S M L

पकौड़ा खाओ और खुद जान जाओ, ये रोजगार है कि नहीं?

बड़े बड़े चैनलों पर तरह-तरह के पकौड़े बनाने पर 'महाबहस' चला करेगी. गरीब-अमीर एक पकौड़े से बराबर हो जाएंगे. तेजी से 'पकौड़ा इकॉनमी' बढ़ेगी

Kinshuk Praval Kinshuk Praval Updated On: Feb 06, 2018 04:50 PM IST

0
पकौड़ा खाओ और खुद जान जाओ, ये रोजगार है कि नहीं?

पकौड़ा, ना मालूम ये नाम किसने और क्यों रखा था. जिसने भी रखा था तो ये सोचकर नहीं रखा होगा कि एक दिन ये भी राजनीति की कड़ाही में तला जाएगा. आज राजनीतिक दल पकौड़े से तेल निकालने में जुटे हुए हैं. पकौड़ा किसी नायक की तरह कड़ाही से बाहर निकल कर आ चुका है. उसकी गर्माहट लोगों के बयानों से महसूस की जा सकती है.

आज पकौड़ा उस मुकाम को पा चुका है जहां तक पहुंचने के लिए अकेले चने को बेसन बनना पड़ता है तो आलू-प्याज को जमीन पर जन्म लेना पड़ता है. फिर ये किसी करिश्माई हाथ में इस तरह से घुलमिल कर तैयार होते हैं जैसे राजनीतिक नजर से पार्टियों का गठबंधन.

गौर से देखें तो पकौड़े के दर्शन में सियासी गठबंधन का अक्स दिखाई देता है. आलू,प्याज, बेसन, तेल, मसाले, कड़ाही, चूल्हा और हाथ. राजनीति के चूल्हे पर भी सियासी पार्टियां आलू-प्याज की तरह वादों के तेल में बयानों के पकौड़े तलते हैं. कभी कभी हाथ भी जल जाता है. लेकिन जब सत्ता का पकौड़ा मिलता है तो सारे जख्म भी भर जाते हैं. और जिन्हें सत्ता का पकौड़ा नहीं मिल पाता है तो वो पकौड़े पर आरोप लगाना शुरू कर देते हैं. कोई कहता है कि कच्चा है. कोई कहता है कि जला हुआ है. कोई कहता है कि नमक कम है.

पकौड़ा से सियासत की कड़ाही में उबाल

यही इस बार भी हो रहा है. पीम मोदी ने पकौड़े को रोजगार के प्रतीकात्मक तौर पर क्या बताया तो सियासत की कड़ाही में ऐसा उबाल आ गया मानो पकौड़ा बेचना न सिर्फ सबसे छोटा काम हो गया बल्कि ये बेरोजगारों का अपमान हो गया.

देश के गली-नुक्कड़ों में चलने वाली चाय पर चर्चा अचानक पकौड़ा पॉलिटिक्स में तब्दील हो गई. ये कुछ वैसे ही जैसे कि जिस दुकान से गरम गरम पकौड़ा खाकर मुंह जलाया जा रहा हैं तो उसी दुकान को कोसा भी जा रहा है.

ये भी पढ़ें: बीजेपी की नई रणनीति: पंद्रह लाख जुमला था लेकिन पकौड़ा हकीकत है

विरोध का 'स्वदेशी' तरीका बिल्कुल ही समझ से परे है. कांग्रेस बेरोजगारों को लेकर पकौड़ा सेंटर खोल कर पीएम मोदी के बयान पर विरोध जता रही है. विरोध ही जताना है तो पकौड़े की जगह पिज्जा रख लेते. चाऊमीन भी रखी जा सकती है. बर्गर का भी विरोध किया जा सकता है. लेकिन पकौड़े को ही बार बार एक ही कड़ाही में कितना तलोगे?

पकौड़ा बेचना रोजगार है या नहीं?

सवाल ये है कि पकौड़ा बेचना रोजगार है या नहीं? बात ये तो नहीं कही गई कि देश के बेरोजगार युवा पकौड़े बेचें.

दरअसल जो व्यक्ति किसी रेहड़ी-पटरी पर पकौड़ा बेच रहा है तो वो दो पैसे तो कमा ही रहा है. ये उसके रोजगार का जरिया है. उसकी आमदनी का स्रोत है. लेकिन पकौड़े की प्लेट पर राजनीति की चटनी ऐसी गिरी कि फिर कड़ाही से तेल ही छिटक पड़ा.

अब अलग अलग दलीलें दी जा रही है. सत्ताधारी पार्टी पर सवाल उठ रहे हैं. संसद में जवाब भी दिया जा रहा है. सवाल उठता है कि क्या पीएम के किसी भी बयान के बाद विपक्ष के विरोधी तेवरों के देखते हुए उस पर सफाई देने की जरूर है. ऐसा तो नहीं हुआ कि पीएम ने नोटबंदी की ही तरह पकौड़ा बेचने का बेरोजगारों को फरमान सुना दिया.

PM Narendra Modi interacts with NCC cadets, NSS Volunteers and Tableaux Artists

इस्राइल में 16 साल से 18 साल तक सेना में रहना जरूरी है. कुछ इस तरह का फरमान भी पीएम ने नहीं सुनाया. बात पकौड़ी की थी तो उसे चाय के साथ ही खत्म भी हो जाना चाहिए. लेकिन मुद्दों को तरस रही आज की राजनीति चाय-पकौड़े की प्लेट से ऊपर आ ही नहीं पाती.

पकौड़ा वोट बैंक नहीं. किसी समुदाय विशेष से भी नहीं आता. एक वर्ग पकौड़े बेचकर अपना घर किसी तरह चलाता है. दिन भर खड़े हो कर वो पकौड़ा बेचता है. उसकी कमाई के हिस्से का 'जीएसटी' इलाके के बीट कॉन्स्टेबल ले जाते हैं. शाम तक जो भी हाथ आता है तो उसका एक बड़ा हिस्सा अगले दिन के 'पकौड़ा मेकिंग' के सामान खरीदने में लग जाता है. जो बचता है वो दिमाग में ये अहसास कराता है कि चलो कुछ तो आया. वो दो सौ भी हो सकते हैं और पांच सौ भी.

नौकरी और पकौड़े बेचने का विकल्प

लेकिन महंगाई के दौर में ये नाकाफी हैं. कई घंटों की कड़ी मेहनत के बाद आए पैसों की कीमत बहुत ज्यादा है लेकिन वैल्यू कुछ भी नहीं. हालात ने पकौड़ा बेचने वाला बना दिया. आजाद भारत में पैदा हुए थे तो उम्मीद थी कि शायद मुफ्त शिक्षा और अच्छी शिक्षा नसीब होती. लेकिन पढ़ना-लिखना काम नहीं आया और पकौड़े की दुकान लगा ली. कुछ तो करना ही था. दो पैसे ऐसे ही सही. अब वही दो पैसे भी राजनीति को अखर रहे हैं.

ये भी पढ़ें: पकौड़े के पीछे अपने सरकार की विफलता छुपा रहे हैं मोदी और शाह

कोई किसी पकौड़े वाले से पूछे कि वो नौकरी करेगा या पकौड़े बेचेगा? उसका जवाब यही होगा कि पकौड़ा ही बेचेगा क्योंकि नौकरी करने वाले ही उसकी दुकान पर आकर पकौड़ा खाते हैं और इस पर हो रही पॉलिटिक्स पर बात करते हैं. अब जबकि सरकार और विपक्ष दोनों ही पकौड़े का सियासी फायदा उठा रहे हैं तो ऐसे में उनका फर्ज है कि वो पकौड़ा वालों के लिए किसी विशेष स्कीम का ऐलान करें. पकौड़ा वालों के रेल किराया, इलाज, मकान किराया, बिजली-पानी के बिल में बंपर छूट दें. उन्हें पकौड़ा बेचने की दुकान लगाने के लिए स्पेशल लोन दें. इससे पकौड़ा बेचने को लेकर प्रोत्साहन बढ़ेगा. लोग बड़ी-बड़ी डिग्रियों के लिए समय और पैसा बर्बाद नहीं करेंगे. उनका लक्ष्य स्पष्ट और सीधा होगा. क्योंकि डिग्री हासिल करने के बाद भी पकौड़ा बेचना पड़ सकता है. इससे देश में 'पकौड़ा क्रांति' आ जाएगी.

बड़े बड़े चैनलों पर तरह तरह के पकौड़े बनाने पर 'महाबहस' चला करेगी. गरीब-अमीर एक पकौड़े से बराबर हो जाएंगे. तेजी से 'पकौड़ा इकॉनमी' बढ़ेगी. पेट्रो डॉलर की तरह पकौड़ा पावर दिखाई देगी. इन सबके बाद भी अगर कोई कहे कि पकौड़ा बेचना रोजगार नहीं है तो उसे कह दिया जाए कि पकौड़ा खाओ, खुद जान जाओ कि ये रोजगार है कि नहीं.

0

अन्य बड़ी खबरें

वीडियो
SACRED GAMES: Anurag Kashyap और Nawazuddin Siddiqui से खास बातचीत

क्रिकेट स्कोर्स और भी

Firstpost Hindi