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क्या संसद सत्र नहीं चलने देने के लिए सरकार जिम्मेदार है ?

संसद का सत्र बेकार चला गया. इसकी जिम्मेदारी से सरकार पल्ला नहीं झाड़ सकती.

Updated On: Dec 16, 2016 03:12 PM IST

Amitesh Amitesh

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क्या संसद सत्र नहीं चलने देने के लिए सरकार जिम्मेदार है ?

पूरा सत्र स्वाहा हो गया और नोटबंदी जैसे इतने बड़े फैसले के ऊपर चर्चा नहीं हो पाई. एक ऐसा फैसला जिसने देश के एक-एक व्यक्ति को प्रभावित किया, देश की अर्थव्यवस्था पर जिसका इतना बड़ा असर पड़ने वाला है. इस पर चर्चा के बजाए नोटबंदी पर सियासत होती रही.

जैसा पहले से ही अंदेशा था, वैसा ही हुआ. संसद के शीतकालीन सत्र के आखिरी दिन वही हंगामा और सदन की कार्यवाही अनिश्चित काल तक के लिए स्थगित.

16 नवंबर से शुरू हुए शीतकालीन सत्र के आखिरी दिन सदन का नजारा कुछ अलग नहीं था. सरकार और विपक्ष दोनों अपने-अपने रुख पर कायम थे. चर्चा शुरू कराने की कोशिश किसी की नहीं थी. केवल कोशिश थी तो एक-दूसरे पर दोषारोपण करने की.

नोटबंदी के बाद हालात से जूझती जनता काफी परेशान दिख रही थी. सरकार की तरफ से बार-बार भरोसा दिए जाने के बावजूद परेशानी होती रही. लेकिन, इस एक महीने के सत्र के दौरान उस परेशानी की चिंता किसी को नहीं, बस चिंता थी तो अपनी सियासत चमकाने की.

हालाकि, राज्यसभा के भीतर तीन दिन तक चर्चा हुई भी लेकिन विपक्ष के हंगामे और प्रधानमंत्री से माफी मंगवाने की जिद ने चर्चा नहीं होने दी.

दूसरी तरफ सदन में चर्चा के बाद वोटिंग के मुद्दे को लेकर हमलावर विपक्ष लगातार सरकार को घेरता रहा. हंगामा होता रहा और सदन की कार्यवाही बाधित रही.

अटके पड़े रह गए कई बिल

संसद में गतिरोध की वजह से  कई जरूरी बिल पर न तो कोई चर्चा हो सकी और न ही उसे सदन से मंजूरी मिल सकी.

जीएसटी से जुड़े बिल को संसद से मंजूरी नहीं मिल पाई, जिसकी सबसे ज्यादा जरूरत थी. इसके अलावा प्रिवेंशन आफ करप्शन बिल 2013, व्हिसिलब्लोअर प्रोटेक्शन एमेंडमेंट बिल, कन्ज्यूमर प्रोटेक्शन बिल 2015 समेत करीब दस जरूरी बिल संसद से पास नहीं हो पाए.

सदन चलाने की सरकार की भी जिम्मेदारी

लेकिन सिर्फ विपक्ष को ही दोष देना ठीक नहीं. सदन ठीक से चलाने की सरकार की भी जिम्मेदारी होती है.

क्या सरकार ने सही तरीके से अपनी जिम्मेदारी निभाई?  इस सवाल का जवाब न में ही मिलेगा. सवाल सरकार की नीयत पर भी खड़े हो रहे हैं क्योंकि अब सवाल सरकार के अपने भी उठाने लगे हैं.

Photo. PTI

बीजेपी के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी ने तो सीधे संसदीय कार्यमंत्री और लोकसभा स्पीकर की भूमिका पर ही सवाल उठाए थे. इसके बावजूद संसद के भीतर हालात में कोई सुधार नहीं हुआ. विपक्ष की फ्लोर  मैनेज करने में कोई ठोस पहल और रुचि नहीं दिखी.

संसदीय कार्य मंत्री की जिम्मेदारी सदन को चलाने की होती है. लेकिन वही इस बार आक्रामक हो गए. अनंत कुमार ने अगस्ता वेस्टलैंड डील के मुद्दे को लेकर विपक्ष पर वार किया.

सरकार पर सवाल खड़े भी क्यों न हो. जिस तरीके से सत्र के आखिरी दिनों में सरकार ने रवैया अपनाया वो अपने-आप में चौंकाने वाला है. ऐसे मे सदन नहीं चलने देने के लिए अकेले विपक्ष पर निशाना साधना ठीक नहीं. जिम्मेदारी तो सरकार की भी बनती है.

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