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फूलपुर लोकसभा: यहां लोहिया तो हार गए लेकिन 'छोटे लोहिया' ने बाजी मारी थी

देश को विपक्ष का मतलब सिखाने वाले राम मनोहर लोहिया फूलपुर सीट पर 1962 के चुनाव में जवाहर लाल नेहरू के सामने खड़े हुए थे

Updated On: Feb 16, 2018 08:22 AM IST

FP Staff

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फूलपुर लोकसभा: यहां लोहिया तो हार गए लेकिन 'छोटे लोहिया' ने बाजी मारी थी

11 मार्च 2017 को यूपी विधानसभा चुनाव के नतीजे आने के साथ ही फूलपुर लोकसभा सीट से सांसद केशव प्रसाद मौर्य डिप्टी सीएम बना दिए गए. लोकसभा से विधानसभा की तरफ किए गए उनके रुख की वजह से सीट खाली हो गई. आगामी 11 मार्च को इस सीट पर उपचुनाव होने हैं. इसके अलावा गोरखपुर सीट पर भी उपचुनाव होना है. इस उपचुनाव को 2019 के लोकसभा के मुख्य चुनाव से पहले सेमीफाइनल की तरह देखा जा रहा है. सभी पार्टियों ने इन सीटों पर जीत हासिल करने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा दिया है.

फुलपुर लोकसभा सीट पारंपरिक रूप से हाई-प्रोफाइल सीट मानी जाती रही है. 1952 के पहले लोकसभा चुनाव में इस सीट को देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने चुना. इसके बाद अगले दो चुनाव 1957 और 1962 में भी जवाहर लाल नेहरू यहां से चुनाव जीतते रहे. पहले दो चुनावों में उन्होंने मसुरिया दीन को चुनाव हराया था.

1962 के लोकसभा चुनाव में जवाहर लाल नेहरू के सामने भारतीय समाजवाद के पुरोधा कहे जाने वाले राम महोहर लोहिया चुनाव मैदान में थे. कहा जाता है कि वो चुनाव फूलपुर का अभी तक का सबसे दमदार चुनाव था. आमने-सामने देश के दो धुरंधर नेता थे. हालांकि जवाहर लाल नेहरू के लोहिया वोटों के मामले में टिक नहीं सके और साठ हजार से ज्यादा वोटों से उन्हें हार मिली.

Jawahar Lal Nehru

ये भारतीय लोकतंत्र की मिसाल ही है कि राम मनोहर लोहिया कभी खुद चुनाव नहीं जीत सके लेकिन उनकी विचारधारा को लेकर आगे बढ़े कई नेता सत्ता में लंबे समय तक रहे. राम मनोहर लोहिया को आदर्श मानने वाले मुलायम सिंह यादव राज्य से लेकर केंद्र सरकार में कई पदों पर रहे.

लोहिया ने देश को विपक्ष का मतलब समझाया. पचास और साठ के दशक में जब स्वतंत्रता आंदोलन के बाद आम भारतीय व्यक्ति कांग्रेस से हटकर कुछ भी नहीं सोच सकता था तब लोहिया ने विपक्ष की आवाज बनने का साहस दिखाया.

विपक्ष की आवाज बनने के इस स्वरूप को बाद में लोहिया के शिष्य जनेश्वर मिश्रा ने फूलपुर लोकसभा सीट से साकार किया. वो भी लोहिया की मौत के ठीक दो साल बाद. देश की राजनीति में छोटे लोहिया के नाम से मशहूर जनेश्वर मिश्र ने तब इंदिरा कैबिनेट में पेट्रोलियम मंत्री रहे केडी मालवीय को यहां से हार का स्वाद चखाया था. प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के टिकट पर चुनाव जीतने वाले जनेश्वर मिश्रा की लोहिया को इससे बड़ी श्रद्धांजलि शायद ही सकती हो.

हालांकि जनेश्वर मिश्रा ने यह जीत भी उपचुनाव में ही हासिल की थी. इस जीत के 2 साल बाद 1971 में हुए लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के टिकट पर युवा नेता वीपी सिंह ने जीत हासिल की थी. समय का खेल देखिए जिन इंदिरा गांधी की हवा में उस समय वीपी सिंह फूलपुर चुनाव जीते थे उन्होंने आगे चलकर राजीव गांधी को 1989 में सत्ता से बाहर का रास्ता दिखा दिया.

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