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फूलपुर उपचुनाव: क्या बीजेपी रोक पाएगी साइकिल पर बैठे हाथी की गति?

11 मार्च को उत्तर प्रदेश की फूलपुर लोकसभा में होने वाले उपचुनाव में इस बार लगभग 61 हजार नए मतदाता अपने मताधिकार का प्रयोग करेंगे

Utpal Pathak Updated On: Mar 09, 2018 10:44 AM IST

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फूलपुर उपचुनाव: क्या बीजेपी रोक पाएगी साइकिल पर बैठे हाथी की गति?

फूलपुर का उपचुनाव अब प्रचार के आखिरी दिनों में खासा पेचीदा हो चला है. एक तरफ समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी की लामबंदी ने चर्चाओं के बाजार को गर्म करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है, दूसरी तरफ बाहुबली अतीक अहमद को पैरोल न मिल पाने से बीजेपी की मुस्लिम वोटों के बिखराव की उम्मीद भी खत्म हो चली है.

हालांकि संघ और बीजेपी का शीर्ष नेतृत्व उत्तर प्रदेश की दोनों सीटों पर जीत दर्ज करने के लिए अब भी आश्वस्त दिख रहा है लेकिन अंदरखाने में लगभग सभी को इस बात का अंदाजा है कि गोरखपुर जैसे मजबूत हालात फिलहाल फूलपुर में नहीं हैं.

11 मार्च को उत्तर प्रदेश की फूलपुर लोकसभा में होने वाले उपचुनाव में इस बार लगभग 61 हजार नए मतदाता अपने मताधिकार का प्रयोग करेंगे. मतदाता सूची पुनरीक्षण अभियान के बाद अब फूलपुर लोकसभा में कुल 19.35 लाख मतदाता हैं.

उलटफेर से भरा है फूलपुर का चुनावी इतिहास

फूलपुर सीट पर अब तक सिर्फ दो ही बार उपचुनाव हुए हैं और यह तीसरा उपचुनाव होगा. इस महत्वपूर्ण सीट पर चुनाव हारने वाले दिग्गजों की लिस्ट भी खासी लम्बी है. सबसे पहले 1962 में जवाहरलाल नेहरू को हराने के उद्देश्य से प्रख्यात समाजवादी नेता डॉ. राम मनोहर लोहिया ने इस सीट का चयन किया लेकिन उन्हें हार का  सामना करना पड़ा. उसके बाद 1967 के चुनाव में कट्टर समाजवादी नेता जनेश्वर मिश्र को विजयलक्ष्मी पंडित ने हरा दिया था.

उसके बाद बीएसपी के संस्थापक मान्यवर कांशीराम को भी इसी सीट से हार का सामना करना पड़ा था. अतीक अहमद समेत कपिल मुनि करवरिया जैसे बाहुबलियों ने भी इसी सीट से हार का स्वाद चखा है. लिहाजा यह कह पाना बहुत मुश्किल है कि इस बार कौन जीतेगा. हालांकि, इस बार कोई भी उम्मीदवार वरीयता के अनुसार बहुत कद्दावर  नहीं है, लेकिन उनके पीछे खड़े उनके पैरोकारों और उनके दलों के वरिष्ठ नेताओं की साख जरूर इस सीट के लिये फंसी हुई है.

सांकेतिक गठबंधन बनाम राजनैतिक गठबंधन

जैसे ही बीएसपी ने दोनों सीटों के उपचुनावों में एसपी को समर्थन देने की औपचारिक घोषणा की, उसके तुरंत बाद से ही बीजेपी के नेताओं की ओर से बयान जारी होने लगे. बीजेपी की तरफ से इस बात का विशेष ध्यान रखा गया कि उनका हर वरिष्ठ नेता इस गठबंधन को हतोत्साहित करता रहे. प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी इस गठबंधन को लेकर कटाक्ष किया और उनका अनुकरण करते हुए लगभग हर वरिष्ठ नेता ने अपने अपने स्तर से इस गठबंधन का विरोध किया.

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हालांकि, बीजेपी के इस हंगामे के राजनैतिक निहितार्थ अभी से निकालना थोड़ी जल्दबाजी होगी क्योंकि बीएसपी सुप्रीमो के आदेशानुसार उनके शीर्ष नेतृत्व ने पहले से स्पष्ट किया है कि न तो वे एसपी के साथ मंच साझा करेंगे और न ही इस गठबंधन से आगामी लोकसभा चुनावों के निहितार्थ निकाले जाएं. मायावती ने भी साफ कहा है कि राज्यसभा चुनाव में बीएसपी को एसपी का समर्थन मिलेगा और इसके बदले बीएसपी भी एसपी की विधान परिषद चुनावों में मदद करेगी.

बीएसपी ने अब तक नहीं खोले हैं पत्ते

बीएसपी ने एक तीर से कई निशाने लगाने के क्रम में एक नपा-तुला कदम उठाया है. एक तरफ राज्यसभा चुनाव में एक सीट लेने की मजबूरी है और दूसरी तरफ 2019 की हवा को समझने के क्रम में अपने धुर विरोधी को दो उपचुनावों में समर्थन देना भी एक तात्कालिक समझौता है. बीएसपी की मुखिया मायावती ने इस अघोषित समर्थन को चुनावी गठबंधन से अलग बताते हुए यह स्पष्ट भी किया कि 'उत्तर प्रदेश में हाल ही में राज्यसभा और विधानपरिषद में होने वाले चुनाव में बीजेपी को हराने के लिये ही बीएसपी और एसपी द्वारा एक दूसरे को वोट ट्रांसफर किया जा रहा है तो ये कोई चुनावी गठबंधन नहीं है.'

Mayawati

आंकड़ों की जमीनी हकीकत

इस सीट पर आंकड़ों का गणित भी कुछ कम पेचीदा नहीं है, 2014 के चुनाव में बीजेपी को इस सीट से 5 लाख 3 हजार और 564 वोट मिले थे. वहीं एसपी को 1 लाख 95 हजार 256 और बीएसपी को 1 लाख 63 हजार 710 वोट मिले थे.  ऐसे में एसपी-बीएसपी के वोट आपस में जोड़ने के बावजूद भी बीजेपी के पास 1 लाख 44 हजार 598 वोट अधिक होते हैं. ऐसे में राजनैतिक विश्लेषकों द्वारा दी जा रही यह दलील कि 2017 विधानसभा चुनाव में एसपी को 28 प्रतिशत और बीएसपी को 22 प्रतिशत वोट मिले थे और  दोनों के वोटों के प्रतिशत को जोड़ लिया जाए तो कुल 50 प्रतिशत वोट हो जाता है जो बीजेपी के लिए कठिन  चुनौती है.

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लेकिन प्रदेश की अलग-अलग सीटों पर जिस तरह अलग-अलग समीकरण बन रहे हैं और जिस प्रकार कांग्रेस उत्तर प्रदेश में खोखली होती जा रही है ऐसे में विपक्ष को बीजेपी के विरोध में एकजुट होकर भी हर जगह से लाभ नहीं मिल पाएगा क्योंकि पूरे प्रदेश के कुल वोटों के प्रतिशत को जोड़ देने मात्र से अगर जीत मिलती तो शायद पिछले विधानसभा चुनावों में एसपी-कांग्रेस गठबंधन को हार का सामना न करना पड़ता.

लखनऊ के उच्च पदस्थ सूत्र बताते हैं कि इस गठबंधन या समर्थन के बाबत मायावती और अखिलेश यादव के बीच कोई सीधा संवाद भी नहीं हुआ था और रामगोपाल यादव- सतीश चंद्र मिश्र के स्तर पर बातें तय होने के बाद इसका औपचारिक ऐलान दोनों पार्टियों के प्रमुखों द्वारा अलग-अलग समय पर किया गया.

क्या हो सकता है विपक्ष की जीत का फार्मूला?

फूलपुर के उपचुनाव में कांग्रेस की तरफ से कुछ खास लामबंदी नहीं दिखाई दे रही है, सिर्फ इस लोकसभा क्षेत्र के ब्राम्हण वोटों की संख्या के आधार पर ब्राह्मण प्रत्याशी उतारकर कांग्रेस न जाने किस दिवास्वप्न को लेकर आश्वस्त है, उसके बाद बीएसपी जैसे मजबूत जातीय आधार वाले दलों समेत लोकदल जैसे छोटे दलों की कांग्रेस से दूरी ने घाव को और गंभीर बना डाला है. ऐसे में कांग्रेस को भी बुद्धिमानी दिखाते हुए दोनों उपचुनावों में एसपी-बीएसपी के साथ मिल जाना चाहिए था लेकिन एसपी और बीएसपी अब कांग्रेस से कोई सीधी सांठगांठ करने के मूड में नहीं दिख रहे.

Modi-Rahul-Akhilesh-Mayawati

लखनऊ में वरिष्ठ पत्रकार डा योगेश मिश्र बताते हैं, 'अब का फूलपुर वीपी सिंह का फूलपुर नही है और न ही ये नेहरू गांधी परिवार का है, अब का फूलपुर बीजेपी का है और यहां से प्रदेश के उपमुख्यमंत्री का नाम जुड़ा हुआ है, वोटों के प्रतिशत वाले गणितीय आकंड़ें जमीनी सच्चाई से आज भी परे हैं, और ऐसे में बीजेपी को आसानी से यहां हरा पाना संभव नहीं. समग्र विपक्ष की परिकल्पना उत्तर प्रदेश में अब भी एक दूर की कौड़ी है और इसके लिए एक समान राय बना पाना विपक्ष के लिए अब भी दुश्कर है. चुनाव मैथमेटिक्स के आधार पर नहीं, बल्कि केमिस्ट्री के आधार पर लड़े जाते हैं, ऐसे में हाशिए पर जा चुके दो दलों को समझौते का मौका मिला है और इस मौके को प्रतिशत के आधार पर समझौता कहना भी समझदारी नहीं है.'

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बहरहाल बीजेपी समेत सभी दलों ने फूलपुर में अपने वरिष्ठ नेताओं को प्रचार के आखिरी दो दिनों लिए मैदान में उतार दिया है और लोकसभा क्षेत्र में चर्चाओं का बाजार अब भी गर्म है,  सोशल मीडिया और अन्य प्रचार माध्यमों के साथ परंपरागत तरीकों से भी मतदाताओं को लुभाने के प्रयास जारी हैं. ऐसे में जनादेश किसको मिलेगा यह तो 13 मार्च को तय होगा लेकिन उसके पहले तक फूलपुर की फ़िज़ा में बहुत कुछ घुल चुका होगा. इस अप्रत्याशित सीट के परिणाम आने के बाद शायद प्रदेश  की राजनीति में कुछ नया देखने को मिलेगा जिसकी आस लगाकार सत्ता पक्ष समेत विपक्ष भी बैठा हुआ है.

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