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यूपी विधानसभा चुनाव 2017: सिर्फ मुसलमानों के सहारे पार नहीं लगेगी नैया

पार्टियों को मुसलमानों के प्रति अपने रवैये में बदलाव करना होगा

Updated On: Mar 11, 2017 05:14 PM IST

FP Staff

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यूपी विधानसभा चुनाव 2017: सिर्फ मुसलमानों के सहारे पार नहीं लगेगी नैया

यूपी में जब 27 साल पहले कांग्रेस की सरकार थी तब ये माना जाता था कि ब्राह्मण और मुसलमान उसका कोर वोटर है.

इन्हीं दो कोर वोटर समूह के दम पर राज्य में आजादी में के बाद कांग्रेस ही काबिज रहती आई थी.

लेकिन राम मंदिर की बयार ने ब्राह्मण वोटरों को बीजेपी की तरफ मोड़ा तो मुस्लिम कभी एसपी तो कभी बीएसपी के बीच झूलने लगे.

बीएसपी की टूटी उम्मीद

इस बार भी बीएसपी की उम्मीदें मुस्लिम वोटरों पर थीं. लेकिन इस बार मुस्लिम बहुल इलाकों में  बीजेपी का प्रदर्शन अच्छा रहा.

वरिष्ठ पत्रकार तुफैल अहमद का कहना है, 'जीत के लिए 50 फीसदी वोट नहीं चाहिए.' उनका कहना है कि मुस्लिम वोटर के लिए एसपी और बीएसपी कोशिश करती रही. लेकिन जहां पोलराइजेशन होता है, वहां रिवर्स भी हो जाता है. इस बार ऐसा ही हुआ है.

पार्टियों की बदलेगी सोच?

क्या मुसलमान वोटर्स को जीत की चाभी समझने वालों के लिए यह चुनाव सोच बदलने का काम करेगा? वरिष्ठ पत्रकार अजय सिंह कहते हैं, ‘हमें एक कम्युनिटी के बारे में यह नहीं समझना चाहिए कि वो एक साथ चले जाएं और बीजेपी को हरा देंगे. अगर उनके पास दो विकल्प हैं, तो वोट बंटेंगे ही.’

बीजेपी के पास मुस्लिम चेहरा नहीं

सवाल यही है कि क्या ये चुनाव बीजेपी में मुसलमान और मुसलमानों में बीजेपी के लिए रुख को बदलेगा?

अजय सिंह बताते हैं, ‘1972 के आसपास आरएसएस ने गैर हिंदुओं के लिए दरवाजे खोले थे. यकीनन बीजेपी को अपने रवैये में बदलाव करना चाहिए. लेकिन हकीकत यही है कि यूपी, एमपी, राजस्थान, गुजरात से कोई मुस्लिम एमपी चेहरा नहीं है.’

मुसलमान को जगह नहीं 

वरिष्ठ पत्रकार आकार पटेल को लगता है कि मुस्लिम समुदाय तब आगे बढ़ेगा, जब सामने से कोई हाथ बढ़ाए.

वह कहते हैं, ‘अगर 400 में से एक भी सीट आप मुस्लिम को नहीं देंगे, तो सारा दोष कम्युनिटी पर नहीं डाल सकते. गुजरात में पिछला मुस्लिम सांसद कब था, जरा याद करने की कोशिश कीजिए. एक तबके को आपने पूरी तरह हटा दिया है.’

हालांकि तुफैल अहमद को लगता है कि मुसलमान इस पार्टी से जुड़ रहे हैं. उन्हें लगता है कि और लोगों को जोड़े जाने की जरूरत है.

मुसलमानों का बेस बनाना जरूरी

तुफैल कहते हैं, ‘मुझे लगता है कि एक बेस बनाना चाहिए. इलेक्शन में न भी खड़ा करें, तो पार्टी में या जिला स्तर पर एक प्रतिनिधित्व जरूरी है.’

लेकिन क्या ऐसा होगा? आकार पटेल को नहीं लगता कि ऐसा होगा. वो कहते हैं, ‘गुजरात में बीजेपी लगातार जीत रही है. वहां साढ़े नौ फीसदी मुस्लिम हैं. लेकिन इसके बावजूद कोई असर नहीं पड़ा है.'

'अगर जीत की स्ट्रेटेजी काम कर रही है, तो वो इसे क्यों छोड़ना चाहेंगे. सिर्फ राजनीतिक नहीं, विचारधारा की बात है. उन्हें लगता है कि मुसलमानों को अपनी जगह मालूम होनी चाहिए और वहीं रहना चाहिए.’

यह सही है कि बीजेपी को लेकर मुस्लिम सपोर्ट की बात करने पर गर्मागर्म बहस होती है. लेकिन यह भी सही है कि किसी समय दोनों पक्षों को अपना रवैया बदलना होगा. तुफैल अहमद के अनुसार यह चुनाव इसी की शुरुआत हैं.

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