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राम की तस्वीर जलाने वाले पेरियार चाहते थे द्रविड़ों के लिए अलग देश

त्रिपुरा में लेनिन की मूर्ति गिराए जाने के बाद बीजेपी नेता ने फेसबुक पोस्ट में पेरियार को जातिवादी बताया था और कहा था कि अब पेरियार की मूर्तियों के टूटने का नंबर है

Abhishek Tiwari Abhishek Tiwari Updated On: Mar 07, 2018 11:16 AM IST

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राम की तस्वीर जलाने वाले पेरियार चाहते थे द्रविड़ों के लिए अलग देश

त्रिपुरा में रूसी क्रांति के जनक रहे लेनिन की मूर्ति को बुलडोजर से तोड़ दिया गया था. इस घटना की चर्चा अभी चल ही रही थी कि तमिलनाडु के वेल्लोर में ईवी रामास्वामी 'पेरियार' की मूर्ति को नुकसान पहुंचाने की कोशिश की गई.

लेनिन की मूर्ति गिराए जाने के बाद तमिलनाडु के बीजेपी नेता एच राजा ने एक फेसबुक पोस्ट लिखा था जिसमें उन्होंने पेरियार को जातिवादी बताया था और कहा था कि लेनिन के बाद अब पेरियार की मूर्तियों के गिराए जाने का नंबर है. आलोचनाओं के बाद उन्होंने अपने फेसबुक पोस्ट को हटा दिया था.

बीजेपी नेता द्वारा जातिवादी बताए गए पेरियार आखिर कौन थे और उनका नाम तमिल राजनीति में क्या महत्व रखता है या देश के दलित राजनीति की जब भी चर्चा होती है तो उनका नाम कुछ नेताओं के साथ लिया जाता है. आइए जानते हैं पेरियार थे कौन.

17 सितंबर 1879 को तमिलनाडु के इरोड जिले के एक संपन्न परिवार में पैदा हुए इरोड वेंकट रामासामी को द्रविड़ राजनीति का जनका कहा जाता है. इसके अलावा उन्हें सामाजिक कार्यकर्ता और आत्मसम्मान आंदोलन शुरू करने वाले के तौर पर भी जाना जाता है.

ईवी रामासामी को पेरियार के तौर पर भी जाना जाता है. या यू कहें कि उनका नाम ही अब पेरियार हो गया है. दरअसल, तमिल में पेरियार का अर्थ होता है सम्मानित व्यक्ति.

कांग्रेस से अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत करने वाले पेरियार ने कांग्रेस से सिर्फ इसलिए नाता तोड़ लिया था क्योंकि उन्हें लगता था कि कांग्रेस में ब्राह्मणों को ज्यादा तरजीह दी जा रही है और गैर ब्राह्मणों के साथ भेदभाव किया जा रहा है. कहा जाता है कि कांग्रेस छोड़ने के पीछे और भी कई कारण थे लेकिन उनके मन में गैर ब्राह्मणों के साथ हो रहे भेदभाव का असर कुछ ज्यादा हो गया था.

दक्षिण भारतीय राज्यों को मिलाकर एक अलग देश बनाने की थी मांग

कांग्रेस से नाता तोड़ने के बाद उन्होंने ब्राह्मण विरोध के नाम पर 1916 में बनी जस्टिस पार्टी में शामिल हो गए. 1940 में जस्टिस पार्टी ने दक्षिण भारत के राज्यों को मिलाकर द्रविड़नाडु की मांग की थी.

Photo Source: ANI

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कहा जाता है कि पहले ये मांग सिर्फ तमिलभाषी क्षेत्रों के लिए थी, लेकिन बाद में द्रविड़नाडु में आंध्र प्रदेश, केरल, कर्नाटक, ओडिशा और तमिलनाडु को भी शामिल करने की बात कही गई.

कुल मिलाकर सोच यह थी कि दक्षिण भारत के राज्यों को मिलाकर एक अलग देश की मांग की जाए. उनकी सोच थी कि जो नया देश बनेगा उसका नाम होगा द्रविड़नाडु. द्रविड़नाडु का मतलब होता है द्रविड़ों की भूमि.

आपको अगर याद हो तो पिछले ही साल पूरे दक्षिण भारत में द्रविड़नाडु सोशल मीडिया खासकर ट्विटर पर ट्रेंड कर रहा था. इस ट्रेंड के पीछे भी देश को बांटने वाली मानसिकता ही थी.

मतभेदों के कारण अन्नादुराई ने छोड़ दिया था साथ

अब लौटते हैं उनकी जस्टिस पार्टी पर. पेरियार की पार्टी में उनके साथ अन्नादुराई भी थे. दोनों के कई विचार आपम में मिलते नहीं थे. पेरियार एक अलग तमिल देश या द्रविड़ देश बनाने की मांग कर रहे थे जबकि वहीं उन्हीं के पार्टी के उनके खास सदस्य अन्नादुराई को भारत के साथ रहने में कोई समस्या नहीं थी.

दोनों के विचार अलग थे सो साथ ज्यादा दिन चल नहीं पाया और अन्नादुराई ने 1949 में एक अलग पार्टी बना ली. पार्टी का नाम रखा द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (डीएमके). वहीं डीएमके जो आज करुणानिधि के पार्टी के तौर पर जानी जाती है. द्रविड़ राजनीतिक की आड़ में शुरू हुई पार्टी सिर्फ एक एक परिवार तक सिमट कर रह गई है और पेरियार की जस्टिस पार्टी सिर्फ इतिहासों का हिस्सा.

ब्राह्मण विरोध, राम विरोध और हिंदी विरोध रहा मुख्य उदेश्य

पेरियार को ब्राह्मण और ब्राह्मण सोच से खासी दिक्कत थी. इसकी चर्चा हम पहले भी कर चुके हैं. उनका विरोध सिर्फ ब्राह्मण तक ही नहीं था बल्कि वो राम और हिंदी के भी विरोधी थे.

1937 में जब मद्रास प्रेसिडेंसी के मुख्यमंत्री सी गोपालाचारी ने स्कूलों में हिंदी को अनिवार्य करने की घोषणा की तो पेरियार इसके विरोध में उतर आए. अपने पार्टी के अन्य लोगों के साथ पेरियार ने हिंदी विरोध का आंदोलन खड़ा कर दिया. यह आंदोलन उनकी गिरफ्तारी के बाद खत्म हो गया.

1955 में पेरियार ने भगवान राम की सार्वजनिक तौर पर तस्वीर जलाई थी. इस मामले में उन्हें गिरफ्तार भी किया गया था. उनका कहना था कि रामायण में द्रविड़ों को आर्यों से नीचा दिखाया गया है.

खुद के नाम में शामिल राम को ध्यान से हटाकर उन्होंने सिर्फ राम और रामायण का विरोध ही नहीं किया बल्कि भगवान कृष्ण की तस्वीरों पर जूता भी चलाया.

जीवन भर विरोध की राजनीति करने वाले और द्रविड़ राजनीति के जनक रहे पेरियार ने 1973 में दुनिया को अलविदा कह दिया था. अब पेरियार का नाम वोट मांगने और सांकेतिक राजनीति करने के काम आता है.

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