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जीप घोटाले की अनदेखी ने ही कर दिया था भ्रष्टाचारियों का काम आसान

वी.के कृष्ण मेनन पर सन् 1949 में जीप घोटाले का गंभीर आरोप लगा था. हंगामा हुआ तो केंद्र सरकार ने इसकी प्रारंभिक जांच के लिए एक उच्चस्तरीय समिति बनाई

Surendra Kishore Surendra Kishore Updated On: Jan 06, 2018 09:33 AM IST

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जीप घोटाले की अनदेखी ने ही कर दिया था भ्रष्टाचारियों का काम आसान

जीप खरीद घोटाला आजाद भारत का पहला बड़ा सरकारी घोटाला था. चूंकि उस घोटाले को दबा दिया गया था, इसलिए इसके साथ ही इस गरीब देश में भ्रष्टाचार की मजबूत नींव पड़ गई. इससे आजाद भारत में बाद के घोटालेबाजों का काम भी आसान हो गया. उन लोगों ने समझ लिया कि वे कोई भी घोटाला-महा घोटाला करके बच सकते हैं. यह और बात है कि घोटालों के कारण कुछ लोगों को कभी- कभी सजा भी भुगतनी पड़ती है, पर अपराध के आकार-प्रकार के मुकाबले सजा बहुत कम है.

जब राजीव गांधी ने देश को सच्चाई से अवगत कराया

किसी को ‘विचारधारा’ के कारण सजा से बचा लिया जाता है तो किसी को कुछ अन्य अघोषित कारणों से. नतीजतन यत्र-तत्र-सर्वत्र भ्रष्टाचार की धूम मची हुई है. दूसरी ओर आम जनता की जरूरतों की पूर्ति के लिए भी सरकारों के पास धन नहीं है.

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इन घोटालों का नतीजा यह हुआ कि 1985 में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने देश को एक शर्मनाक सच्चाई से अवगत कराया. उन्होंने कहा कि हम दिल्ली से 100 पैसे भेजते हैं, पर उसमें से 15 पैसे ही जनता तक पहुंच पाते हैं. अब तो स्थिति इतनी बिगड़ चुकी है कि मौजूदा केंद्र सरकार इन पर काबू पाने की कोशिश में हांफ रही है. यदि जीप घोटाले के लिए जिम्मेदार लोगों को तब सजा मिल गई होती तो शायद चारा घोटाला जैसा घोटाला भी नहीं होता.

rajiv gandhi

वी.के कृष्ण मेनन पर सन् 1949 में जीप घोटाले का गंभीर आरोप लगा. हंगामा हुआ तो केंद्र सरकार ने इसकी प्रारंभिक जांच के लिए एक उच्चस्तरीय समिति बनाई. जांच कमेटी ने इसे घोटाला माना. न्यायिक जांच की सिफारिश की, पर जांच नहीं हुई. इससे कुछ सत्ताधारियों को लगा कि इससे वामपंथी विचारधारा की एक राजनीतिक हस्ती का अंत हो जाएगा.

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प्रतिपक्ष ने जब जांच की मांग पर जोर दिया तो सत्ताधारी कांग्रेस ने कह दिया कि आप लोग इसे अगले चुनाव में मुददा बना सकते हैं. याद रहे कि केंद्र सरकार ने 30 सितंबर, 1955 को यह घोषणा कर दी कि जीप घोटाले के इस मामले को बंद कर दिया गया है. हद तो तब हो गई जब 3 फरवरी, 1956 को कृष्ण मेनन केंद्रीय मंत्री बना दिए गए. घोटाला तब हुआ था जब मेनन लंदन में भारतीय उच्चायुक्त थे. कश्मीर में पाकिस्तानी घुसपैठ की घटना की पृष्ठभूमि में ब्रिटेन से भारतीय सेना के लिए अत्यंत जरूरी जीप और हथियार खरीदने का भार कृष्ण मेनन को सौंपा गया था.

दोनों ही खरीदों के लिए ब्रिटेन की विवादास्पद कंपनियों से मेनन ने खुद ही लिखित समझौते कर लिए. उन्होंने ऐसा सरकारी प्रक्रियाओं को नजरअंदाज करके किया. किसी उच्चायुक्त को ऐसे समझौते करने का अधिकार नहीं था. खरीद समझौते के कागज पर इस देश के संबंधित अफसरों को हस्ताक्षर करने थे. औपचारिकता पूरी किए बिना भारी धनराशि अग्रिम के रूप में दे दी गई, पर पहली खेप के रूप में जो 155 जीपें भारत पहुंचीं भी, तो यह पाया गया कि जीप बंदरगाह से गैराज तक चल कर पहुंचने लायक ही नहीं थी. पंद्रह सौ जीपों के लिए एक लाख 72 हजार पाउंड कंपनी को अग्रिम दे दिए गए थे.

आश्चर्य की बात है कि रक्षा सौदे की अनियमितता के लिए जिम्मेदार कृष्ण मेनन को बाद में रक्षा मंत्री ही बना दिया गया. अंततः मेनन को चीन की लड़ाई में भारत की हार के बाद मंत्री पद छोड़ना पड़ा था, लेकिन इस जीप घोटाले ने ही आजादी के तत्काल बाद ही यह बात साबित कर दी कि राजनीतिक या अन्य तरह की तरक्की पाने के रास्ते में कोई गंभीर घोटाला भी इस देश में किसी समर्थ व्यक्ति के लिए बाधक नहीं है. जीप घोटाले को अन्य घोटालों का ‘बीज घोटाला' कहा जा सकता है.

वी.के कृष्ण मेनन (फोटो: Wiki)

वी.के कृष्ण मेनन (फोटो: Wiki)

जवाहर लाल नेहरू ने प्रताप सिंह कैरो का किया था बचाव

पंजाब के मुख्यमंत्री प्रताप सिंह सरदार कैरो पर भ्रष्टाचार और घोटाले के संगीन आरोप लगे थे. पंजाब के कांग्रेसी नेता प्रबोध चंद्र ने 4 मई 1958 को तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष यू.एन.ढेबर के समक्ष कैरो के खिलाफ आरोप पत्र पेश किया. जांच की औपचारिकता पूरी की गई. जांच रिपोर्ट में यह अजीब बात कही गई कि कैरो के पुत्र और पत्नी ने पैसे जरूर बनाए,पर उसके लिए खुद प्रताप सिंह कैरो तो जिम्मेदार नहीं हैं. तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने भी कैरो का बचाव किया.

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अकालियों यानी सांप्रदायिक तत्वों से कैरो ही मुकाबला कर सकते थे, ऐसा नेहरू का मानना था. नेहरू ने मेनन के खिलाफ जीप स्कैंडल पर कहा कि ‘इसमें कुछ नहीं है स्कैंडल शब्द के सिवा.’ हाल के वर्षों में कई नेताओं और दलों ने यह तर्क पेश किया कि सांप्रदायिक तत्वों यानी बीजेपी को सत्ता में आने से रोकना हो तो कुछ बीजेपी विरोधी नेताओं के भ्रष्टाचार को नजरअंदाज करना होगा.

नतीजतन वे लोग न तो ‘सांप्रदायिक तत्वों’ यानी बीजेपी को सत्ता में आने से रोक सके न ही खुद की चुनावी ताकत की ही रक्षा कर सके.

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इंदिरा गांधी ने कहा था 'भ्रष्टाचार तो वर्ल्ड फेनोमेना है.'

सन् 1955 में सिंचाई के मद में केंद्र सरकार ने राज्यों को कुल 29 हजार करोड़ रुपए दिए. इस राशि में से दस हजार करोड़ रुपए सिर्फ पंजाब को मिले. कैरो ने इन पैसों से सिंचाई क्षमता का भी निर्माण जरूर किया, लेकिन उन पैसों में से भारी लूट भी हुई. मशहूर कांग्रेसी नेता और तत्कालीन कांग्रेस महासचिव श्रीमन्नारायण ने अपने ‘संस्मरण’ में लिखा है कि मैंने कैरो से कहा था कि वे अपने परिजन पर अंकुश लगाएं, पर वे वैसा नहीं कर सके. इस कारण उनकी पत्नी और बेटों ने सत्ता का भरपूर दुरूपयोग किया. याद रहे कि यह बात नेहरू युग की हैं. महाजनों जे न गता, सः पंथा!

राष्ट्रीय स्तर पर सन् 1971 के बाद भ्रष्टाचार ने देश में संस्थागत रूप ग्रहण कर लिया. खुद पर भ्रष्टाचार के आरोपों के जवाब में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने कहा भी था कि ‘भ्रष्टाचार तो वर्ल्ड फेनोमेना है.’ उन्हीं दिनों बिहार की सरकार और पार्टियों में भी भ्रष्टाचार काफी बढ़ा.

राजीव गांधी ने सन् 1985 में कहा था कि केंद्र सरकार के सौ पैसों में से 15 पैसे ही उन तक पहुंच पाते हैं जिनके लिए वे पैसे दिल्ली से चलते हैं. आजादी के बाद से आज तक अनेक घोटालों को लेकर अनेक बड़े राष्ट्रीय और प्रादेशिक नेताओं के खिलाफ बारी-बारी से ठोस सबूत भी सामने आते रहे. फिर भी कम ही लोगों को सजा दिलाई जा सकी. जान-बूझ कर उन्हें बचा लिया गया. भ्रष्टाचार दो गुनी-चौगुनी रफ्तार में बढ़ता चला गया. नतीजतन जनता के लिए आवंटित सरकारी पैसे जनता के बीच तक नहीं पहुंच पा रहे हैं. इसके और भी भयंकर परिणाम भविष्य में सामने आ सकते हैं. मौजूदा सरकार भ्रष्टाचार के खिलाफ अपने आधे मन से शुरू की गई कार्रवाई में भी हांफ रही है.

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