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दवा कंपनियों का सुप्रीम कोर्ट में दावा, संसदीय समिति की रिपोर्ट बाध्यकारी नहीं है

दवा कंपनियों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता हरीश साल्वे ने कहा कि संसद की स्थाई समिति की रिपोर्ट का महत्व सहमति बनाने के लिए है और इसका स्वरूप परामर्श देने वाला है

Updated On: Oct 24, 2017 07:52 PM IST

Bhasha

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दवा कंपनियों का सुप्रीम कोर्ट में दावा, संसदीय समिति की रिपोर्ट बाध्यकारी नहीं है

सुप्रीम कोर्ट में मंगलवार कुछ दवा कंपनियों ने कहा कि संसद की स्थाई समिति की रिपोर्ट का सहमति बनाने के लिए महत्व है परंतु यह न तो बाध्यकारी है और न ही विवादित तथ्यों को साबित करने के लिए इसका इस्तेमाल किया जा सकता है.

चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अघ्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ के समक्ष यह दलील दी गई. संविधान पीठ को इन सवालों पर फैसला करना है कि क्या न्यायालय न्यायिक कार्यवाही में संसदीय समिति के प्रतिवेदनों को आधार बना सकता है या इन प्रतिवेदनों का हवाला दिया जा सकता है.

संविधान पीठ के अन्य सदस्यों में जस्टिस ए के सिकरी, जस्टिस ए एम खानविलकर, जस्टिस धनन्जय वाई चंद्रचूड़ और जस्टिस अशोक भूषण शामिल हैं.

विवादास्पद एचपीवी वैक्सीन का परीक्षण करने पर कथित रूप से कुछ दवा कंपनियों पर प्रतिकूल टिप्पणियां करने संबंधी संसद की स्थाई समिति की 22 दिसंबर 2014 को जारी 81वीं रिपोर्ट का हवाला दिए जाने पर यह सवाल उठा कि क्या न्यायिक कार्यवाही के दौरान इसे आधार बनाया जा सकता है.

कुछ दवा कंपनियों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता हरीश साल्वे ने कहा कि संसद की स्थाई समिति की रिपोर्ट का महत्व सहमति बनाने के लिए है और इसका स्वरूप परामर्श देने वाला है. उन्होंने कहा कि संसदीय समिति की रिपोर्ट बाध्यकारी नहीं है और विवादित तथ्यों को साबित करने के लिए इसका सहारा नहीं लिया जा सकता.

2012 से चल रहा है मामला

दूसरी ओर, विवादास्पद एचपीवी वैक्सीन का विरोध करने वाले याचिकाकर्ताओं में से एक की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता आनंद ग्रोवर ने कहा कि वह संसदीय समिति की रिपोर्ट का सहारा नहीं ले रहे हैं, बल्कि सिर्फ इसका हवाला दिया है.

इससे पहले, केंद्र ने अपने हलफनामे में कहा था कि संसदीय समिति की रिपोर्ट न्यायालय में साक्ष्य के रूप में इस्तेमाल नहीं की जानी चाहिए.

यह मामला 2012 में शीर्ष अदालत में सुनवाई के लिए आया था और मेसर्स ग्लैक्सो स्मिथ क्लिन एशिया प्रा. लि. और एमएसडी फॉर्मास्यूटिकल्क प्रा लि द्वारा गर्भाशय के कैंसर की रोकथाम के लिए निर्मित एचपीवी वैक्सीन को मंजूरी दिए जाने के मामले में औषधि महानियंत्रक और भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद द्वारा की गई कार्रवाई के पहलुओं के इर्द गिर्द सिमट गया था.

इस मामले में मंगलवार को सुनवाई अधूरी रही. इस पर अब आगे बहस होगी.

शीर्ष अदालत ने इस मामले को पांच अप्रैल को संविधान पीठ को सौंपते हुए कहा था कि हो सकता है कि जनहित याचिका में संसदीय समिति की रिपोर्ट के आधार पर यदि उसने कार्यवाही की है तो हो सकता है कि उसने संघीय ढांचे की सीमा को लांघा हो.

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