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राहुल जितना बोलेंगे, कांग्रेस में उतना ही जलजला आएगा: रविशंकर

केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कहा, लोगों ने पूरे दिल से नोट बंदी का समर्थन किया है

Updated On: Dec 15, 2016 09:16 AM IST

Sanjay Singh

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राहुल जितना बोलेंगे, कांग्रेस में उतना ही जलजला आएगा: रविशंकर

केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद के पास दो अहम मंत्रालयों की जिम्मेदारी है. वो कानून मंत्री भी हैं और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय भी उनके पास है.

कानून मंत्री के तौर पर उनके सामने इस वक्त की सबसे बड़ी चुनौती है कार्यपालिका बनाम न्यायपालिका की बहस में संतुलन बनाये रखने की.

साथ ही अच्छे वक्ता होने के नाते उनसे यह भी उम्मीद की जाती है कि तमाम मसलों पर वो विपक्ष को करारा जवाब दें और जनता के बीच पार्टी की राय ठीक से रखें.

फ़र्स्ट पोस्ट को दिए एक इंटरव्यू में रविशंकर प्रसाद ने नोटबंदी, कार्यपालिका के काम में न्यायपालिका के दखल, तीन तलाक और जजों की नियुक्ति समेत तमाम मसलों पर खुलकर अपनी बात रखी.

सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से पूछा था कि नोट बंदी को लेकर सरकार के पास कोई योजना थी भी या नहीं. क्या सरकार को इस बात का अंदाजा था कि सर्वोच्च न्यायालय नोटबंदी पर ऐसा कड़ा रुख अपना सकता है?

सुप्रीम कोर्ट में अटार्नी जनरल सरकार का पक्ष रख रहे हैं. ऐसे में मेरे लिए इस मुद्दे पर कुछ कहना ठीक नहीं होगा, क्योंकि मामला अदालत के सामने है.

न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच टकराव अब आम बात हो गई है. कानून मंत्री के तौर पर आप इसे कैसे देखते हैं?

हमारी पार्टी न्यायपालिका की आजादी की पक्षधर है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृ्त्व वाली हमारी सरकार में राजनाथ सिंह जी, सुषमा स्वराज जी, अरुण जेटली जी और वेंकैया नायडू जी के अलावा खुद मैंने युवा कार्यकर्ता के तौर पर इमरजेंसी के खिलाफ लड़ाई लड़ी थी.

मैंने खुद जयप्रकाश नारायण के आंदोलन से अपने राजनैतिक जीवन की शुरुआत की थी. बिहार में हमने जेपी की अगुवाई में बहुत पहले ही आंदोलन शुरू कर दिया था. इमरजेंसी के खिलाफ लड़ाई में हमने तीन मुद्दों पर जोर दिया था. ये मुद्दे हैं- व्यक्ति की निजता की आजादी, मीडिया की आजादी और न्यायपालिका की स्वतंत्रता.

न्यायपालिका ने जजों की नियुक्ति में देरी पर नाराजगी जताई है...

SupremeCourtofIndia

(बीच में ही टोकते हुए) मैं उसी मुद्दे पर आ रहा हूं. हम ऐसी सरकार के सदस्य हैं, जिन लोगों ने न्यायपालिका की आजादी के लिए कष्ट झेले.

लेकिन आपको पूरे मुद्दे को व्यापक तौर पर देखना होगा. भारत को आजाद हुए 70 साल हो चुके हैं.

कुछ संवैधानिक मुद्दों पर स्थिति साफ हो चुकी है. भारत में शासन लोकतांत्रिक तरीके से चुनी हुई सरकार चलाएगी. चुनाव निष्पक्ष होने चाहिए. जनता को मालूम है कि उसके पास किसी भी सरकार को हटाने का अधिकार है.

व्यक्तिगत आजादी, मीडिया की निष्पक्षता और अभिव्यक्ति की आजादी हमारे देश में सर्वमान्य है. इसमें कोई दखल नहीं दे सकता. हां कुछ संवैधानिक पाबंदियां जरूर हैं. रही बात न्यायपालिका की तो उसे कार्यपालिका के फैसलों की समीक्षा का अधिकार है.

यानी वो सरकार के किसी भी आदेश की समीक्षा कर सकते हैं. उसे सही ठहरा सकते हैं, उसे गलत करार देकर रद्द कर दे सकते हैं. या फिर उसमें बदलाव के लिए भी आदेश दे सकते हैं.

लेकिन, संविधान की एक मर्यादा है. इस बारे में संविधान दिवस पर मैंने अपनी राय रखी थी. शासन चलाने का काम देश की चुनी हुई सरकार पर छोड़ दिया जाना चाहिए. इसी तरह कानून बनाने का काम देश के चुने हुए प्रतिनिधियों के ऊपर छोड़ दिया जाना चाहिए. ये संवैधानिक बंटवारा भी एकदम साफ है

आपने तो बहुत अहम बात कही...क्या इसका मतलब ये है कि न्यायपालिका की हदें तय हैं और उसे उस दायरे में रहने की बात समझनी चाहिए?

मैं इस मुद्दे पर इससे ज्यादा कुछ नहीं कहना चाहता.

हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने उच्च न्यायालयों को कहा कि वो कार्यपालिका और विधायिका के काम में दखल न दें. भारत के संविधान के जानकार और कानून मंत्री के तौर पर क्या आपको लगता है कि कार्यपालिका के काम में न्यायपालिका के दखल से तनाव बढ़ रहा है?

इस बारे में सुप्रीम कोर्ट खुद ही वक्त वक्त पर निर्देश देता रहा है. इलाहाबाद हाई कोर्ट के मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने खुद ही कहा कि आप कानून बनाने की कोशिश मत कीजिए.

मैं ये बात माननीय न्यायालय पर छोड़ता हूं. हमें न्यायपालिका पर पूरा भरोसा है. लेकिन हम संस्थागत स्वायत्तता के भी पक्षधर हैं. लोकतांत्रिक व्यवस्था में सबके अधिकार क्षेत्र तय हैं. हम सब उसका सम्मान करते हैं.

और मैं ये बात इसलिए कह रहा हूं कि आपको पता है कि हमने कैसे चारा घोटाले के खिलाफ लड़ाई लड़कर सरकारी खजाना लूटने वाले दोषियों की जिम्मेदारी तय की.

ऐसा ही हमने अलकतरा घोटाले में भी किया. हम माननीय सर्वोच्च न्यायालय को अच्छे से समझते हैं. मैं न्यायपालिका का बहुत आदर करता हूं. लेकिन संवैधानिक व्यवस्था को हम सबको स्वीकार करना होगा.

जजों की नियुक्ति पर मुख्य न्यायाधीश भावुक होकर रो पड़े थे...

(बीच में ही टोकते हुए)-मैं इस मुद्दे पर संक्षेप में दो या तीन बातें कहना चाहूंगा. हमने राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग बनाने का कानून बनाया.

संसद के दोनों सदनों ने सर्वसम्मति से इसे मंजूरी दी. आधे से ज्यादा राज्यों की विधानसभाओं ने भी इस पर मुहर लगाई. किसी ने इसका विरोध नहीं किया. लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इसे रद्द कर दिया. हम उनके आदेश का सम्मान करते हैं.

मैं दो बातें कहना चाहूंगा. 1990 से हर साल औसतन 80 जज नियुक्त किए जाते हैं. लेकिन 2016 में हमने 125 जज नियुक्त किए.

जो पिछले 26 सालों में सबसे ज्यादा है. इससे पहले एक साल में सबसे ज्यादा जजों की नियुक्ति का रिकॉर्ड 2013 में 121 जजों का था.

फिर दिक्कत कहां है?

हमने सुप्रीम कोर्ट में चार जज नियुक्त किए हैं और 124 एडिश्नल जजों के नाम पर मुहर लगाई है.

बहुत से उच्च न्यायालयों के चीफ जस्टिस भी नियुक्त किए गए और बदले गए हैं. 30 जून 2016 तक जिला अदालतों में 4937 पद खाली हैं. इसमें न तो केंद्र और न ही राज्य सरकार का कोई रोल है.

एक सीनियर पत्रकार होने के नाते आपको पता होगा कि निचली अदालतों में नियुक्ति हाई कोर्ट करते हैं, या फिर उनके सुझाव पर लोक सेवा आयोग ये नियुक्तियां करते हैं.

हाई कोर्ट में खाली पड़े 430 पदों में से 280 के लिए हमारे पास कोई सुझाव न्यायपालिका की तरफ से नहीं आए हैं. जब हाई कोर्ट हमें नामों के सुझाव देंगे, हम उन पर अपनी राय देंगे. मैं आपको यकीन दिला दूं कि हम ये काम जल्द से जल्द करने की कोशिश करेंगे.

जब माननीय सुप्रीम कोर्ट ने नेशनल जुडिशियल अपाइंटमेट कमीशन को रद्द किया था, तो अपने आदेश में अदालत ने कॉलेजियम सिस्टम में भी सुधार की जरूरत बताई थी. क्योंकि इसमें पारदर्शिता की कमी है.

जजों की नियुक्ति में पक्षपात मुक्त माहौल की जरूरत है. जिसमें हम निष्पक्ष और काबिल लोगों की नियुक्ति करें. ये सभी बातें अदालत के 15 दिसंबर के आदेश में कही गई हैं. उन्होंने हमसे कहा था कि जजों की नियुक्ति प्रक्रिया में सुधार के सुझाव हम कॉलेजियम से सलाह मशविरा करके अदालत के सामने प्रस्तुत करें.

सरकार ने तीन अगस्त को ही अपना पक्ष अदालत को प्रस्तुत कर दिया था. तो अगर माननीय न्यायालय का आदेश हमारे लिए बाध्यकारी है, तो ये उनके लिए भी तो बाध्यकारी है.

देश भर से करीब 4000 लोगों ने इस पर अपने सुझाव दिये हैं. इनमें से 1200 सुझाव छांटे गए. मुझे लगता है कि कॉलेजियम सिस्टम में भी सुधार की जरूरत है. हमने अदालत के आदेश का हर मुमकिन पालन करने की कोशिश की है.

अब हम तीन तलाक के मुद्दे पर आते हैं. इलाहाबाद हाई कोर्ट ने इस रिवाज को असंवैधानिक ठहराया है. अदालत ने इसे मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों का हनन करार दिया. इस बारे में आपकी क्या राय है?

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माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने तीन तलाक पर भारत सरकार से अपना पक्ष रखने को कहा था. इस मसले पर सरकार के रुख के तीन पहलू हैं.

पहली बात तो ये कि संविधान देश के हर नागरिक को बराबरी का अधिकार देता है. यानी किसी के साथ लिंग भेद नहीं होना चाहिए. सबको बराबरी और सम्मान से जीने का अधिकार है.

संविधान निर्माताओं ने महिलाओं को वोटिंग का अधिकार दिया है. संविधान उन्हें सम्मान से जीने का अधिकार देता है. उनसे भेदभाव का विरोध करता है. हमारे संविधान ने महिलाओं को ये अधिकार तब दिए थे, जब दुनिया के कई देशों में इस पर बहस ही चल रही थी.

तीन तलाक, समानता के अधिकार के बिल्कुल खिलाफ है. संविधान से चलने वाले हमारे देश में आप ऐसे भेदभाव को कैसे चलने दे सकते हैं?

मैं यहां ये भी साफ कर दूं कि हम धार्मिक आजादी के समर्थक हैं. ये संविधान में दिए गए बुनियादी अधिकारों में शामिल है.

लेकिन किसी भी धर्म की बुरी परंपरा, धर्म का बुनियादी हिस्सा हो ये जरूरी नहीं. कोई रिवाज आराधना के अधिकार का हिस्सा हो ये जरूरी नहीं.

क्या मुझे दलितों को अछूत मानने का अपराध करने की आजादी है, क्योंकि मेरा धर्म इसकी इजाजत देता है?

क्या आपके कहने का मतलब है कि इलाहाबाद हाई कोर्ट ने सही बात कही?

हमने इस बात पर अपना पक्ष सुप्रीम कोर्ट के सामने रख दिया है. मामला न्यायालय में विचाराधीन है.

मैं एक बड़े पैमाने पर ये बात कह रहा हूं. बीस से ज्यादा इस्लामिक देशों में ट्रिपल तलाक या तो खत्म कर दिया गया है या उसके लिए सख्त नियम बना दिए गए हैं. जैसे कि जॉर्डन, मिस्र, मोरक्को, तुर्की, इंडोनेशिया, मलयेशिया, बांग्लादेश, पाकिस्तान और अफगानिस्तान.

जब इस्लामिक देशों में इस रिवाज को गलत माना गया है, इसमें बदलाव किया गया है. इस बदलाव को शरीया कानून के खिलाफ नहीं माना गया है, तो भारत जैसे धर्मनिरपेक्ष देश में तीन तलाक पर पाबंदी को शरीयत के खिलाफ कैसे कहा जा सकता है?

तीन तलाक इतना बड़ा राजनैतिक मसला क्यों बन गया है?

मुझे लगता है कि ये मसला हमारे पूरे अल्पसंख्यक मुद्दे की बहस का हिस्सा बन गया है.

आपकी नजर में कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और बीएसपी इस मसले पर कोई स्टैंड लेने से क्यों बच रही हैं?

अल्पसंख्यक भी भारत का हिस्सा हैं. बीजेपी की राष्ट्रीय परिषद की बैठक मे माननीय प्रधानमंत्री जी ने दीनदयाल उपाध्याय जी का जिक्र करते हुए कहा था कि आप उनका तुष्टीकरण मत कीजिए, आप उनकी अनदेशी भी मत कीजिए. आप उन्हें अपनाइए.

प्रधानमंत्री मोदी ने यूपी के महोबा में एक रैली में तीन तलाक का खुलकर विरोध किया था. क्या बीजेपी, तीन तलाक की आड़ में समान नागरिक संहिता को लागू करने का इरादा रखती है?

बिल्कुल नहीं. समान नागरिक संहिता बहुत व्यापक विषय है. लॉ कमीशन मंत्रालय इस पर विचार कर रहा है.

हमने इस पर सबसे राय रखने को कहा है. जैसे ही हम इस पर वाद-विवाद और सलाह मशविरा पूरा कर लेंगे, तब सरकार तय करेगी कि इस मसले पर कैसे आगे बढ़ना है

क्या आप कांग्रेस और दूसरे दलों से कहेंगे कि समान नागरिक संहिता पर वो अपना रुख स्पष्ट करें?

इस पर लॉ कमीशन सबसे राय मांगेगा, सरकार नहीं. लॉ कमीशन के सामने बीजेपी को भी अपना रुख स्पष्ट करना होगा. मेरे खयाल से इस व्यापक चर्चा की जरूरत है.

जब राहुल गांधी ने कहा कि वो बोलेंगे तो भूकंप आ जाएगा, तो आपने क्या कहा? क्या आपकी पार्टी उन्हें बोलने से रोक रही है? जैसा कि राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि क्या आप उनके बोलने से डरते हैं?

राहुल गांधी ने अपने नेतृ्त्व से पहले ही अपनी पार्टी की जड़ें हिला दी हैं. वो जितना बोलेंगे, उतना ही उनकी पार्टी में जलजला आएगा.

मैं उनकी खीझ समझ सकता हूं. जबसे उन्होंने पार्टी की कमान संभाली है, उनके पास बोलने के लिए कोई मुद्दा ही नहीं है, सिवा यूपी के 22 विधानसभा सीटों के.

पूरे देश में कांग्रेस का बुरा हाल है. लोकसभा से लेकर राज्य के चुनावों तक. अरुणाचल प्रदेश में भी बीजेपी जीत रही है.

असम में हम जीते. अब देश की जनता की नजर में कांग्रेस नगर निगम का चुनाव जीतने लायक भी नहीं है. आपने ये बात महाराष्ट्र, गुजरात और राजस्थान में देख ली होगी.

राहुल गांधी कहते हैं कि मैं बोलूंगा तो मोदी जी की बोलती बंद हो जाएगी. इस पर आपकी क्या राय है?

उनके इस अहंकार पर मेरा बोलना उचित नहीं. लेकिन हम पूरे ध्यान से उन्हें सुनना चाहेंगे. हम चाहेंगे कि चाहे लिखा हुआ ही पढ़ें, मगर कुछ तो बोलें...हमें कोई दिक्कत नहीं.

यानी आप उन्हें बोलने का मौका देंगे?

सवाल ये है कि राजनैतिक चर्चा में वो किस तरह की भाषा का इस्तेमाल कर रहे हैं. प्रधानमंत्री की आलोचना के लिए वो किस हद तक जाने को तैयार हैं.

क्या वो इस अहंकार वाली भाषा का इस्तेमाल करके अपनी राजनैतिक विरासत को संभालेंगे?

यानी आप उन्हें नहीं बोलने देंगे?

क्यों नहीं. लेकिन शर्त ये है कि उन्हें हमारा जवाब भी सुनना होगा. ये नहीं हो सकता कि...

(बीच में टोककर) -मतलब ये कि जब तक कायदे की बहस के लिए वो राजी नहीं होंगे आप उन्हें बोलने नहीं देंगे?

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ये तो नहीं हो सकता कि आप बोलिए और जब हमारी बारी आए तो आप हंगामा करना शुरू कर दें.

आप माननीय राष्ट्रपति जी की सलाह भी अनसुनी कर दें. जब 16 नवंबर को बहस शुरू हुई थी तो आनंद शर्मा, सीताराम येचुरी, रामगोपाल यादव और मायावती...सबने अपनी बात रखी.

यहां तक कि लंबे वक्त के बाद हमने पूर्व प्रधानमंत्री डॉक्टर मनमोहन सिंह की बहुमूल्य बातें भी सुनीं. जबकि उन्होंने अपने राज में काले धन की रोकथाम के लिए एक भी कदम नहीं उठाया. जबकि उनके राज में इतने घोटाले हुए...फिर भी वो बोले.

आप क्यों सोचते हैं...

(बीच में टोकते हुए)-पहले मेरी बात सुनिए. उसके बाद क्या हुआ? उन्होंने कहा कि पहले प्रधानमंत्री को आने दीजिए. वो आए. उन्होंने कहा कि पीएम को प्रश्नकाल के बाद आने दीजिए.

प्रधानमंत्री प्रश्नकाल के बाद भी आए. उन्होंने फिर भी पीएम का घेराव किया. तो बहस से कौन भाग रहा है? हमारा मत एकदम स्पष्ट है...हमने आपकी बात सुनी.

जबकि आपने पीएम को इतना बुरा-भला कहा तब भी सुना. हम फिर आपकी बात सुनने को तैयार हैं. लेकिन आपको हमारी बात भी सुननी होगी.

आखिर सारी पार्टियां नोट बंदी पर आपके खिलाफ क्यों हैं?

सभी पार्टियां हमारे खिलाफ नहीं. कई लोग हमारे समर्थन में हैं. नीतीश कुमार, नवीन पटनायक और कई दूसरे मुख्यमंत्री भी हमारे साथ हैं.

बड़ी बात ये है कि लोग बीजेपी को कैसे देखते हैं, मोदी को कैसे देखते हैं. मोदी के बारे में लोगों की राय है कि वो गरीबों के लिए काम करते हैं, उनकी लड़ाई लड़ते हैं.

वो काले धन और बेईमानी के खिलाफ लड़ते हैं. हमने देश के राजनैतिक माहौल को बदला है. पहले कांग्रेस बनाम बाकी सब दल होता था. आज बीजेपी और उनके साथियों के खिलाफ बाकियों की मोर्चेबंदी है.

उनका विरोध इसी राजनैतिक माहौल के बदलाव की वजह से है. हम सबने कई साझा मुद्दों की वजह से कांग्रेस के खिलाफ लड़ाई लड़ी थी. अब वो लोग बीजेपी से लड़ने के लिए कांग्रेस के साथ हो गए हैं. हमारी शुभकामनाएं उनके साथ हैं.

क्या आपको लगता है कि नकदी के संकट की वजह से बीजेपी को नुकसान होगा. पैसे न मिलने से लोग भड़क रहे हैं.

लोगों ने पूरे दिल से नोट बंदी के फैसले का समर्थन किया है. प्रधानमंत्री ने पहले ही कहा था कि 50 दिनों तक असुविधा होगी.

क्योंकि एक बहुत बड़े फैसले को लागू करने में वक्त लगता है. आज भी लोग उनके इस कदम की तारीफ कर रहे हैं.

भारत का सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री होने के नाते मैं आपको यकीन दिलाता हूं. मैं आपसे इस बारे में अलग से बात करूंगा कि देश कैशलेस अर्थव्यवस्था बनने की दिशा में कैसे आगे बढ़ रहा है.

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