारीख को बैंक बंद थे. दूसरे दिन यानि 10 तारीख को जब बैंक खुले तो जनता कतारों में लगी मुश्किलों में भी मुस्कुरा रही थी. इसके पीछे का संदेश ये था कि हम तो चार घंटे की मुश्किल से निकल जाएंगे,  लेकिन उनका क्या जो ब्लैक मनी के बूते चार पुश्तों का इंतजाम हो जाने की बेफिक्री में मौज उड़ा रहे थे. यह संदेश सरकार की तरफ से दिया गया था जो पहले दिन जनता के पास स्पष्ट रूप से पहुंचा था. तीसरे दिन यानि 11 तारीख को भी लंबी कतारें कम न हुई. जो लोग आपाधापी से बचकर इत्मिनान से पैसे निकालने के इंतजार में थे, उनकी आशाओं पर वज्रपात हुआ था. लेकिन विपक्ष की तमाम आलोचनाओं के बावजूद वो यह मानने को तैयार न थे कि इस मुश्किल वक्त में सरकार का साथ छोड़ा जा सकता है और वो भी दो चार घंटे की कतार में लगने की दिक्कत की वजह से.

क्या होगा आगे ?

12 तारीख को भी बैंक और एटीएम की हालत ऐसी नहीं हो पाई कि चुस्त-दुरुस्त बैंकिंग व्यवस्था के जरिए वो मामूली झटके को बर्दाश्त करने की अपनी काबिलियत लोगों को दिखा पाती. कतार बढ़ती गई, मुश्किलें कम न हुईं. अफवाहों ने नमक-चीनी से लेकर आटे-दाल की जमाखोरी की हवा बुलंद कर दी. वित्तमंत्री से लेकर बीजेपी अध्यक्ष तक की बात लोगों के बीच पहुंची. लेकिन खुले पैसे नहीं पहुंचे. कालेधन पर रोक जरूरी है. लेकिन दूध-सब्जी से लेकर आटे-दाल और साबुन-सर्फ की किल्लत की कीमत पर ये किसे मंजूर होगी? प्रधानमंत्री का गोवा का भाषण इस आसान से तर्क की धार को खत्म करने की कोशिश है.

इन दिनों सोशल मीडिया पर एक चुटकुला बड़ा वायरल हो रहा था. नोटबंदी के बाद जापान की यात्रा पर निकले पीएम मोदी पर किसी पेशेवर रचनाकार ने तीन लाइनों का छंद दे मारा था- “चिट्ठी न कोई संदेश...लाइन में लगाकर देश...कहां तुम चले गए”. इन लाइनों को सरकार के फैसले से हमदर्दी रखने वाले भी चिपका रहे थे और फैसले का मुखर विरोध करने वाले भी. लेकिन ऐसे बकवास चुटकुले से भी लोग बोर होने लगे हैं. प्रधानमंत्री का भाषण उस बोरियत को दूर करने वाला है.

कब तक देंगे साथ ?

प्रधानमंत्री मोदी ने रुंधे हुए गले से कहा 'मेरे देशवासियों, मैंने घर, परिवार सब कुछ देश के लिए छोड़ा है. मैं कुर्सी के लिए पैदा नहीं हुआ. सिर्फ 30 दिसंबर तक का वक्त चाहिए. एक बार सफाई हो जाती है तो छोटा-मोटा मच्छर भी नहीं आता.'

प्रधानमंत्री मोदी की भरोसा जगाने वाली ऐसी ही बातों से उम्मीद लगाकर लोगों ने पूरा राजपाट उन्हें सौंप दिया. लेकिन कालेधन के मसले पर लोगों का भरोसा पहले भी टूट चुका है. जिसे चुनावी जुमला बताकर एकदम से किनारे कर दिया. अब उसके खात्मे के लिए जनता इतनी बड़ी कुर्बानी दे रही है तो समझिए कि जनता का दिल कितना बड़ा है. लेकिन दूध-सब्जी की किल्लत ऊंचे विचार की लगाम को थाम न ले. पीएम का दिया हौसला सोमवार-मंगलवार तक बरकरार रहे, अब इसी की उम्मीद की जा सकती है.

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